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कैसे डले इन नेताओं पर नकेल

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 23 May

सार

स्थिति यह है कि सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की प्रगति पर निगाह रख रही शीर्ष अदालत से बार-बार गुहार लगाई जा रही है

janmat

विस्तार

समाज में घटने वाली हर घटना देश की पहचान को प्रभावित करती है, हमारे देश भारत में तो राज्य सरकार केन्द्रीय जाँच ब्यूरों को दी सहमति वापिस लेकर  उन जन प्रतिनिधियों को सुरक्षा कवच दे रही है, जिनके विरुद्ध अभियोजन की कार्यवाही होनी थी | ऐसे मामले किसी एक राज्य में नहीं देश के ८ राज्यों में वापिस हुए हैं जबकि देश की  न्यायपालिका ने देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में धन और बाहुबल के वर्चस्व से मुक्त कराने के इरादे से समय-समय पर अनेक फैसले दिए हैं । जिसमें दो साल से अधिक की सज़ा पाने वाले पीठासीन सांसदों और विधायकों की सदस्यता तत्काल प्रभाव से खत्म होने जैसी व्यवस्था भी शामिल है।  इसके विपरीत अब देश में  ऐसे दोषी नेताओं को पूरी उम्र के लिए चुनाव लड़ने के अयोग्य घोषित करने की मांग बढ़ रही है |

साफ दिख रहा है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की संख्या में वृद्धि हो रही है। न्यायालय को सौंपी गई एक रिपोर्ट के अनुसार दिसंबर, २०१८ में माननीयों के खिलाफ ४११० मुकदमें लंबित थे जो अक्तूबर, २०२० में बढ़कर ४८५९ हो गए थे। यह इस बात स्पष्ट  संकेत है कि संसद और विधानमंडलों में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ रही है, जिनके खिलाफ अदालतों में आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। उच्चतम न्यायालय की सख्ती के बावजूद राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों को टिकट देने में तरजीह दे रहे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। ऐसे लोगों के पक्ष में दलील है कि “ऐसे उम्मीदवारों को अभी तक अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है|” स्थिति यह रही कि इन राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोपों के दौरान होड़ लगी रही कि प्रतिद्वंद्वी के दामन से ज्यादा साफ हमारा दामन है। चुनाव में आपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को टिकट देने की एक वजह ऐसे तत्वों के खिलाफ लंबित मुकदमों की तेजी से सुनवाई नहीं होना है।
उदाहरण के लिए उच्चतम न्यायालय में ही २०१६  से एक लम्बित जनहित याचिका है।इस याचिका पर न्यायालय लगातार महत्वपूर्ण व्यवस्था दे रहा है और उसके ही हस्तक्षेप का नतीजा है कि राज्यों में इन माननीयों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतों का भी गठन हुआ है। लेकिन, विशेष अदालतों में लंबित मुकदमों की तेजी से सुनवाई नहीं होने की वजह से ऐसे मुकदमों की संख्या बढ़ रही है। एक रिपोर्ट के अनुसार, सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित  मुकदमों में से लगभग २०००  मुकदमें पांच साल से भी ज्यादा समय से लंबित हैं।
जन प्रतिनिधियों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों का तेजी से निपटारा नहीं होने की वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आपराधिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्तियों की भूमिका बढ़ती जा रही है। वर्तमान और पूर्व सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित आपराधिक मुकदमों की तेजी से सुनवाई और ऐसे मामलों में एक साल के भीतर फैसला सुनिश्चित करने के शीर्ष अदालत के हस्तक्षेप से विशेष अदालतें भी गठित की गईं। लेकिन ऐसा लगता है कि शीर्ष अदालत के प्रयासों को अपरिहार्य कारणों से अपेक्षित सफलता नहीं मिल रही है।
विडंबना है कि  उच्चतम न्यायालय की सख्ती के बावजूद राजनीतिक दल ऐसे व्यक्तियों को टिकट देने में तरजीह दे रहे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मुकदमें लंबित हैं। दलील यह है कि ऐसे उम्मीदवारों को अभी तक अदालत ने दोषी नहीं ठहराया है। स्थिति यह रही कि इन राज्यों, विशेषकर उत्तर प्रदेश में राजनीतिक दलों में आरोप-प्रत्यारोपों के दौरान होड़ लगी रही कि प्रतिद्वंद्वी के दामन से ज्यादा साफ हमारा दामन है।

स्थिति यह है कि सांसदों-विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की प्रगति पर निगाह रख रही शीर्ष अदालत से बार-बार गुहार लगाई जा रही है कि माननीयों के खिलाफ आपराधिक मुकदमों की सुनवाई तेज की जाए। साथ ही भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे इन माननीयों के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों को अपनी जांच तेजी से पूरा करना सुनिश्चित कराया जाए।

अभी केन्द्रीय जांच ब्यूरो के पास सांसदों और विधायकों की संलिप्तता वाले ३७   मामलों की जांच लंबित है। इनमें १७  पीठासीन और पूर्व सांसद तथा १७  वर्तमान और पूर्व विधायक जांच के घेरे में हैं। इसी तरह, प्रवर्तन निदेशालय के पास माननीयों से संबंधित ४८ मामलों की जांच लंबित है ।केन्द्र और राज्यों के बीच चल रही खींचतान की वजह से भी केंद्रीय जांच एजेंसियों को अपना काम तेजी से निपटाने में परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।