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 और पृथ्वी पर जल संकट के आसार

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 21 Apr

सार

यह सरे निष्कर्ष संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल आर्गेनाईजेशन ने हाल में जल संसाधनों की स्थिति पर पहली वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित किये हैं..!

janmat

विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

07/12/2022

पृथ्वी पर तापमान वृद्धि और जलवायु परिवर्तन का प्रभाव हरेक जगह पड़ रहा है, परन्तु इससे सबसे अधिक प्रभावित जल संसाधन हो रहे हैं। तापमान बढ़ने के कारण वर्षा असमान हो रही है, पृथ्वी के सतह पर जल संसाधनों का वाष्पीकरण अधिक हो रहा है, पूरी दुनिया के ग्लेशियर पहले से अधिक तेजी से पिघल रहे हैं, सूखे का क्षेत्र और अवधि बढ़ती जा रही है, नदियों में पानी के बहाव में तेजी से अंतर आ रहा है और इन सबके कारण भूजल की उपलब्द्धता प्रभावित हो रही है। यह  सरे निष्कर्ष  संयुक्त राष्ट्र के वर्ल्ड मेट्रोलॉजिकल आर्गेनाईजेशन ने हाल में जल संसाधनों की स्थिति पर पहली वार्षिक रिपोर्ट में प्रकाशित किये हैं ।

इसी  रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2021 में दुनिया के सभी क्षेत्रों ने पानी से सम्बंधित चरम आपदाओं– बाढ़ और सूखे का सामना किया है और दुनिया की एक बड़ी आबादी मृदु पानी की कमी से जूझ रही है।यूँ तो  दुनिया के अनेक क्षेत्र बाढ़ से जूझते रहे, फिर भी एक बड़ा हिस्सा सूखे की मार झेल रहा है। इस समय दुनिया की कुल आबादी में से लगभग 3.6 अरब आबादी पूरे वर्ष में कम से कम एक महीने पानी की कमी का सामना करती है, और अनुमान है कि वर्ष 2050 तक ऐसी आबादी 5 अरब तक पहुंच जायेगी।

इसी  रिपोर्ट के अनुसार पेटागोनिया, गंगा और सिन्धु नदी के ऊपरी क्षेत्रों में पिछले 20 वर्षों के दौरान पानी के बहाव में कमी आंकी गयी है। गंगा के क्षेत्र में पानी की समस्या केवल नदी के बहाव में कमी के कारण ही नही है, बल्कि पूरे गंगा के बेसिन क्षेत्र में भूजल भी संकट में है।संयुक्त राष्ट्र के फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन द्वारा प्रकाशित वार्षिक रिपोर्ट “स्टेट ऑफ फूड एंड एग्रीकल्चर 2020” के अनुसार दुनिया की तीन अरब आबादी पानी की समस्या से जूझ रही है। दो दशक पहले दुनिया में प्रतिव्यक्ति जितना पानी उपलब्ध था, उसकी तुलना में वर्तमान में इसकी उपलब्धता 20 प्रतिशत रह गई है।

फूड एंड एग्रीकल्चर आर्गेनाईजेशन के अनुसार हमें पानी की समस्या के प्रति गंभीर होना पड़ेगा क्योंकि अब यह काल्पनिक नहीं बल्कि हकीकत है, जिससे हमें जूझना पड़ रहा है। पानी खेती का मुख्य आधार है, और पानी में कमी का मतलब है हमें भूखा रहना पड़ेगा। संयुक्त राष्ट्र के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स में दुनिया से भूख को मिटाना और सबके लिए साफ पानी उपलब्ध कराना, दोनों ही सम्मिलित किये गए हैं। यह लक्ष्य अभी भी पहुंच से बाहर नहीं है बशर्ते दुनिया गंभीरता से ऐसा करने के लिए तत्पर हो। इसके लिए खेती के तरीकों में बदलाव भी बहुत जरूरी है जिससे पानी की बचत हो सके।

स्टेट ऑफ वाटर डेवलपमेंट के अनुसार वर्ष 2050 तक दुनिया की आबादी 9.4 से 10.2 अरब के बीच होगी और तब लगभग 5 अरब लोग पानी की किल्लत से जूझ रहे होंगे। इसका कारण जलवायु परिवर्तन, मांग में बढ़ोत्तरी और जल-स्त्रोतों का प्रदूषित होना है। अनुमान है कि पूरी दुनिया प्रतिवर्ष 4600 घन किलोमीटर पानी का उपयोग करती है, जिसमें से 70 प्रतिशत का उपयोग कृषि में 20 प्रतिशत का उपयोग उद्योगों में और शेष 10 प्रतिशत का उपयोग घरेलू कार्यों में किया जाता है। पिछले 100 वर्षों के दौरान पानी की मांग में 6 गुना वृद्धि आंकी गई है और अब यह वृद्धि प्रतिवर्ष एक प्रतिशत है।

लगभग दो दशक पहले से यह आशंका जताई जा रही है कि अगला विश्वयुद्ध पानी की कमी के कारण होगा। विश्वयुद्ध तो अबतक नहीं हुआ पर एक रिपोर्ट के अनुसार पानी के कारण हिंसा पिछले दशक (2010 से 2019) में इसके पीछे के दशक की तुलना में दुगुने से अधिक हो चुकी हैं। इस रिपोर्ट को अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया में स्थित पैसिफिक इंस्टिट्यूट ने प्रकाशित किया है, जो दुनियाभर में पानी से सम्बंधित प्रकाशित विवादों का लेखा जोखा रखता है। इस रिपोर्ट में भारत में साल दर साल बढ़ते पानी से सम्बंधित विवादों और हिंसा का विशेष तौर पर जिक्र है।