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राजनीति में ताजगी की बाट जोहता मध्यप्रदेश

सार

मध्यप्रदेश में चुनावी बिसात पर जीत हार के दावे हर ओर से आने लगे हैं. सियासी पार्टियों से ज्यादा नेताओं के चेहरों पर दांव लगाए जा रहे हैं. राज्य में मुख्य दोनों दलों में सियासत चेहरों के इर्द-गिर्द ही घूम रही है. विपक्ष के रूप में कांग्रेस, सरकार और मुख्यमंत्री के विरुद्ध एंटी इनकंबेंसी के भरोसे अपनी सत्ता के सपने बुन रही है तो सरकार कांग्रेस के प्रदेश नेतृत्व के उबाऊ चेहरे और बासीपन से आस लगाए हुए है.

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विस्तार

जहां भी ताजगी नहीं होती वहां मुर्दानगी और निराशा स्वाभाविक रूप से देखने को मिलती है. एमपी की राजनीति में भी ऐसा ही माहौल दिखाई पड़ रहा है. दोनों दलों में नेतृत्व के खिलाफ कार्यकर्ताओं में भविष्य की आशा से ज्यादा ऊब और निराशा का माहौल देखा जा रहा है. राजनीति में बदलाव और नए नेतृत्व की आवश्यकता निराशा को खत्म करने कैडर में उत्साह और ताजगी बढ़ाने के लिए हमेशा से किया जाता रहा है.

एंटीइनकंबेंसी सरकार, मुख्यमंत्री और मंत्रियों के खिलाफ ही नहीं होती बल्कि राजनीति में लंबे समय से स्थापित चेहरों के प्रति भी होती है. देश में इस संबंध में अनेक उदाहरण देखे जा सकते हैं जब स्थापित नेताओं को बिल्कुल नए और पहली बार चुनाव मैदान में उतरे नौसिखिया लोगों ने चुनाव में पराजित कर दिया.

मध्यप्रदेश में नगरीय निकायों के उपचुनाव में छिंदवाड़ा में पार्षद के चुनाव परिणाम ने चौंकाया है. कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ जो भावी और अवश्यंभावी मुख्यमंत्री के रूप में प्रचारित किए जा रहे हैं उनके विधानसभा क्षेत्र और पुश्तैनी राजनीतिक गढ़ में बीजेपी ने जीत हासिल की है. यह परिणाम इस बात का स्पष्ट संकेत है कि कमलनाथ के खिलाफ उनके ही जिले में एंटी इनकंबेंसी चरम पर है. 40 सालों से अधिक समय से कमलनाथ वहां से निर्वाचित सांसद बनते रहे हैं. अब उनके बेटे नकुलनाथ छिंदवाड़ा से सांसद हैं. छिंदवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से कमलनाथ स्वयं विधायक हैं. छिंदवाड़ा जिले की राजनीति कमलनाथ के इशारे और सहारे पर चलती रही है. जब भी सियासत में लंबा वक्त पद पर हो जाता है तब स्वाभाविक रूप से लोगों में नाराजगी बढ़ने लगती है. यही छिंदवाड़ा में भी हो रहा है. कांग्रेस के लिए छिंदवाड़ा में अपने पक्ष में जनादेश हासिल करना सबसे बड़ी चुनौती लग रही है.

बीजेपी में भी एकमात्र चेहरा मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान हैं. इतिहास इस बात का गवाह है कि शिवराज सिंह चौहान के पहले एमपी में बीजेपी कभी भी पांच साल का कार्यकाल पूरा करने में सफल नहीं हुई थी. जबसे उन्होंने मुख्यमंत्री का पद संभाला है तबसे बीजेपी ने ना केवल पांच साल तक सरकार का कार्यकाल पूरा किया बल्कि जनादेश हासिल कर फिर से सरकार बनाई. 2108 के बाद 15 महीने के भीतर कांग्रेस सरकार के पतन के बाद शिवराज सिंह चौहान ने फिर से प्रदेश में सरकार स्थापित की और  उपचुनाव में विधायकों ने नया जनादेश हासिल किया.

स्वाभाविक रूप से अगले चुनाव में शिवराज सिंह चौहान ही इस बार भी बीजेपी के फेस माने जा रहे हैं. राजनीतिक विश्लेषक कार्यकर्ताओं में नीरसता देख रहे हैं जो लंबे समय तक शासन के कारण हो सकती है. यद्यपि कार्यकर्ताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि जो पार्टी कभी पांच साल का कार्यकाल भी पूरा नहीं कर सकती थी वह पार्टी आज इतने लंबे समय से सत्ता पर काबिज है तो इसका श्रेय शिवराज सिंह चौहान को ही जाएगा.

आजकल सियासत दलों और संगठन से ज्यादा व्यक्तिगत हित और अहित पर निर्भर हो गई है. संगठन से ज्यादा व्यक्तिवाद की राजनीति काम करने लगी है. संगठन के नजरिए से अभी भी बीजेपी कांग्रेस से अधिक मजबूत स्थिति में मानी जा सकती है. राजनीति में लोगों के मन में निराशा का भाव बढ़ता जा रहा है. चुनाव आयोग और राजनीतिक दलों के तमाम प्रयासों के बावजूद भी मतदान का प्रतिशत अभी भी अपेक्षित ढंग से बढ़ नहीं पा रहा है. लोग वोट देने जाने से भी कतराने लगे हैं. बदलाव और नयापन प्रकृति का नियम है. उबाऊ और थकाऊ परिस्थितियां सियासत के प्रति निराशा को बढ़ा रही हैं.

मध्यप्रदेश में एक दौर था जब राजनीति से निराशा इतनी बढ़ गई थी कि कई स्थानों से किन्नर जनप्रतिनिधि चुने गए थे. यह बात इसलिए अजीब लग रही थी कि सामान्यतः ऐसा सियासत में होता नहीं था लेकिन यह किन्नरों का भी अधिकार है. इस पर किसी को आपत्ति नहीं है. राजनीतिक बासीपन और निराशा के दौर के खिलाफ जनादेश का यह बम विस्फोट ही माना जाएगा. 

सियासत में स्थापित राजनेताओं को कई बार ऐसे सामान्य कार्यकर्ता पटकनी दे देते हैं. जिनके बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था. पंजाब के चुनाव में मुख्यमंत्री चरणजीत चन्नी को मोबाइल रिपेयर दुकान पर नौकरी करने वाले प्रत्याशी ने हराया था. ऐसी घटनाओं को देखकर ऐसा लगता है कि मतदाता केवल हराने के लिए मतदान करते हैं. ऐसी परिस्थितियां निर्मित क्यों होती हैं कि मतदाता को सकारात्मक मतदान की बजाए हराने के लिए मतदान करने की नौबत तक आती है.

सियासी वायदों और उनकी पूर्ति में सामंजस्य ना होने के कारण भी राजनीतिक क्षेत्र में निराशा का वातावरण बनता है. राजनेताओं के बड़बोलेपन से जनता में ऊब पैदा होती है. एमपी की राजनीति इस समय बडबोलेपन से भरी हुई है. ऐसे वायदे और गारंटियां आज मतदाताओं को दी जा रही हैं जिनकी पूर्ति का कोई वित्तीय ढांचा किसी के भी समझ नहीं आ रहा है. दोनों मुख्य दल मतदाताओं को लुभाने के लिए कोई कसर छोड़ने को तैयार नहीं है. राज्य की अर्थव्यवस्था और वित्तीय संसाधनों पर कोई भी बात करने को तैयार नहीं है. मध्यप्रदेश के लिए आने वाला चुनाव ऐसा पहला चुनाव होगा जिसमें दोनों मुख्य प्रतिद्वंदी दलों बीजेपी और कांग्रेस को पांच  साल की अवधि में सरकार चलाने का अवसर मिला. दोनों दलों की सरकारों की उपलब्धियाँ और एंटीइन्कम्बेंसी जनता के सामने है 

बिजली पानी सड़क के मुद्दे पर दशकों पहले कांग्रेस की सरकार की पराजय के बाद 2018 में कांग्रेस को सरकार चलाने का मौका मिला था. यदि बिजली पानी सड़क के हालातों पर नजर डाली जाएगी तो निश्चित रूप से इन स्थितियों में काफी सुधार हुआ है. पुराने और बूढ़े कंधों पर तो नवउत्कर्ष की कल्पना कागज पर ही की जा सकती है. वास्तव में तो जब भी कोई सार्थक और कल्याणकारी नवोदय हुआ है  वह नए और युवा नेतृत्व से ही संभव हो सका है. 

एमपी की राजनीति में अगले चुनाव में दोनों दलों को एंटी इनकंबेंसी का सामना करना पड़ेगा. चेहरों के साथ ही संगठन और सरकार के कामकाज पर भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं दोनों दलों में उभर रहे असंतोष और टकराहट को देखते हुए यही कहा जा सकता है कि एमपी की राजनीति आज ताजगी की बाट जोह रही है.