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आरोपों से नहीं जनसेवा से कांग्रेस का बढ़ेगा इकबाल

सार

एमपी में कांग्रेस ने पहली बार भ्रष्टाचार के किसी मामले की जांच के लिए लोकायुक्त में शिकायत की है. मध्यप्रदेश में शायद यह भी पहली बार हुआ है कि मुख्य सचिव के विरुद्ध लोकायुक्त में विपक्षी दल की ओर से जांच के लिए शपथ पत्र दिया गया है. मुख्य सचिव के विरुद्ध लोकायुक्त को जांच का शपथ पत्र देते समय कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ नेतागण, पूर्व मुख्यमंत्री, विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष और राज्यसभा के विद्वान सदस्य भी मौजूद थे.

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विस्तार

शिकायत के बाद प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में बाकायदा  प्रेस कॉन्फ्रेंस की गई. वैचारिक बांझपन से जूझ रही कांग्रेस शायद अपने शासन-प्रशासन के अनुभव भी भुला चुकी है. कांग्रेस ने भ्रष्टाचार के जिस मामले में मुख्य सचिव और दूसरे अधिकारी के खिलाफ शिकायत की है उससे ऐसा लगता है कि कांग्रेस की मान्यता अनुसार भ्रष्टाचार ब्यूरोक्रेसी द्वारा ही किया जाता है.

कांग्रेस ने एक तरह से निर्वाचित सरकार को क्लीन चिट दे दी है. पोषण आहार के जिस मामले की जांच की मांग की गई है उस मामले में ब्यूरोक्रेसी को ही शायद कांग्रेस निर्णायक मानती है. निर्वाचित सरकारों में बदलाव होता है. ब्यूरोक्रेसी तो वही होती है. कमलनाथ की 15 महीनों की सरकार में भी यही ब्यूरोक्रेसी काम कर रही थी जिसके खिलाफ आज कांग्रेस भ्रष्टाचार की जांच के लिए शिकायत कर रही है.

ब्यूरोक्रेसी का चाबुक अपने हाथ में रखने का दंभ रखने वाले शासन के पुराने खिलाड़ी कांग्रेस के नेता क्या मुख्य सचिव के अधिकार और कर्तव्य से परिचित नहीं हैं? शासन के किसी भी विभाग में कोई नीतिगत निर्णय के लिए मुख्य सचिव को कौन से अधिकार प्राप्त हैं? राज्य मंत्रिपरिषद के सचिव के नाते कैबिनेट के सामने विषयों को प्रस्तुत करना और निर्णय को संसूचित और क्रियान्वित कराना मुख्य सचिव का दायित्व है. निर्णय सदैव निर्वाचित सरकार द्वारा ही लिए जाते हैं.

कांग्रेस के नेता भ्रष्टाचार की जांच के लिए गंभीर नहीं हैं अन्यथा शिकायतों के जरिये जो निशाना साधा जा रहा है जब निशाना ही गलत है तो गोली तो बर्बाद होगी ही. कांग्रेस बस केवल इस पर खुश हो सकती है कि वह जनता में यह संदेश देने में सफल हो रही है कि पार्टी भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ रही है. मध्यप्रदेश में इतिहास है कि जब विपक्ष ने मुख्यमंत्री के भ्रष्टाचार के खिलाफ अदालतों में जाकर न्याय हासिल किया है तब कांग्रेस के तत्कालीन मुख्यमंत्री को अपना पद छोड़ना पड़ा है. यह निर्णायक लड़ाई बीजेपी के तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष कैलाश जोशी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह के खिलाफ लड़ी थी.  ब्यूरोक्रेसी को टारगेट करके राजनीतिक हित साधने को वैचारिक शून्यता ही  कहा जाएगा.

एमपी कांग्रेस ने पिछले दिनों सरकार के खिलाफ कई लाख करोड़ के घोटाले के आरोप लगाते हुए एक आरोप पत्र जारी किया था. जब इतने बड़े-बड़े नेता लोकायुक्त कार्यालय जा ही रहे थे तो कम से कम उस आरोप पत्र की जांच के लिए भी लोकायुक्त के सामने शपथ पत्र दे देते. मुख्य सचिव और आजीविका मिशन के डायरेक्टर के खिलाफ दी गई शिकायत में नियंत्रक महालेखा परीक्षक (कैग) रिपोर्ट के हवाले से 500 करोड रुपए के पोषण आहार घोटाले के आरोप लगाए गए हैं. 

नियंत्रक महालेखा परीक्षक हर साल विधानसभा में अपना प्रतिवेदन प्रस्तुत करता है. ऐसा कोई भी एक प्रतिवेदन नहीं होगा जिसमें किसी न किसी विभाग की वित्तीय अनियमितताओं और प्रक्रिया की गड़बड़ियों के संबंध में ब्योरा नहीं दिया जाता है. एमपी में  कांग्रेस 50 सालों से ज्यादा सरकार में रही है. कैग की रिपोर्ट के आधार पर अपराधिक प्रकरण दर्ज कराने का कांग्रेस ने क्या कभी साहस दिखाया है? प्रकिया में गड़बड़ियों के बारे में कई बार शासन कैग को संतुष्ट भी करता है.

कैग के प्रतिवेदनों की वैधानिक स्थिति निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की लोक लेखा समिति के प्रतिवेदन पर जाकर समाप्त होती है. भारत में जब महालेखा परीक्षक के प्रतिवेदन पर आपराधिक कार्यवाही शुरू होने की वैधानिक स्थिति बना दी जाएगी तब ब्यूरोक्रेसी निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की निरंकुशता को कभी स्वीकार नहीं करेगी. शासन के किसी भी क्रियान्वयन में प्रक्रिया की गड़बड़ियां कई बार अनभिज्ञता से तो कई बार सोची-समझी योजना के तहत भी होती हैं. चुनाव के समय अचानक ब्यूरोक्रेसी पर कांग्रेस के सियासी हमले यही दर्शाते हैं कि बीजेपी से राजनीतिक मुकाबले में कांग्रेस ब्यूरोक्रेसी को मोहरे के रूप में उपयोग कर रही है.

मध्यप्रदेश के वर्तमान मुख्य सचिव को केंद्र शासन द्वारा सेवावृद्धि दी गई है. इस पर भी कांग्रेस को आपत्ति है. कोई भी अफसर संविदा या सेवावृद्धि स्वेच्छा से तो नहीं ले सकता. संविदा या सेवावृद्धि तभी मिलती है जब जनादेश से निर्वाचित सरकार इसे उपयुक्त समझती है. इसके लिए संबंधित पर आरोप लगाकर हमले करना राजनीतिक कुंठा के अलावा कुछ भी नहीं कहा जाएगा.

15 महीने की सरकार के बाद चुनाव के मुहाने पर पहुंचे मध्यप्रदेश में कांग्रेस ने भ्रष्टाचार का एक गंभीर मामला जो समझा है वह ब्यूरोक्रेसी के खिलाफ पकड़ में आया है. क्या कांग्रेस सत्तारूढ़ राजनेताओं के खिलाफ आरोप लगाने से डरती है? कांग्रेस ने अपने आरोपपत्र में पोषण आहार घोटाले की राशि 15 हज़ार करोड़ रुपए बताई थी लेकिन शिकायत केवल पांच सौ करोड़ रुपए के घोटाले की है. घोटाले के आरोप में कांग्रेस ने 14 हज़ार पांच सौ करोड रुपए का घोटाला कर दिया.

ब्यूरोक्रेसी पर चढ़ाई से कांग्रेस को सत्ता की मलाई नहीं मिल सकेगी. इसके लिए कांग्रेस नेताओं को बीजेपी का नीति और विचारधारा के आधार पर मुकाबला करना होगा. आरोपों से नहीं जनसेवा से कांग्रेस का इकबाल बढ़ सकता है. पार्टी के इकबाल के लिए ब्यूरोक्रेसी के इकबाल को कमतर करने के प्रयासों से ब्यूरोक्रेसी का बाल बांका नहीं होगा. ब्यूरोक्रेसी तो आदेश मानती है और इसके लिए ताकत तो जनादेश ही दे सकता है.