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पत्नी की जीत पर शपथ लेते पति, महिला सशक्तिकरण को ठेंगा

सार

पहले दमोह और सागर में पत्नियों की जगह पतियों द्वारा शपथ ग्रहण लेने के मामले सामने आए थे, अब विजयपुर में महिला जनपद सदस्यों की बजाए उनके पतियों ने शपथ ले ली है..!

janmat

विस्तार

पंचायत राज में पति-पत्नीवाद का अजब-गजब नजारा देखने को मिल रहा है। दस्तखत पत्नी के और कंट्रोल पति का ऐसा तो लगभग स्वीकार ही कर लिया गया था। सरपंच पत्नियों के पति गर्व से स्वयं को सरपंच पति (एसपी) बताते रहे हैं। इस बार तो मध्यप्रदेश में पंचायत चुनाव में पति-पत्नीवाद ने तो सारी सीमाएं तोड़ दी हैं। चुनाव जीती पत्नी और पद की शपथ ग्रहण कर ली पतियों ने। पहले दमोह और सागर में पत्नियों की जगह पतियों द्वारा शपथ ग्रहण लेने के मामले सामने आए थे, अब विजयपुर में महिला जनपद सदस्यों की बजाए उनके पतियों ने शपथ ले ली है। 

सरकारी अफसर ऐसे पतियों को शपथ कैसे दिला सकते हैं? राजनीति में परिवारवाद आम बात है। ज्यादातर राजनीतिक दल परिवारवाद के इर्द-गिर्द सिमटे हुए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने परिवारवाद को देश के लिए खतरा बताते हुए इसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा भी बना दिया है। 

बीजेपी के विपरीत दूसरे ज्यादातर दल परिवारों द्वारा ही संचालित किए जा रहे हैं। कांग्रेस पार्टी पर गांधी परिवार का वर्चस्व, बीजेपी को परिवारवाद की राजनीति के खिलाफ चुनावी लाभ का अवसर दे रहा है। राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियां परिवारों द्वारा ही चलाई जाती हैं। परिवारवाद की राजनीति में तो परिवार के जितने भी सदस्य पदों पर होते हैं वह दिखाई पड़ते हैं लेकिन आजकल पति-पत्नीवाद का भी ट्रेंड चल रहा है। 

पदों पर पति या पत्नी बैठा है उसके प्रभाव का पूरा प्रयोग पति या पत्नी द्वारा किया जाता है। इस तरह के कई उदाहरण प्रशासनिक हलकों में भी देखे जा सकते हैं। पंचायत राज में तो इस अघोषित पति-पत्नीवाद को विवाह बंधन जैसा सत्ता बंधन का रूप दे दिया गया है। यह बात सोची भी कैसे जा सकती है कि चुनाव में जीत पत्नी की हो रही है तो शपथ पति ले सकता है?

मध्यप्रदेश में ऐसी घटनाओं का होना न केवल दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि महिला सशक्तिकरण की दिशा में सारे प्रयासों को ठेंगा दिखाने वाला है। इसको देख कर तो ऐसा लगता है कि अभी तक सशक्तिकरण के नाम पर जितनी बातें हुई हैं ज्यादातर  कागजी हैं।  

राजनीति और प्रशासन में उच्च पदों पर पति-पत्नी प्रभावशाली स्थानों पर होते हैं। दोनों अपने प्रभुत्व और कर्तव्य का निर्वहन करते हैं। पति-पत्नीवाद का प्रश्न वहां खड़ा होता है, जहां पद पर दोनों में से कोई एक होता है और दूसरा उसके प्रभुत्व का अघोषित उपयोग करता है।  

हर राज्य में ऐसे किस्से सुनने को मिल जाएंगे। लोग प्रभावशाली लोगों के पति और पत्नी के बारे में भी जानकारी रखते हैं। उनके बारे में पब्लिक ओपिनियन बनती है। पब्लिक परसेप्शन बिना किसी आधार के नहीं बनता। कई बार तो सत्ता की सीढ़ी चढ़ने के लिए प्रभावशाली पदधारी के पति या पत्नी का सहारा लेने वाले स्वयं बाद में उद्घोष करते हैं कि उन्हें सफलता कैसे मिली है?

पंचायत राज संस्थाओं में सरपंच पतियों की बढ़ती दखलंदाजी से परेशान मध्यप्रदेश सरकार ने ग्राम सभाओं और पंचायतों की बैठकों में पतियों की एंट्री को ही बैन कर दिया है। सरकार की ओर से पंचायत सचिवों को निर्देश जारी किए गए हैं। इसमें कहा गया है कि पंचायतों में निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के सशक्तिकरण और ग्रामीण विकास में उनकी भूमिका को मजबूत करने के लिए यह आवश्यक है कि ग्राम सभाओं की बैठकों में महिला सरपंचों, पंचों की सक्रिय भागीदारी हो। ग्राम सभा की बैठकों का संचालन, पूर्व सरपंच पति नहीं करें। आदेश में यह भी कहा गया है कि पति इन बैठकों में शामिल भी ना हो। यदि कोई सरपंच पति या पंचपति ग्राम सभा की बैठकों में महिला सरपंचों व पंचों की जगह शामिल होता है तो संबंधित महिला सरपंच को पद से हटा दिया जाएगा।  

जब घोषित रूप से निर्वाचित पत्नी के स्थान पर पति काम कर रहे हैं और सरकार रोकने में सफल नहीं हो रही है, इसके लिए आदेश जारी करना पड़ रहा है तो फिर प्रभावशाली पदों पर बैठे पदधारियों के अघोषित पत्नी-पतिवाद को रोकना कैसे संभव हो सकेगा?

महिलाओं में जागरुकता ही इस समस्या का समाधान हो सकता है। महिलाओं को स्वयं अपने अधिकारों के प्रति दृढ़ रहना होगा। धीरे-धीरे देश में ऐसे हालात बन रहे हैं जहां महिलाएं अपने अधिकारों के लिए लड़ रही हैं। अब सोसाइटी पर पुरुषों का एकाधिकार समाप्ति के दौर में है। भारतीय कानूनों में अब पतियों और पत्नियों को स्वतंत्र कानूनी पहचान प्रदान की जा रही है। आधुनिक युग में न्याय प्रणाली महिलाओं की सुरक्षा पर केंद्रित हुई है। 
 
वर्तमान में पंचायतों और नगरीय निकायों में महिलाओं को आरक्षण की व्यवस्था है। विधानसभा और लोकसभा में महिला आरक्षण को लेकर बहुत लंबे समय से चर्चा हो रही है। महिला आरक्षण बिल संसद में लंबित है। पंचायतों और नगरीय निकायों में महिलाओं को मिले संवैधानिक अधिकार का संरक्षण महिलाएं करने में सफल नहीं हुईं तो विधानसभा और लोकसभा में महिलाओं के आरक्षण की मांग कमजोर हो सकती है। 

पत्नियों की जगह पर पतियों का शपथ ग्रहण करना उन निर्वाचित महिलाओं की मजबूरी ही मानी जाएगी जिन्होंने अपने पतियों को यह अवसर दिया। इस तरह की घटनाएं महिला सशक्तिकरण की दिशा में बाधा पहुंचा सकती हैं। 

समाज में महिलाओं को लेकर सोच में काफी बदलाव आया है। आज महिला और पुरुष बराबरी के साथ आगे बढ़ रहे हैं। जहां पहले महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता था वही आज कई क्षेत्रों में महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया है। शिक्षा और प्रशासकीय तंत्र में महिलाओं ने अपनी योग्यता साबित कर दिया है। राजनीति के क्षेत्र में भी कई महिलाओं ने देश का नाम रोशन किया है।

पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक महिलाओं की भूमिका सशक्त रहे, इसके लिए जरूरी है कि पंचायत पर निर्वाचित महिला जनप्रतिनिधि अपने संवैधानिक दायित्वों का पूरी क्षमता और ताकत के साथ उपयोग करें। अपने पतियों को उनके संवैधानिक दायित्व में हस्तक्षेप से न केवल दूर रखें बल्कि ऐसा संदेश दें कि उनके कामकाज में पति का कोई योगदान नहीं है।