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फला-फूला तो कूनो कहलाएगा भारत का अफ्रीका

सार

देश के टाइगर स्टेट मध्यप्रदेश में अब चीता भी देखने को मिल सकेगा। चीते का कुनबा बसाने और बढ़ाने का गहन और गंभीर दायित्व मध्यप्रदेश को मिल गया है। भारत में लगभग 72 साल पहले विलुप्त हुए चीतों का पुनर्जन्म पालपुर कूनो अभ्यारण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 72वे जन्मदिवस पर हो रहा है। चीते के पुनर्वास और बसाहट का देश में इतिहास रचा जा रहा है। इसके दूरगामी संकेत और मायने दिखाई पड़ रहे हैं। हीरा-मोती जैसा मोदी-चीता का प्रतीकात्मक संदेश अचंभित करने वाला है। वन्यप्राणी विशेषज्ञ आतुरता के साथ वन्यप्राणी इतिहास में आ रहे इस मोड़ को देख रहे हैं।

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विस्तार

इंसानों के लिए तो दुनिया एक गांव जैसी हो ही गई थी लेकिन वन्यप्राणियों के मामले में भी अब दुनिया भी एक ही जंगल जैसी हो रही है। नामीबिया में पैदा हुए चीतों ने कभी नहीं सोचा होगा कि मध्यप्रदेश का पालपुर कूनो उनका बसेरा बनेगा। इस अभ्यारण की परिकल्पना एशियाटिक लॉयन को बसाने के लिए की गई थी। गुजरात के गिर नेशनल पार्क से यह लॉयन मध्यप्रदेश को मिलने थे लेकिन यह हो नहीं सका। 

लंबे समय तक जद्दोजहद के बाद लॉयन की बजाए अब चीता आ रहा है। यह अजीब संयोग है कि गुजरात से लॉयन देने का जब मामला आया था तब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे और गुजरात अपनी पहचान बांटने पर सहमत नहीं हुआ था। घर तो बन गया था लेकिन जिसके लिए बनाया गया था वह जब नहीं मिल पाया तब चीतों को बसाने के बारे में सोचा गया, यह भी संयोग है कि आज नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री हैं और उनके हाथों से ही पालपुर कूनो में चीतों को बाड़े में छोड़ा जाएगा।

भारत में 1952 में चीता को विलुप्त प्रजाति घोषित किया गया था। ऐसा माना जाता है कि 1947 में आखिरी बार चीते को भारत में देखा गया था। यह भी संयोग है कि आजादी के समय जो चीता लुप्त हुआ था, वह आजादी के अमृत महोत्सव के समय मोदी के हाथ से भारत में आबाद हो रहा है। नामीबिया से आ रहे चीतों का पालपुर कूनो में जहां पहला जन्मदिन मनेगा वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का 72 वां जन्मदिन मध्यप्रदेश के इस अभयारण्य में चीतों के आगमन के साथ मनाया जाएगा। 

वन्यप्राणी विशेषज्ञ देश के बाहर से आ रहे चीतों के लिए बसाहट और विकास को बड़ी चुनौती के रूप में देख रहे हैं। यद्यपि सरकार और वन विभाग की ओर से सभी आवश्यक व्यवस्थाएं सुनिश्चित की गई हैं, यहां तक कि अभ्यारण के आसपास के स्थानीय निवासियों में भी चीतों को लेकर उत्साह की लहर देखी जा रही है। 

चीतों के भोजन के लिए जहां कई जगह से चीतल इस अभ्यारण में लाए गए हैं। वहीं उनके प्राकृतिक रहवास की व्यवस्थाएं भी सुनिश्चित की गई हैं। इस बात पर लोग शंकास्पद हैं कि बाहर से आ रहे चीते प्राकृतिक रूप से अपने कुनबे का विस्तार करने में सफल होंगे? आशा यही की जाती है कि सफलता मिलेगी। अगर ऐसा हो गया तो पालपुर कूनो भारत का अफ्रीका कहलाएगा। टाइगर आज मध्यप्रदेश में पर्यटन के बड़े आकर्षण के रूप में देखे जाते हैं। चीते भी इस अंचल में पर्यटन को नई दिशा और गति दे सकते हैं। 

भगवान राम के वनवास जाने के बाद और राजा दशरथ की मृत्यु के उपरांत भरत को दिलासा देते हुए मुनि वशिष्ठ कहते हैं- 

सुनहु भरत भावी प्रबल, बिलखि कहेउ मुनिनाथ।
हानि लाभु जीवनु मरनु, जसु अपजसु विधि हाथ॥

इसे भावी ही माना जाएगा कि आजादी के अमृत काल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथ ही चीता भारत आ रहा है। इसके पहले पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भारत में चीतों के पुनर्वास के बारे में पहल की थी लेकिन उनको सफलता नहीं मिली थी। यह सफलता आज प्राप्त हुई है।  

गति के लिए चीते का प्रतीकात्मक उपयोग भारत में अक्सर किया जाता है। पुलिस और सेना के संगठन अपनी गति के लिए ‘चीता ब्रिगेड’ और ‘चीता वाहन’ जैसे शब्दों का उपयोग अक्सर करते हैं। गति के इस प्रतीक में भी मोदी और चीता का तालमेल बैठता है। भारत में राजनीति की जो धारा विलुप्त थी, उसने 2014 में मोदी के नेतृत्व में गति पकड़ी और वह चीतागति लगातार गतिमान होती जा रही है। 

चीता सबसे निडर प्राणी माना जाता है। निडरता की दृष्टि से भी मोदी की चीता से तुलना की जा सकती है, उनको डराना आसान नहीं होता। संगठन और सरकार में जिस तरह से आज फैसले अंजाम दिए जा रहे हैं, उस चीतागति से लोग भयभीत होते हैं। चीता दहाड़ता नहीं है चीता होना ही लोगों को डराता है। मोदी भी दहाड़ने से परहेज करते हैं शांति से ही लोग भयाक्रांत हो जाते हैं। 

चीता इस धरती पर सबसे तेज दौड़ने वाला जानवर है। इसकी गति 100 से 120 किलोमीटर प्रति घंटे होती है। यह गति चीता 3 सेकंड में पकड़ सकता है। जबकि अभी तक कोई भी ऐसी गाड़ी नहीं आई है जो 3 सेकंड में इतनी गति पकड़ सकती हो। गाड़ियों को इतनी गति पकड़ने के लिए कम से कम 6 सेकंड लगते हैं। 

आज भारत में कहीं भी चीता नहीं है। चीते के बारे में ऐसा माना जाता है कि इनके बच्चे बहुत जल्दी मर जाते हैं। इसके बच्चे बड़ी मुश्किल से बचते हैं। इसके विलुप्त होने का यही बड़ा कारण माना जाता है। चीता जब दौड़ता है तो आधा समय हवा में रहता है। दौड़ते समय चीता 7 मीटर यानी करीब 30 फीट की छलांग लगा सकता है। चीतों के बारे में एक और खास बात है कि मादा चीता अकेली ही रहती है। मादा चीता सिर्फ सेक्स के लिए नर चीता से मिलती है। इसके बाद दोनों फिर से अलग अलग हो जाते हैं। मादा चीता जहां अकेले रहती है वहीं नर चीते अपना एक गैंग बना लेते हैं। एक झुंड में चार-पांच चीते होते हैं।   

चीतों के लिए पालपुर कूनो में 12 वर्ग किलोमीटर का बाड़ा तैयार किया गया है। इसे 8 भागों में बांटा गया है। इन सभी बाड़ों के बीच 10 हेक्टेयर का एक छोटा एरिया भी रखा गया है जिसमें चीतों के भोजन चीतल रहेंगे। चीतल के बाड़े को इस तरह से डिजाइन किया गया है कि इसका एक गेट उसी तरफ खुलेगा जिसमें चीतों को रखा जाएगा। दो महीने तक इस छोटे बाड़े में चीतों को रखा जाएगा। उसके बाद उन्हें 500 हेक्टेयर के बड़े बाड़ों में छोड़ा जाएगा। 

चीतों के आने की ऐतिहासिक घटना को लेकर सोशल मीडिया पर तरह-तरह की राजनीतिक टिप्पणियां भी हो रही हैं। 'टाइगर आया-चीता लाया' के साथ में 'चीता टाइगर का शिकार करने आया' जैसी टिप्पणियां पालपुर कूनो में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हाथों इस ऐतिहासिक अवसर को जन-जन तक पहुंचाने का जरिया बन गया है।