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मप्र में नगर सरकारों के चुनाव, भाजपा की प्रतिष्ठा दांव पर- राघवेंद्र सिंह

सार

राज्य की सभी 16 नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा है. उम्मीदवार चयन में संगठन इस बार पहले से ज्यादा आग्रह करेगा और आवश्यता पड़ने पर आक्रामक भी होगा..!

janmat

विस्तार

मध्यप्रदेश में नगरी चुनाव होने वाले हैं और यहां कांग्रेस को खोने के लिए कुछ भी नही है। दरअसल राज्य की सभी 16 नगर निगमों पर भाजपा का कब्जा है। इसीलिए सियासी तौर पर संगठन की साख बचाने का जबदस्त दवाब भाजपा नेतृत्व पर बना हुआ है। उम्मीदवार चयन में संगठन इस बार पहले से ज्यादा आग्रह करेगा और आवश्यता पड़ने पर आक्रामक भी होगा। उसकी से मर्जी अधिकांश पार्षदों और महापौरों प्रत्याशियों के टिकट तय होंगे।

संवाद और समन्वय की हुई तो टिकट वितरण में असंतोष के नजारे भी खूब दिख सकते हैं। डेमेज कंट्रोल टीम की इस दफा पहले से ज्यादा जरूरत पड़ सकती है। इसके लिए चुगलखोरों और चापलूसों से बचने की नसीहतें भी पार्टी को भीतर और बाहर से थोक में मिल रही हैं। इस सबके बीच हमेशा की तरह कांग्रेस बहुत फिक्रमंद नही है।

करीब तीस साल पहले भी जब वह सत्ता में थी और मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह थे तब उसके नेतागण बिना सिम्बल के नगरीय निकाय चुनाव लड़ चुके हैं।  टिकट वितरण में गुटबाजी और शीर्ष स्तर पर सहमति के अभाव में फ्री फॉर ऑल का निर्णय कांग्रेस कर चुकी है। कहने का आशय यह है कि अब भी उसे खोने का कोई भय नही है। 

एक जून को भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा भोपाल में रहेंगे उनके आगमन से लेकर विधायक समूचा संगठन और सरकार इस बात को लेकर सतर्क रहेगी की चुनाव जैसे मुद्दे पर कोई विवाद के विषय उनके सामने ना आए। साथ ही श्री नड्डा के सामने प्रदेश भाजपा के नए कार्यालय निर्माण और पुराने कार्यालय के तोड़ने का भी कोई जिक्र ना हो। इस तरह के मसले पर संगठन और सरकार ने सारे प्रबन्ध चाकचौबंद कर रखें है। इसलिए अनुमान है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रदेश प्रवास के बाद कुछ असंतोष और पीड़ा के स्वर सुनाई दें।

पार्टी के सामने मुश्किल वक्त टिकट वितरण के समय उपस्थित होगा पार्षदों से लेकर महापौर तक उम्मीदवारों के चयन मैं यदि आयु सीमा का पेस्ट लगा तो 50 के पार वाले अनेक नेता अपने असंतोष को मुखर करेंगे और यदि इस मुद्दे पर डैमेज कंट्रोल में ठीक काम नहीं किया तो चुनाव के पहले बगावत और प्रचार से लेकर मतदान तक सबूटेज की खबरें आम हो जाएगी पार्टी के भीतर ऐसे कद्दावर नेता कम है। 

जो असंतुष्ट लोगों को बुलाकर बात करें और दुखी कार्यकर्ता उनसे संतुष्ट होकर शांत हो जाए। पिछले विधानसभा चुनाव में भी असंतोष की आपको ठंडा नहीं करने के कारण पार्टी को भारी नुकसान उठाना पड़ा था। परिणाम स्वरूप ज़ी टीवी बाजी हाथ से निकल गई थी और कमलनाथ के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार बनी थी। पिछले दिनों मंडल से लेकर जिला अध्यक्ष के निर्वाचन में जिस तरह का संतोष देखने को मिला उससे लगता है। 

नगर निगम चुनाव में भाजपा के भीतर हालात अच्छे नहीं होंगे यही कारण है कि भाजपा की सरकार और संगठन दोनों ही पंचायत से लेकर नगर निगम के चुनाव से बचना चाहते थे लेकिन सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के चलते चुनाव में उतरना पड़ रहा है इसके अलावा अफवाह यह भी थी किस संगठन में नियुक्तियों को लेकर पैसे के लेनदेन हुआ है यदि इसमें थोड़ी भी सच्चाई है तो फिर पार्षद और महापौर के उम्मीदवार चयन को लेकर टिकटों में घपले की खबरें भी सुनाई पड़ सकती है।

पूरे मामले में सरकार के अनुभव और संगठन के जोश के बीच तालमेल रहा तो स्थितियां बिगड़ने से थोड़ी बच सकती हैं। इसमें पचास की आयु पार हुए नेताओं के टिकट कटे तो फिर जीत का सफर मुश्किलों से भरा भी हो सकता है। बस कांग्रेस की नजर भाजपा के असंतुष्ट नेताओं पर रहेगी। भाजपा का दुखी कार्यकर्ता घर बैठा और कांग्रेस की जीत की संभावनाएं मजबूत हो जाएंगी।

युवा हो रही भाजपा की दिक्कत यह है कि उसके पास ऐसा कोई दमदार नेता नही है जिसके आश्वासन पर कार्यकर्ता विश्वास कर ले। अभी तक तो यही दिख रहा है। प्रदेश भाजपा के संगठन महामंत्री हितानन्द शर्मा यह काम शायद कर पाते लेकिन वे इस दायित्व के लिए अभी नए नए से हैं। 

भाजपा के दोनों अध्यक्षों की ससुराल जबलपुर-

यह भाजपा में एक सहयोगी है की पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा और प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा की ससुराल जबलपुर में ही है। भोपाल में कुछ घंटे बिताने के बाद श्री नड्डा और श्री शर्मा एक दिन जबलपुर में भी बिताएंगे। भाजपा की वरिष्ठ नेता पूर्व मंत्री जयश्री बेनर्जी श्री नड्डा की सासु मां है। एक दिन के जबलपुर प्रवास के बाद वे तीन जून को रायपुर प्रस्थान करेंगे। 

कांग्रेस में तो-

प्रदेश कांग्रेस मेंअध्यक्ष भले ही कमलनाथ जी हैं लेकिन संगठन मैं विवाद और असंतोष को लेकर समन्वय की जिम्मेदारी पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह संभाले हुए हैं नाथ और सिंह के बीच कोई अघोषित समझौता जरूर हुआ है जिसे लेकर मैदानी शतरंज की जमावट दिग्विजय सिंह कर रहे हैं और चंबल की पॉलिटिक्स नाथ के हवाले कर दी गई है ऐसे में भाजपा के असंतुष्ट और दिग्विजय सिंह की संगठन क्षमता भाजपा को कड़ी चुनौती दे सकती है।