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चुनावी त्यौहार, प्रचार में पौराणिक किरदार

सार

मध्यप्रदेश के चुनावी प्रचार में हमेशा की तरह इस बार भी पौराणिक किरदारों की भरमार है. राम-लक्ष्मण, पांडव-कौरव, रावण-अहिरावण और कंस मामा सब चुनावी प्रचार में उतर गए हैं. पौराणिक किरदारों और आजाद भारत के राजनीतिक संस्कारों के बीच में द्वन्द ही आज सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बन गया है. राजनीतिक और सरकारी प्रक्रिया में भारत के पौराणिक नायकों-महानायकों, सांस्कृतिक देवदूतों के गौरवगान और शिक्षा संस्कृति में सरकारी स्तर पर भारतीयता को स्थापित करने को लेकर ही राजनीतिक विवाद की स्थिति है.

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विस्तार

देश की राजनीति दो धाराओं में बंटी हुई है. एक धारा धर्मनिरपेक्षता के नाम पर भारत के सांस्कृतिक और पौराणिक गौरव की प्राण प्रतिष्ठा के विरुद्ध है तो दूसरी धारा का राजनीतिक आधार यही है. एमपी चुनाव में महंगाई बेरोजगारी जैसे मुद्दे तो गायब से हैं. राम मंदिर का मुद्दा प्रमुखता से उभर कर आ गया है. कांग्रेस की ओर से भी पौराणिक किरदारों का उपयोग चुनावी अभियान में जमकर किया जा रहा है.

प्रियंका गांधी ने कांग्रेस की सरकार का भाजपा द्वारा अपहरण किए जाने की बात को चुनावी सभा में रावण के भाई अहिरावण द्वारा राम और लक्ष्मण का अपहरण कर पाताल लोक में ले जाने के पौराणिक संदर्भ से जोड़ा. प्रियंका गांधी ने शिवराज सिंह चौहान की मामा की छवि को नकारात्मक रूप में प्रस्तुत करने के लिए ‘कंस मामा’ के संदर्भ को उल्लेखित किया.

कांग्रेस की ओर से नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान और जांच एजेंसियों को चुनावी पांडवों के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है. जहां पांडव होंगे वहां कौरवों की टीम स्वाभाविक है और भाजपा कांग्रेस को यही टीम बता रही है. राम जन्मभूमि का आंदोलन तो भारतीय राजनीति का सबसे बड़ा आंदोलन बना हुआ है. राम मंदिर के निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा का अवसर इन चुनावो में हिंदुत्व को उभारने के लिए बड़े मुद्दे के रूप में हर स्तर पर उपयोग किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा की उपलब्धि की चर्चा चुनावी सभा में कर रहे हैं. योगी आदित्यनाथ तो चुनावी सभा में राम मंदिर के जीवित प्रतीक के रूप में जन आकर्षण का केंद्र बन जाते हैं.

एमपी का चुनाव अब अंतिम चरण में पहुंच गया है. चुनाव में युवाओं की भूमिका हमेशा से निर्णायक रही है. इस चुनाव में भी 22 लाख युवा मतदाता पहली बार मतदान करने जा रहे हैं. युवाओं का रुझान चुनाव के रुख का निर्धारण करेगा. एमपी में बीजेपी की ओर से नरेंद्र मोदी और शिवराज के चेहरे हैं तो कांग्रेस की ओर से कमलनाथ और दिग्विजय सिंह के चेहरे प्रमुखता से सामने हैं. जो युवा पहली बार मतदाता बने हैं उन्होंने ज्यादातर समय भाजपा की सरकारों का ही गवर्नेंस देखा है. युवाओं का मन टटोलने के लिए पहली बार मतदाता बने एक मेडिकल स्टूडेंट से चर्चा में युवा मन का नए तरीके का दृष्टिकोण ही नज़र आया.

युवा मतदाताओं का कहना है कि हमारे लिए लाइफ का यह फेज़ केवल एजुकेशन पर ही फोकस है. फिलहाल लाइफ में लाइवलीहुड और कमाई का कोई नजरिया नहीं है. परिवार की ओर से मिलने वाले जेबखर्च का उपयोग और स्टडी ही टारगेट है. पॉलिटिक्स का जहां तक सवाल है, पहली बार मतदान करना है तो यह उम्र अपना सोच विचार और चिंतन की होती है. युवा न्यूज़ चैनल या प्रिंट मीडिया से ज्यादा सॉफ्ट पावर मीडिया पर फोकस करता है. सॉफ्ट पावर के मामले में जो भी राजनीतिक दल अपनी नीतियों कार्यक्रम और विचार को इफेक्टिव तरीके और प्रामाणिकता के साथ प्रस्तुत करते हैं वे युवा मन को प्रभावित करता है. युवाओं के बीच सबसे बड़ा मुद्दा प्राइड और फियर का है.

कोई भी युवा किन बातों पर प्राइड करता है, वह हमारे लिए भी सबसे बड़ा मुद्दा है. पैरंट्स प्राइड है, फैमिली प्राइड है तो नेशन, रिलिजन, कास्ट और कल्चरल हीरोज प्राइड को बढ़ाते हैं. कास्टप्राइड नेशनप्राइड का हिस्सा है. इस युवा की यह सोच दिमाग खोलने वाली है कि यह सोचना कि युवा धर्म से दूर है, सर्वथा गलत है. अगर बारीकी से कोई अध्ययन करेगा तो यह तथ्य सामने आएगा कि धार्मिक गतिविधियों और आयोजनों में सर्वाधिक भागीदारी युवाओं की दिखाई दे रही है.

प्राइड एक तरफ जहां युवाओं की सोच का केंद्र है वहीं भविष्य के लिए खतरे भी युवाओं को प्रभावित करते हैं. विश्वव्यापी धार्मिक परिदृश्य में इस्लामिक आतंकवाद, युवा सोच को डराने में राजनीति का अस्त्र बन जाता है. ‘कश्मीर फाइल्स’ और  ‘केरला स्टोरी’ जैसी फिल्में भी इसी मानसिकता और सोच को गहरा करती रहीं.

इस युवा ने ऐसी क्रांतिकारी बात कही कि आजादी के आंदोलन में जैसे युवाओं ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था उसी तरीके से देश के सांस्कृतिक गौरव की आजादी का जो आंदोलन इस समय चल रहा है उसकी मशाल भी युवाओं ने थाम ली है. इसको समझने में भले ही गलती हो लेकिन वक्त के साथ यही बात प्रमाणित होने वाली है. वुमन एंपावरमेंट और सोशल इक्वलिटी भी युवाओं की सोच को निर्धारित करते हैं. जो धर्म और संस्कृति महिलाओं की स्वतंत्रता और समानता पर रोक-टोक करते हैं वह युवाओं को पसंद नहीं आते हैं.

इंडिया को भारत कहने का प्राइड भी युवा मन को प्रभावित करता है. ‘सिकंदर महान’ और ‘अकबर महान’ की कहावतें अब युवाओं की सोच से उतरने लगी हैं. भारत की संस्कृति और विरासत युवा सोच को प्राइड का अनुभव देती है. शहरों और स्टेशनों के बदले नाम भी युवाओं को सांस्कृतिक गौरव से जोड़ रहे हैं.

सभी राजनीतिक दल युवाओं को प्रभावित करना चाहते हैं. लेकिन युवाओं का मन इस बात में क्लियर है कि उनके लिए प्राइड के विषय क्या हैं और फियर के विषय क्या हैं? अब राजनीति का गोल-मोल सा स्टैंड युवाओं के कन्विक्शन को बदल नहीं पा रहा है.

सोशल मीडिया और सॉफ्ट पावर युवाओं की सोच को नया पावर दे रही है. जो पार्टी इस पावर को यूज करने में इफेक्टिव साबित होगी वही भारत का राजनीतिक भविष्य रहेगी. जो राजनीतिक चर्चाएं नफरत और जातिवाद के नकारात्मक नज़रिए से वोट बैंक को प्रोत्साहित करती हैं उनको भी समझने में यूथ टोटली क्लियर है.

अयोध्या में देव दीपावली का आयोजन प्रारंभ हो चुका है. सर्वाधिक दिए जलाने का वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने के लिए जो दृश्य सामने आ रहे हैं उसमें बड़ी संख्या युवाओं की है. जो जय श्री राम के उद्घोष के साथ अपने रिलीजन प्राइड को आवाज दे रहे हैं. भारत में कभी मंदिरों का पुनर्निर्माण और सौंदर्यीकरण को सरकारी धन से करने के बारे में सोचने की प्रक्रिया धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ मानी जाती थी. भारत के लोग आज धार्मिक स्थलों पर दिव्यता और भव्यता के लिए किए गए ऐतिहासिक प्रयासों को रिलिजन प्राइड के रूप में महसूस करते हैं. मध्यप्रदेश के चुनाव में भी ‘महाकाल लोक’ की भव्यता और दिव्यता बहुत बड़े इलाके में मताधिकार को प्रभावित करने का काम कर सकती है.
 
एमपी विधानसभा चुनाव के अंतिम परिणाम महिलाओं और युवाओं के रुख पर ही तय होने जा रहे हैं. सर्वे और समीक्षा में करीबी मुकाबले का दिग्दर्शन शायद अंतिम नतीजे में देखने को नहीं मिलेगा. पूरा चुनाव ‘प्राइड और फियर’ के मुद्दों पर केंद्रित होता जा रहा है. किस दल की गतिविधियां प्राइड फील करा रही हैं और किस दल द्वारा फियर का वातावरण बनाया जा रहा है. यह समझने में युवाओं को कोई गफलत में नहीं डाल सकता. युवाओं का क्लियर स्टैंड राजनीति का सारा स्टैंड क्लियर करता दिख रहा है.