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राजनीतिक रंगमंच पर सत्य से ज्यादा अभिनय का सहारा

सार

भारतीय राजनीतिक रंगमंच पर अभिनय के ऐसे रंग बिखर रहे हैं कि तथ्य और सत्य का पता ही नहीं चलता। दिल्ली और देश की दूसरी राजधानियों की राजनीतिक खबरों पर नजर डालें तो पता चलता है कि हर राजनीतिक दल सत्य से दूर भागने की प्रतिस्पर्धा में लगा हुआ है। भारत में आज उल्टा घड़ा वाली उल्टी राजनीति हो रही है। राजनीति ऐसा बताती है कि जन कल्याण की बरसात हो रही है लेकिन जनता के हिस्से वैसे ही कुछ नहीं आता जैसे बारिश में उल्टे घड़े में एक बूंद जल इकट्ठा नहीं होता।  

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विस्तार

दिल्ली से शुरू करें तो यहां आम आदमी पार्टी पर भाजपा शराब और शिक्षा में घोटाले का आरोप लगा रही है, तो आम आदमी पार्टी विधायकों की खरीदी के लिए ऑपरेशन लोटस के फेल होने का आरोप लगा रही है। दोनों आरोपों में तथ्य क्या है? सत्य क्या है? यह किसी को नहीं पता। दिल्ली के लेफ्टिनेंट गवर्नर पर दिल्ली के मंत्री और विधायक नोटबंदी के दौरान घोटाले का आरोप लगा रहे हैं। उपराज्यपाल आरोप लगाने वालों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई का दावा कर रहे हैं। 

कांग्रेस की तरफ देखें तो नए राष्ट्रीय अध्यक्ष के चुनाव का ऐलान हो चुका है। चुनाव के लिए मतदाता सूची की आवश्यकता होती है, कांग्रेसी मांग उठा रहे हैं कि जब मतदाता सूची सार्वजनिक नहीं हुई है तो निर्वाचन कैसे हो सकेगा?

दिल्ली से भाजपा की ओर से एक और खबर आई है। खबर के मुताबिक़, साल 2023 में होने वाले सभी विधानसभा चुनाव राज्य लीडरशिप के चेहरे पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर लड़े जाएंगे। स्टेट लीडरशिप के खिलाफ एंटी इनकंबेंसी के सच और तथ्य से जनता का ध्यान भटकाने के लिए खबर में ऐसा बताया जा रहा है कि राज्यों के मुख्यमंत्री चुनाव के बाद पार्टी की सरकार आने पर भी वही नेता रहेंगे जो आज हैं यह पक्का नहीं, आज के मुख्यमंत्री रह भी सकते हैं और बदले भी जा सकते हैं। 

इन सारी घटनाओं में एक बात कॉमन है कि मूल मुद्दों और तथ्यों पर कोई भी सियासी दल बात नहीं करना चाहता। अब हम राज्यों की तरफ बढ़ें तो सबसे बड़ी खबर झारखंड के यूपीए विधायकों की रिजॉर्ट पॉलिटिक्स से जुड़ी हुई है। यह क्यों शुरू हुई है, इस पर कोई चर्चा नहीं हो रही है? हेमंत सोरेन मुख्यमंत्री रहते हुए स्वयं एक खदान आवंटित कराते हैं। फिर जब ‘ऑफिस ऑफ प्रॉफिट’ में फंस जाते हैं और चुनाव आयोग सदस्यता रद्द करने की सिफारिश करता है तब विधायकों को रांची से रायपुर पहुंचाकर एक दूसरे पर खरीद-बिक्री का आरोप लगाकर ध्यान भटकाया जाता है।

यह कितना गंभीर मामला है कि एक मुख्यमंत्री स्वयं के लिए खदान आवंटित करता है। इस पर कोई बात नहीं हो रही है। अब यही राजनीति की नैतिकता शायद बची हुई है कि मुद्दों को लटकाओ-भटकाओ और जब तक कुर्सी रहे, लूट खसूट से अपना, मित्रों का और सहयोगियों का घर भरते रहो।

एक और खबर जो पूरे देश में चर्चा में है, वह है राष्ट्रीय क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट। इसके मुताबिक, हर तीन घंटे में एक नाबालिग लड़की के साथ मध्यप्रदेश में रेप की घटना होती है। रिपोर्ट के आधार पर मध्यप्रदेश की विपक्षी पार्टी राज्य सरकार पर हमला करती है। यह रिपोर्ट हर साल कमोबेश ऐसी ही आती है। कांग्रेस सरकार के दौरान भी ऐसी ही रिपोर्ट आईं हैं।

इन पर राजनीतिक बयानबाजी की औपचारिकता निभाई जाती है। समाज के कलंक बलात्कार के मुद्दे पर, महिलाओं और लड़कियों की सुरक्षा के मुद्दे पर बातें बहुत ज्यादा की जाती हैं लेकिन परिणाम तो हमेशा ढाक के तीन पात ही होते हैं। इसे क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट हमेशा साबित भी करती है। 

देश में राजनीति काफी जटिल हो गई है। वास्तविक जन समस्या राजनीतिक जगत को या तो दिखती नहीं है या सत्य और तथ्य के विपरीत व्यवहार और आचरण कर पब्लिक को मूल मुद्दों से भटका दिया जाता है। जब मूल मुद्दों पर नजर ही नहीं डाली जाएगी तो उनका निदान और उपचार कैसे होगा? 

जन समस्याएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। बुनियादी सुविधाएं जनता से दूर होती जा रही हैं। सिस्टम की नग्नता सिस्टम चलाने वालों को ना मालूम दिखाई नहीं पड़ती हैं या सजावटी और सुंदर वस्त्रों से उनको ढक दिया जाता है। एक बार चुनाव जीतने के बाद पांच साल सरकार में रहना है। फिर जीतेंगे कि नहीं बाद में तय होगा, इसलिए राजनीतिक रंगमंच पर निर्धारित अवधि के लिए तथ्य से ज्यादा अभिनय का सहारा लिया जा रहा है। 

पॉलीटिकल लीडरशिप कितने चेहरे लेकर चलती है, नौकर से मिलना है तो अलग चेहरा, ठेकेदार से मिलना है तो अलग चेहरा और जनता के बीच जाना है तो अलग चेहरा। एक ही दिन में इतने प्रकार के चेहरे सामने आते हैं कि असली चेहरा ही खो जाता है। अलग-अलग चेहरों का अभिनय करते हुए राजनेताओं को कई बार उनके असली चेहरे ही याद नहीं रहते। 

कल्पनाओं का जाल बुना जाता है और उसमें स्वयं डुबकी लगाई जाती है। आजकल राजनीति सपनों के सागर में तैरने का काम करती हुई प्रतीत हो रही है। कल्पना की नौका, शब्दों के जाल पर सवार होकर चेहरे की सजावट कितनी भी कर दे लेकिन सजावट सच्चाई नहीं हो सकती। 

जनता के सामने आज बड़ा धर्म संकट है। राजनीति ही राजनीति को बदनाम और झूठा साबित कर रही है। एक राजनेता-राजनीतिक दल, दूसरे राजनेता-राजनीतिक दल पर इस तरह के आरोप लगाते हैं जिनके प्रमाण नहीं दिए जाते हैं और आरोपों की रस्साकशी में जनता के मूल मुद्दे भटक जाते हैं। एक दूसरे को बेईमान और भ्रष्टाचारी बताने वाले नेता यह भूल जाते हैं कि अंततः सारी राजनीति उसी दलदल में खड़ी है। 

राजनीति में नैतिकता क्या फिर कभी लौटेगी? विधायकों की तोड़फोड़ और रिसोर्ट पॉलिटिक्स क्या राजनीति का मुख्य आधार बन जाएगी? जनादेश से सत्ता पर बैठे नेता स्वयं के लाभ के लिए पद का दुरुपयोग करते जब पाए जाएंगे और उनकी सदस्यता समाप्त करने की बात आएगी तब क्या विधायकों की रिसोर्ट पॉलिटिक्स ही एकमात्र विकल्प होगी? ऐसे मामलों में क्या संबंधित मुख्यमंत्री द्वारा नैतिकता के नाते पद छोड़कर जनमानस में एक उदाहरण कभी पेश किया जाएगा?

भारतीय राजनीतिक रंगमंच के हर दिन की डायरी का अगर डॉक्यूमेंटेशन और फिल्मांकन किया जाए तो ऐसा लगता है उल्टे घड़े की उल्टी राजनीति की यह फिल्म जनता के दिलों को छू लेगी। राजनेताओं की अभिनय की कला के आगे फिल्मी नायक पिछड़ते  दिखाई पड़ रहे हैं। अभिनेताओं की फिल्म भले ही फ्लॉप साबित हो रहीं हों लेकिन सियासी नेताओं की फिल्म लगातार हिट हो रही हैं।