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बेकार के मुद्दे छोड़ें, “बेरोजगारी” हटाने पर काम करें -राकेश दुबे 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 19 May

सार

संसद में सरकार द्वारा पेश की गई जानकारी विचलित करती है कि पिछले तीन सालों में बेरोजगारी व कर्ज के चलते 26 हजार लोगों ने मौत को गले लगा लिया, आरोप है कि देश में बेरोजगारी का आंकड़ा पिछले पांच दशक में सर्वाधिक है...

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विस्तार

देश के नियंता, नेता और नागरिक जिन मुद्दों पर सडक से सर्वोच्च न्यायालय तक लड़ रहे हैं उससे देश का कितना भला होगा यह समझे बगैर उन मूल मुद्दों की उपेक्षा कर रहे हैं जिससे देश का भला होगा और देश विकास करेगा |यह मुद्दा बेरोजगारी है, जिससे सारा समाज प्रभावित है |स्कूल की पोशाक का मुद्दा इसके मुकाबले, कुछ भी नहीं है, वैसे आज सबको मिलकर इसे दूर करने के लिये युद्धस्तर पर अभियान चलाने की जरूरत है। 

संसद में सरकार द्वारा पेश की गई जानकारी विचलित करती है कि पिछले तीन सालों में बेरोजगारी व कर्ज के चलते २६ हजार लोगों ने मौत को गले लगा लिया। निस्संदेह, यह महज सरकारी आंकड़ा है लेकिन इस समस्या के मूल पर सोचने और कुछ करने की फौरन जरूरत है।वैसे बेरोजगारी हमारी अर्थव्यवस्था का सनातन संकट है लेकिन कोरोना दुष्काल ने इस संकट में ईंधन का काम किया है। विपक्ष लगातार बेरोजगारी के संकट के लिए सरकार की घेराबंदी करता रहा है। आरोप है कि देश में बेरोजगारी का आंकड़ा पिछले पांच दशक में सर्वाधिक है। 

बजट सत्र में राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों का हवाला देते हुए गृह राज्य मंत्री ने राज्यसभा में एक प्रश्न के लिखित जवाब में जानकारी दी थी कि बेरोजगारी व कर्ज के चलते तीन साल में 26 हजार लोगों ने आत्महत्या कर ली। यहां तक कि दुष्काल के पहले वर्ष 2020 में बेरोजगारों की आत्महत्या का आंकड़ा तीन हजार पार चला गया। इस दौरान बेरोजगारी के चलते 3548 लोगों ने आत्महत्या की। जबकि वर्ष २०१९ में 2851 और में  2018 लोगों ने बेरोजगारी के कारण आत्महत्या कर ली।

सरकार ने बताया कि वर्ष 2018 से 2020 के बीच 16000 से अधिक लोगों ने दिवालियेपन या कर्ज में डूबने के कारण आत्महत्या की। गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय के अनुसार, वर्ष 2020 में 5213 लोगों, 2019 में 5908 और 4970 में 2018 लोगों ने आत्महत्या कर ली। निस्संदेह, बेरोजगारी और आर्थिक संकट के चलते आत्महत्या करने के आंकड़े का बढ़ना देश के नियंता, नेता और नागरिक सभी के लिये चिंता का विषय होना चाहिए। कहने को विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार पर हमले करता रहा है, पर कभी कोई सकारात्मक तर्क उसने नहीं दिए । राजग सरकार के कार्यकाल २०१४ -२०२० के बीच बेरोजगारों के खुदकुशी के १८७७२ मामले दर्ज किये गये, जो हर साल औसतन ढाई हजार से अधिक होते हैं।

ऐसी ही स्थिति यूपीए सरकार के दौरान सात साल के आंकड़ों में सामने आती है। वर्ष २००७ से २०१३ के बीच बेरोजगारी के कारण आत्महत्या करने के १५३२२ मामले प्रकाश में आये थे। इस दौरान हर साल आत्महत्या का औसतन आंकड़ा दो हजार से अधिक ही था। लोकसभा में राहुल गांधी बेरोजगारी का मुद्दा उठाते रहते हैं। उनकी दलील है कि वर्तमान में बेरोजगारी की दर पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने लोकसभा में कहा था कि देश में मौजूदा बेरोजगारी की दर बांग्लादेश की तुलना में तेजी से बढ़ी है। इनने इसे दूर करने के लिए कोई तर्कसंगत बात नहीं की | यह मुद्दा सरकारों का नहीं सबका है, पर हमरी प्राथमिकता कुछ और है |

देश में बढ़ता बेरोजगारी संकट एक बड़े संकट की आहट की तरह भी है जो कालांतर में सामाजिक असंतोष का वाहक हो सकता है । सार्वजनिक मंचों से लगातार कहा जाता रहा है कि भारत युवाओं का देश है, लेकिन नीति-नियंताओं से सवाल किया जाना चाहिए कि हम ऐसा कारगर तंत्र क्यों विकसित नहीं कर पाये हैं जो हर हाथ को काम दे सके। निस्संदेह, हमारी शिक्षा प्रणाली में भी खोट है, जो बाबू तो बनाती है लेकिन कामकाजी हुनर के मामले में दुनिया से पीछे है। देश में व्याप्त भ्रष्टाचार, आर्थिक असमानता, राजनीतिक विद्रूपता तथा बढ़ती जनसंख्या जैसे कई कारक बढ़ती बेरोजगारी के मूल में हैं, लेकिन देश को इस संकट से उबारना सरकारों का प्राथमिक दायित्व होना चाहिए। हर चुनाव आने पर लाखों-करोड़ों नौकरी देने का वादा तो जोर-शोर से सामने आता है, जो चुनाव के बाद पांच साल मुद्दा ठंडे बस्ते में चला जाता है।उस पर सब काम करें, देश की युवा आबादी को काम देने के लिये वैकल्पिक रोजगार के उपायों पर ठोस काम होना चाहिए। ये घोषणाएं महज सस्ती लोकप्रियता पाने व राजनीतिक लाभ उठाने का जरिया न बनें।