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तपता भारत: खाने-पीने के संकट का संदेश  

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 05 Mar

सार

भारत में इन दिनों कहीं भी 40 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान नहीं है, इस तस्वीर में मध्यप्रदेश भी शामिल है, जो कभी सघन वन क्षेत्र का हस्ताक्षर हुआ करता था..!

janmat

विस्तार

बीते कल मेरे पास एक मित्र ने भारत की लाल स्याह तस्वीर भेजी। यह तस्वीर गर्मी से धधकते भारत की है। भारत में इन दिनों कहीं भी 40 डिग्री सेल्सियस से कम तापमान नहीं है, इस तस्वीर में मध्यप्रदेश भी शामिल है, जो कभी सघन वन क्षेत्र का हस्ताक्षर हुआ करता था। इतनी गरमी है, तो जल संकट होना स्वाभाविक है।

वैसे भारत तो 2011 से ही पानी की कमी वाला देश घोषित किया जा चुका है। जहां पानी की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 1500 घनमीटर प्रतिवर्ष से कम होती है, उसे पानी की कमी वाला क्षेत्र या देश घोषित किया जाता है। भारत में 2001 में पानी की प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष उपलब्धता 1816 घन मीटर थी, जो वर्ष 2011 तक 1546 घनमीटर रह गयी और वर्ष 2021 तक महज 1367 घन मीटर ही रह गयी। वर्ष 2019 में नीति आयोग ने देश में पानी की स्थिति पर एक बृहद रिपोर्ट तैयार की थी, जिसके अनुसार भारत में 60 करोड़ आबादी लगातार पानी की समस्या से घिरी रहती है।

भारत में दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी है, और दुनिया में उपयोग लायक कुल जल संसाधनों में से मात्र 4 प्रतिशत ही भारत में हैं। इसके बावजूद पानी की समस्या के पीछे जल संसाधनों की कमी नहीं बल्कि इसका अवैज्ञानिक प्रबंधन और असमान वितरण है। भारत में कुल जल के उपयोग में से 70 प्रतिशत खपत कृषि क्षेत्र में है और शेष 30 प्रतिशत जल खपत उद्योग और घरेलू कार्यों में है।

गर्मियों में हर वर्ष देश के अलग-अलग क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण घरेलू जल आपूर्ति बाधित रहती है, पर उद्योग कभी पानी की कमी के कारण बंद नहीं होते। दूसरी तरफ पानी की कमी और गंदे पानी की आपूर्ती के कारण बोतलबंद पानी और आरओ प्लांट जैसे अनेक उद्योग दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ रहे हैं। जब पानी की कमी होती है, तब इन उद्योगों का मुनाफा तेजी से बढ़ता है।

सेंट्रल ग्राउंडवाटर बोर्ड की एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 700 जिलों में से 256 जिलों में भूजल का संकट है। देश की तीन-चौथाई ग्रामीण आबादी के घरों में पाइप से पानी की सुविधा नहीं है और यह आबादी सीधे भूजल पर ही निर्भर है। देश के 70 प्रतिशत से अधिक जल संसाधन, जिसमें सभी बड़ी नदियाँ शामिल हैं, प्रदूषण की चपेट में हैं। राजस्थान में महिलाओं को पानी का इंतजाम करने के लिएऔसतन 3 किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है।

घरों के लिए पानी के इंतजाम की जिम्मेदारी महिलाओं पर लाद दी गयी है, अनुमान है कि वैश्विक स्टार पर महिलाओं को पानी के इन्तजाम के लिए 20 करोड़ घंटे बर्बाद करना पड़ता है। भारत में शहरों के लिए पानी की व्यवस्था सुदूर इलाकों से की जाती है, पर शहरों में पानी की बर्बादी खूब होती है और प्रदूषण में शहरों का योगदान भी बहुत है।भारत  के शहरों में कुल आबादी का 36 प्रतिशत रहता है, पर कुल जल प्रदूषण में से 70 प्रतिशत से अधिक का योगदान इन शहरों का ही है।

सतत विकास पर काम करने वाली अमेरिका के बोस्टन स्थित एक गैर-सरकारी संस्था, केयर्स, ने हाल ही यानी  अप्रेल 2022 में दो वर्षों के अध्ययन के बाद पानी से सम्बंधित एक रिपोर्ट को प्रकाशित की है । यह रिपोर्ट प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नलों में प्रकाशित शोधपत्र, सरकारी दस्तावेज और कुछ देशों द्वारा प्रकाशित पानी से सम्बंधित व्हाईट पेपर पर आधारित हैं। इस रिपोर्ट के अनुसार पानी को अभी तक हम एक असीमित संसाधन मानते हैं और यह भी मानते हैं कि पानी में कितने भी प्रदूषणकारी पदार्थों को मिलाया जाए, पानी साफ़ ही रहेगा।

पर, निश्चित तौर पर अब इन विचारों का कोई आधार नहीं है क्योंकि बढ़ती आबादी और पानी के कुप्रबंधन के बाद जल संसाधनों की क्षमता सीमित रह गयी है। जल संसाधनों का सबसे अधिक अवमूल्यन उद्योग जगत ने किया है, जिसमें कृषि भी शामिल है। अकेले कृषि क्षेत्र में दुनिया के कुल पानी की खपत में से 70 प्रतिशत का उपयोग किया जाता है, जबकि प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में यह खपत 19 प्रतिशत से भी अधिक है। पानी के संकट के सन्दर्भ में पृथ्वी गंभीर खतरे में है, कल मुझे प्राप्त चित्र मैंने अपने पाठकों से साझा किया है, उद्देश्य धरती के बढ़ते बुख़ार को कम करना है ।

यूँ  तो भूजल का स्तर दुनिया में हरेक जगह पहले से अधिक नीचे जा रहा है, महासागर माइक्रोप्लास्टिक से भरे हैं, झीलें सूख रही हैं या फिर शैवाल से भरी हैं, हरेक नदी प्रदूषित है, नदियों का बहाव बाधित किया जा रहा है और रेत-खनन के कारण नदियों का मार्ग बदलने लगा है।

दुनिया की आधी से अधिक नदियों पर बाँध बना कर नहरों के माध्यम से पानी कहीं और भेजा जा रहा है, इससे नदियों के मूल-मार्ग में पानी की भयानक कमी हो रही  है। भारत में पानी की कमी के कारण अनुमान है कि अगले दशक तक गेहूं, चावल और मक्के के उत्पादन में 68 प्रतिशत तक की कमी आयेगी। हवा और पानी दोनों विषाक्त होते हैं, और मानव स्वास्थ्य के लिए भारत में खतरा  तो बढ़ ही रहा है।