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पैदल चलने को ससम्मान क़र्म  बनाए 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 19 May

सार

विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में राहगीरों की मौत की संख्या दोगुणी हो गई है..!

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विस्तार

पैदल चलना-फिरना या आना-जाना वह वैश्विक नित्य कर्म है जो सबके जीवन का अभिन्न अंग है, सड़कों पर पैदल चलना ससम्मान हो। यह प्रत्येक नागरिक और सरकार का प्राथमिक कर्तव्य है कि पैदल यात्रियों की सुरक्षा को सर्वोपरि स्थान दे। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट बताती है कि दुनियाभर में राहगीरों की मौत की संख्या दोगुणी हो गई है- वर्ष 2013 में 6.6 प्रतिशत से 2016 में बढ़कर 12.9 प्रतिशत हुई। प्रति एक किलोमीटर पैदल चलने वालों के लिए मौत का जोखिम कार-सवारों के मुकाबले नौ गुणा अधिक है।

राष्ट्रीय अपराध लेखा-जोखा ब्यूरो रिपोर्ट-2021 के मुताबिक, हर साल सड़क पर पैदल चलने वालों की लगभग 18,900 मौतें होती हैं अर्थात हर दिन 51 पैदल यात्रियों की मृत्यु। यह हकीकत न केवल शहरों की है बल्कि देश के ग्रामीण इलाकों की भी है।

सड़क दुर्घटनाओं के शिकार लोगों में अधिकांश संख्या पैदल राहगीरों या साइकिल सवारों की है। हाल के वर्षों में शहरी इलाकों के सड़क हादसों में मारे गए लोगों में 50 प्रतिशत से अधिक गिनती पैदल चलने वालों की रही है। वर्ष 2022 में विभिन्न सड़कों पर 1,100 राहगीर मरे। इससे स्पष्ट है कि कुल सड़क दुर्घटनाओं में मौतों की संख्या घटाने में पैदल यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भूमिका बहुत बड़ी है।

पैदल राहगीरों की मौत में अधिकांश वे हैं जो कामकाजी आयु वर्ग में आते हैं। उनमें बहुत से अपने परिवार के एकमात्र कमाऊ सदस्य होते हैं और न्यूनतम आय एवं सामाजिक रूप से कमजोर वर्ग से होते हैं। ‘चलने का हक’ सिद्धांत मानव अधिकारों में एक मूल तत्व है, जो किसी की आने-जाने और सार्वजनिक जगहों पर जाने की आजादी यकीनी बनाता है। इसके महत्व को समझते हुए उच्च एवं सर्वोच्च न्यायालय समय-समय पर पैदल चलने वालों के हित और सुरक्षा मज़बूत बनाने पर जोर देने वाले फैसले देते आये हैं। 

संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत पैदल यात्रियों के अधिकार सुनिश्चित करने में उच्च न्यायालय ने बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसी तरह, सर्वोच्च न्यायालय ने देविंदर सिंह नेगी बनाम भारत सरकार एवं अन्य मामले में पैदल यात्रियों के अधिकारों के समर्थन में महत्वपूर्ण अंतरिम फैसला सुनाया है। इन कानूनी दखलों का मकसद सड़क योजना बनाने वक्त पैदल यात्रियों की एवज पर वाहन चालन को तरजीह देने वाले पक्षपाती नज़रिये को सुधारना है। पैदल चलने के अधिकार को मान्यता देकर हम सुरक्षित सड़कों को अधिक सुरक्षित और सबको साथ लेकर चलना सुनिश्चित करते हैं। 

‘पैदल चलने का अधिकार’ नामक पहल न्यायालय के उक्त फैसलों पर आधारित है जो सड़कों को सुरक्षित बनाने एवं राहगीरों के लिए यथेष्ट इंतजाम करने के सरकार के संकल्प को बल देती  हैं। बढ़िया योजना से बनाए पैदल-मार्ग, चौक पार करने के समुचित तरीके और साइकिल-मार्ग में निवेश का उद्देश्य शहरी आवागमन में बढ़ोतरी, स्वास्थ्यप्रद पैदल चलने की आदत और सबका ध्यान रखने वाली भावना को बढ़ावा देना है।

इसलिए पैदल यात्रियों की सुरक्षा मज़बूत बनाने को हम प्राथमिकता दें। जहां सड़क दुर्घटनाएं पैदल चलने वालों की जिंदगी के लिए अधिक घातक हैं वहीं नाकाफी बुनियादी तंत्र और घटिया सड़क डिजाइन उनकी आवाजाही में अड़चन पैदा करते हैं और सुरक्षा से समझौते के हालात बनाते हैं। इसका सीधा असर व्यक्ति की शारीरिक गतिविधियों और सेहत पर पड़ता है लिहाजा आगे इसका प्रभाव पूरे समाज के स्वास्थ्य पर भी है।

दुनिया में पैदल राहगीरों की सुरक्षा को तरजीह देने का काफी सकारात्मक असर रहेगा। कल्पना करें ऐसी सड़कों की जहां पैदल यात्री सुरक्षित महसूस करें, दुर्घटनाएं कम से कम हों। राहगीरों की सुरक्षा पर जोर देने का मतलब है स्वस्थ जीवनशैली को बढ़ावा देना, वह किसी एक व्यक्ति की हो या पूरे समाज की।