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ऑटो मोड में कांग्रेस का प्लेन, बुड्ढों से कैसे करेगी सस्टेन 

सार

कांग्रेस के जहाज से पायलट का पुराना नाता रहा है. इंदिरा गांधी की हत्या के बाद प्रधानमंत्री बनने के पहले राजीव गांधी पायलट ही हुआ करते थे. वैसे तो कांग्रेस के प्लेन का पायलट हमेशा से गांधी परिवार ही रहा है. आज यह भूमिका राहुल गांधी निभा रहे हैं. पायलट की जिम्मेदारी होती है कि वह जहाज को सुविधापूर्वक सुरक्षित गंतव्य पर ले जाए और यात्रियों को समय पर उनकी मंजिल तक पहुंचाने में सफल हो..!

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विस्तार

कांग्रेस का जहाज अब हर राज्य में हिचकोले खा रहा है. जहाज के यात्रियों में अफरातफरी मची हुई है. जहाज के क्रू मेम्बर्स पायलट की ही नहीं सुन रहे हैं. कांग्रेस के राजस्थान का जहाज तो पायलट पर ही चढ़ कर क्रैश होने की तरफ बढ़ता दिखाई पड़ रहा है. यहाँ का पायलट अब अनशन पर आ गया है और गुर्जरों का धड़ा पायलट के साथ खड़ा है. वहीं कांग्रेस के जहाज के पायलट में भ्रम का यह आलम है कि क्रैश लैंडिंग की खबरों के बाद भी चैन के साथ अडानी की बंसी बजा रहे हैं.

राजस्थान में कांग्रेस की राजनीति में अशोक गहलोत का भले ही जलवा हो लेकिन पार्टी के अंदर शोक का माहौल साफ देखा जा सकता है. राजस्थान में जब सरकार बनी थी तब सचिन पायलट ही कांग्रेस के पायलट थे. वही उस समय पार्टी के लिए सत्य और सुंदर थे लेकिन राजनीतिक सत्य को अनुभव से, धन से या प्रभाव से कुछ ऐसा बदला गया कि आज 2018 का कांग्रेस का राज्य अध्यक्ष भ्रष्टाचार पर उस दौरान किए गए वायदों को पूरा करने के लिए अनशन पर उतर गया है.

वैसे तो सात रंग होते हैं लेकिन राजनीति में रंगों की संख्या अनगिनत दिखाई पड़ती है. सचिन पायलट का अशोक गहलोत सरकार के खिलाफ अनशन सीधे तौर पर तो उनकी और गहलोत के बीच चल रही राजनीतिक जंग का नया धारावाहिक लग रहा है लेकिन इसके पीछे स्क्रिप्ट राइटर, डायरेक्टर कोई दूसरा ही सफल चेहरा हो सकता है. राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी के बीच में सीधा राजनीतिक मुकाबला है. अभी तक वहां हर पांच साल में सरकार बदलने का रिवाज रहा है. इसी साल के अंत में होने वाले चुनाव में यही रिवाज कायम रहा तो बीजेपी का सरकार में आना तय माना जा रहा है. 

बीजेपी में अंदरूनी हालात बहुत अच्छे नहीं दिखाई पड़ रहे हैं. वसुंधरा राजे राजस्थान में बीजेपी का बड़ा चेहरा मानी जाती हैं. उनके समर्थक निश्चित ही उन्हें ही सीएम फेस के रूप में देखना चाहते हैं. बीजेपी राष्ट्रीय नेतृत्व की ओर से अब तक जो भी संकेत सामने आए उससे दिखाई पड़ रहा है कि वसुंधरा राजे को शायद इस बार बीजेपी का नेतृत्व मिलना कठिन होगा. वसुंधरा राजे और अशोक गहलोत के बीच में राजनीतिक तालमेल हमेशा से देखा जाता रहा है. सचिन पायलट की बगावत के बाद जब राजस्थान की कांग्रेस सरकार गिरने की संभावना देखी जा रही थी तब भी ऐसा कहा गया था कि बीजेपी के वसुंधरा राजे धड़े ने अशोक गहलोत की सरकार को गिरने से बचाने की भूमिका निभाई थी.

अब सचिन पायलट ने अशोक गहलोत के खिलाफ जो मुद्दा उठाकर अनशन पर बैठने का ऐलान किया है उसमें कांग्रेस के साथ ही बीजेपी की राजनीति भी प्रभावित होती दिखाई पड़ रही है. वसुंधरा राजे के मुख्यमंत्री के रूप में भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच निश्चित रूप से जहां अशोक गहलोत के लिए बड़ी चुनौती रहेगी. वहीं वसुंधरा राजे भी इन मामलों के उभरने से राजनीतिक टारगेट पर आएंगी. सचिन पायलट यह टारगेट जितने असरकारी ढंग से आगे रखने में सफल होंगे बीजेपी में वसुंधरा राजे की भूमिका उतनी ही कमजोर करने में उनके विरोधियों को उतनी ही सहूलियत होगी. 

सचिन पायलट ने जो मुद्दा उठाया है वह निश्चित रूप से जनसामान्य को अपील करने वाला है. कोई भी पार्टी या नेता जब चुनाव के समय कोई मुद्दा उठाता है तो सरकार गठन के बाद निश्चित रूप से उन मुद्दों पर वायदे के मुताबिक कार्यवाही करना उसका नैतिक दायित्व होता है. अक्सर ऐसा देखा गया है कि चुनाव में सरकार के मुख्यमंत्री पर भ्रष्टाचार के आरोप विपक्ष के नेता लगाते हैं. सरकार में आने के बाद विपक्ष के वही नेता कोई कार्यवाही नहीं करते हैं. उसी तरह के कदम और कार्यवाही उनको भी फायदेमंद दिखाई पड़ती है. राजस्थान में भी सचिन पायलट ने भ्रष्टाचार के मामले को पकड़ा है. ऐसा लगता है कि शायद सचिन पायलट ने कांग्रेस से अपना रिश्ता अलग कर नई राजनैतिक लाइन पकड़ने का तय कर लिया है.

सचिन के सामने कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में जाने का विकल्प तो शायद अब नहीं बचा है. उनके सामने तीसरे मोर्चे के रूप में मैदान में उतर कर अपनी राजनीतिक ताकत दिखाने का ही अवसर बचा हुआ है. उनमें इस बात की संभावनाएं दिखाई पड़ती हैं. राजनीति में उम्र उनके साथ है. युवाओं में उनकी लोकप्रियता भी देखी जा सकती है. वे यदि कांग्रेस छोड़कर स्वयं राजनीतिक दल बनाते हैं और चुनाव में उतरते हैं तो अशोक गहलोत और वसुंधरा राजे के विरोध में एक राजनीतिक ताकत के रूप में उभरना उनके लिए बहुत कठिन नहीं हो सकता. इस खेल में उन्हें निश्चित रूप से बीजेपी और गहलोत विरोधियों का सहयोग मिलना तय माना जा रहा है.

कांग्रेस में परिवारवादी राजनीति के भंवर में सचिन पायलट ने राजनीतिक विरासत से आगे बढ़कर अपना राजनीतिक अस्तित्व कायम करने में सफलता हासिल की है. अशोक गहलोत ने कांग्रेस आलाकमान को जिस ढंग से आंखें दिखाई थीं उसके बाद भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करने में सक्षम नहीं हो पाना कांग्रेस के लिए शर्मनाक स्थिति ही कही जाएगी. राजस्थान में नए नेतृत्व की तलाश के लिए मल्लिकार्जुन खडगे ही केंद्रीय पर्यवेक्षक के रुप में गए थे, जो अब कांग्रेस के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। इस समय गहलोत के इशारे पर कांग्रेस विधायकों ने विद्रोह किया था और पर्यवेक्षकों को खाली हाथ लौटना पड़ा था. कांग्रेस के वर्तमान राष्ट्रीय अध्यक्ष ने यह सारा अपमान स्वयं भोगा था. उसके बाद भी गहलोत और उनके समर्थकों के खिलाफ कांग्रेस का कमजोर आलाकमान कुछ भी करने में सफल नहीं हो सका.

सचिन पायलट के लिए कांग्रेस में सीमित संभावनाएं ही दिखाई पड़ रही हैं. अशोक गहलोत और सचिन पायलट के बीच तकरार इस सीमा में पहुंच गई है कि अब दोनों में से कोई एक ही कांग्रेस के जहाज में सुरक्षित यात्रा कर सकता है. सचिन पायलट द्वारा अनशन का ऐलान यह संकेत कर रहा है कि शायद यह पायलट कांग्रेस के जहाज से जंप करने को तैयार हो गया है.