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सीएम चेहरे पर कांग्रेस का कभी नहीं सजा चुनावी साज

सार

एमपी चुनाव में दोनों दलों कांग्रेस और बीजेपी ने सीएम फेस पर अपनी रणनीति बदल दी है. बिना सीएम के चेहरे के 2018 में चुनावी जीत हासिल करने वाली कांग्रेस ने कमलनाथ को अपना सीएम फेस बनाया है तो बीजेपी सीएम फेस की रणनीति में बदलाव कर सामूहिक नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतर रही है.

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विस्तार

एमपी में कांग्रेस सरकार के पतन के पीछे भी सीएम फेस की ही कहानी है. पिछला चुनाव कांग्रेस ने कमलनाथ, ज्योतिरादित्य सिंधिया और दिग्विजय सिंह के सामूहिक नेतृत्व में लड़ा था. कोई सीएम का चेहरा नहीं था. जनमानस ऐसा महसूस कर रहा था कि कांग्रेस की सत्ता आने पर शायद युवा चेहरे को मुख्यमंत्री बनाया जाएगा लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी कमलनाथ को मिली और यहीं से कांग्रेस सरकार के पतन की शुरुआत हो गई थी.

कांग्रेस हिमाचल और कर्नाटक में भी बिना किसी चेहरे के चुनाव मैदान में गई थी. इसके पहले छत्तीसगढ़, राजस्थान और एमपी में भी कोई सीएम का चेहरा नहीं बनाया गया था. मध्यप्रदेश में तो कांग्रेस ने कभी भी चुनाव में सीएम का चेहरा घोषित नहीं किया है. 1993 में जब पहली बार दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने थे, तब भी श्यामाचरण शुक्ल और सुभाष यादव सीएम पद की दौड़ में थे. तब से अब तक मध्यप्रदेश में विधानसभा के छह चुनाव हो चुके हैं, किसी भी चुनाव में कांग्रेस का कोई भी सीएम फेस नहीं था.

अगले महीने हो रहे विधानसभा चुनाव में पहली बार होगा कि कांग्रेस ने कमलनाथ को सीएम फेस बनाया है. चेहरा ताकत होता है तो चेहरा ही कमजोरी भी साबित होता है. एमपी की पॉलिटिक्स में कमलनाथ की सक्सेस स्टोरी काम चलाऊ बहुमत के साथ सरकार बनाने की रही है तो सरकार चलाने की उनकी स्टोरी अनसक्सेसफुल ही रही है. पार्टी एकजुटता और गवर्नेंस में अनसक्सेसफुल चेहरे को सीएम फेस बनाकर चुनाव मैदान में उतरने की कांग्रेस की रणनीति वैसी ही लग रही है जैसी कभी-कभी अपनी राह में हम ही रोड़े बन जाते हैं.

चुनाव में जीत के बाद मुख्यमंत्री का चयन कांग्रेस के लिए हमेशा मुसीबत भरा रहा है. राजस्थान, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक में मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री में सत्ता संतुलन हमेशा पार्टी के लिए सिरदर्द साबित हुआ है. मुख्यमंत्री के पद पर किसी नेता के विरुद्ध भी जब कांग्रेस में बगावत नहीं रोकी जा सकती तो फिर चुनाव में सीएम फेस घोषित करने का रिस्क मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने क्यों लिया है?

राजस्थान में मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उपमुख्यमंत्री रहे सचिन पायलट के बीच पूरे पांच साल राजनीतिक संघर्ष कांग्रेस के पतन का सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है. छत्तीसगढ़ में भी भूपेश बघेल और उपमुख्यमंत्री टीएससिंह देव के बीच सामंजस्य की समस्या लगातार बनी रही है.

मध्यप्रदेश में जब कमलनाथ को मुख्यमंत्री बनाया गया था तब उप मुख्यमंत्री का फार्मूला ज्योतिरादित्य सिंधिया को भी दिया गया था. सिंधिया इसके लिए तैयार नहीं हुए. उनकी ओर से अपने करीबी व्यक्ति को उपमुख्यमंत्री बनाने का सुझाव दिया गया था लेकिन इस पर सहमति नहीं बन पाई.

कमलनाथ का चेहरा कांग्रेस की ताकत है तो वही कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी भी साबित हो रही है. उनकी उम्र युवा राजनीति के साथ तालमेल में बड़ी बाधा दिख रही है. कमलनाथ के चेहरे पर एमपी में 15 महीने की सरकार की एंटी इन्कम्बेंसी भी कांग्रेस के लिए हानिकारक हो सकती है.

दूसरी तरफ बीजेपी 2018 में मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के चेहरे पर चुनाव मैदान में गई थी. भविष्य के सीएम के रूप में उनके चेहरे को ही प्रोजेक्ट किया गया था. बीजेपी को चुनाव में हार का सामना करना पड़ा था. इस बार पार्टी ने सीएम फेस के मामले में अपनी रणनीति बदल दी है. भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चेहरे पर सामूहिक नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतर रही है.

बीजेपी ने केंद्रीय मंत्रियों नरेंद्र सिंह तोमर, प्रहलाद सिंह पटेल, फग्गन सिंह कुलस्ते और केंद्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को अप्रत्याशित ढंग से विधानसभा चुनाव में उतार दिया है. इस चौंकाने वाले घटनाक्रम से बीजेपी ने यह संदेश दिया है कि चुनाव में सफलता मिलने के बाद कोई भी चेहरा मुख्यमंत्री बन सकता है. ज्योतिरादित्य सिंधिया को अभी तक चुनाव में नहीं उतारा गया है लेकिन उनको भी मुख्यमंत्री की रेस में प्रमुख चेहरे के रूप में माना जा रहा है.

कमलनाथ के विरुद्ध मोदी और राज्य के नेताओं के सामूहिक नेतृत्व के बीच में होने वाला यह चुनाव काफी दिलचस्प रहेगा. कमलनाथ सरकार के कार्यकाल को छोड़ दिया जाए तो लगभग 20 साल से बीजेपी की सरकार ही मध्यप्रदेश में काम कर रही है. इतनी लंबी अवधि तक सरकार चलाने के बाद भी बीजेपी के लिए खुशी की बात हो सकती है कि सत्ता विरोधी लहर का वैसा असर दिखाई नहीं पड़ रहा है जैसा 2003 में दस साल की कांग्रेस सरकार के बाद उभर कर आया था और पार्टी चुनाव में 38 सीटों पर सिमट गई थी.

मध्यप्रदेश के विधानसभा चुनाव को लेकर जितने भी ओपिनियन पोल अभी तक आए हैं उनमें कांग्रेस और बीजेपी के बीच कड़ी टक्कर ही बताई जा रही है. पिछले चुनाव को भी मतों के हिसाब से देखा जाए तो बीजेपी को कांग्रेस से अधिक मत मिले थे. कांग्रेस में चुनावी जीत के बाद मुख्यमंत्री के चयन से ही जब बगावत शुरू हो जाती है तो फिर चुनाव के पहले सीएम फेस तो बगावत की गारंटी ही मानी जाएगी. अगर यह फेस ऐसा हो जिसकी सक्सेस स्टोरी पहले से ही सामने आ चुकी हो.

लोकप्रियता की दृष्टि से अगर मध्यप्रदेश के अब तक हुए मुख्यमंत्रियों का सतही ढंग से भी आकलन किया जाएगा तो शिवराज सिंह चौहान को निर्विवाद रूप से पहला स्थान मिलेगा. उनके चेहरे और गवर्नेंस की लोकप्रियता अभी भी सभी ओपिनियन पोल और सर्वे में सामने आ रही कड़ी टक्कर से ही साबित हो जाती है. लंबे समय तक सीएम रहने के कारण निराशा का जो स्वाभाविक दृश्य होता है, वही शिवराज सिंह चौहान के साथ हो रहा है. बीजेपी ने जिस ढंग से मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के चेहरे की बजाय सामूहिक नेतृत्व पर चुनाव मैदान में जाने का फैसला लिया है वह पार्टी नेतृत्व और शिवराज सिंह चौहान का सोचा समझा और मिला-जुलाप्रयास दिखाई पड़ता है.

सीएम बनने के बाद जो फेस कांग्रेस की सरकार नहीं बचा सका. जो कांग्रेस को एकजुट नहीं रख सका. जिस फेस को अभी भी यह स्पष्ट नहीं हो सका है कि उसकी गलती और कसूर क्या था, ऐसे फेस को फिर से सीएम फेस बनाकर चुनाव की रेस कांग्रेस के इतिहास से तो मेल नहीं खाती है.

भाजपा जहां अब तक अपने 136 प्रत्याशी घोषित कर चुकी है. वहीं, कांग्रेस की ओर से एक भी लिस्ट जारी नहीं हो सकी है. जबकि कहा यह जा रहा था कि चुनाव के छह महीने पहले हारी हुई सीटों पर प्रत्याशी घोषित कर दिए जाएंगे. प्रत्याशियों के चयन में घमासान से निपटना भी कांग्रेस के लिए आसान नहीं होगा. किसी भी फेस को चुनाव के लिए अपनी ताकत बनाने के पहले उस फेस की कमजोरी का आकलन नहीं करना कांग्रेस के लिए चुनौती साबित हो सकता है.