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एक की आस्था दूसरे की परेशानी, किसकी है नादानी?

सार

मध्यप्रदेश में आजकल दो धाम ऐसी चर्चा और आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं कि सनातन संस्कृति के शंकराचार्य भी आश्चर्य में पड़ गए हैं. सनातन संस्कृति में हर 12 साल में लगने वाले महाकुंभ और सिंहस्थ बिना किसी दुर्घटना के संपन्न हो जाते हैं लेकिन मध्यप्रदेश के बागेश्वर और कुबेरेश्वर धाम संस्कृति और अध्यात्म के नाम पर परेशानी बढ़ाते दिखाई पड़ रहे हैं.

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विस्तार

ऐसा बताया जा रहा है कि कुबेरेश्वर धाम में हो रहे रुद्राक्ष महोत्सव में सम्मिलित होने के लिए जा रहे मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को इसलिए वापस लौटना पड़ा कि इस धाम की ओर जाने वाला नेशनल हाई-वे कई किलोमीटर तक जाम बना हुआ है. इंदौर से भोपाल के बीच गाड़ियों का आवागमन रुक गया है. जिनको भी इंदौर से भोपाल आना है उन्हें कुबेरेश्वर धाम के कई किलोमीटर पहले से रास्ता बदलकर पहुंचने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है.

रुद्राक्ष महोत्सव में भगदड़ की घटना के बीच अनेकों लोगों के घायल होने की खबर है. हज़ारों लोग अस्पताल में भर्ती हुए हैं. सरकार और प्रशासन आस्था के नाम पर लोगों को ऐसी परिस्थतियों का शिकार होने के लिए कैसे छोड़ सकती है? कुबेरेश्वर धाम में इसके पहले भी इस तरह की घटनाएं हो चुकी हैं. इस धाम के धर्मगुरु हर बार शासन प्रशासन को अव्यवस्था के लिए जिम्मेदार ठहरा देते हैं. सरकार और प्रशासन इस तरह के आयोजन की अनुमति क्यों देता है? इस बात का जवाब प्रशासन को देना ही होगा?

मध्यप्रदेश का दूसरा धाम छतरपुर जिले का बागेश्वर धाम लगातार चर्चा और आकर्षण के केंद्र में बना हुआ है. वहां भी धार्मिक महोत्सव चल रहा है. वहां भगदड़ की घटना अभी तक सामने नहीं आई है लेकिन इस धाम में एक महिला की मृत्यु का मामला प्रकाश में आया है. बागेश्वर धाम के धर्मगुरु धार्मिक और आध्यात्मिक बातों के साथ ही हिंदू राष्ट्र बनाने के संकल्प को पूरा करने के लिए काम करने का दावा कर रहे हैं. 

इन दोनों धामों पर राजनेताओं की उपस्थिति इन धामों की जनता के बीच लोकप्रियता बढ़ाने में काम आ रही है. दोनों धामों और राजनेताओं का तालमेल एक दूसरे को लाभ पहुंचाने कोशिश ही मानी जा सकती है. मध्यप्रदेश के दोनों प्रमुख दल बीजेपी और कांग्रेस बागेश्वर धाम में वहां के धर्मगुरु से आशीर्वाद पाने की होड़ लगाए हुए हैं.

पहले प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष कमलनाथ वहां वंदना के लिए पहुंचे तो बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बीडी शर्मा भी पीछे नहीं रहे. ऊपर से देखने पर भले ही राजनेता एक-दो ही दिखाई पड़ रहे हो लेकिन इन दोनों स्थानों पर व्यवस्थाओं के पीछे के हाथों पर नजर डाली जाएगी तो इसमें सबसे ज्यादा भूमिका राजनीतिक हाथों की ही मिलेगी.

कांग्रेस पार्टी इन दोनों धामों में बराबरी के साथ अपनी भूमिका और भागीदारी निभाने की कोशिश कर रही है क्योंकि आने वाले चुनाव में इन दोनों धामों की वोटों की राजनीति में भूमिका देखी जा रही है. दोनों धाम में अपना कोई राजनीतिक एफिलेशन सार्वजनिक नहीं किया है लेकिन हिंदू राष्ट्र की बात करके बागेश्वर धाम ने तो अपने राजनीतिक झुकाव को एक तरीके से स्पष्ट ही कर दिया है. कुबेरेश्वर धाम के धर्मगुरु के राजनीतिक झुकाव के बारे में भी जानने में बहुत अधिक मेहनत करने की जरूरत नहीं पड़ेगी.

धार्मिक आस्था अच्छी बात है, इस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा है लेकिन आस्था के नाम पर ऐसी अराजक परिस्थितियां कोई भी प्रशासन कैसे बर्दाश्त कर सकता है? इन दोनों धामों के आकर्षण और विकास की कहानी कोई बहुत पुरानी नहीं है. तीन चार साल पहले तक इन दोनों धामों के बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं होती थी. यह दोनों धाम अचानक चर्चित हुए हैं. इन दोनों धामों पर लग रही श्रद्धालुओं की भारी भीड़ इस बात का संकेत है कि आदमी कितना कष्ट और अशांति में जी रहा है. कष्ट और अशांति से मुक्ति के लिए हर व्यक्ति ऐसे धामों की ओर दौड़ लगाता है. 

इन दोनों धामों में लोगों की समस्याओं के समाधान का भरोसा दिलाया जाता है. समाधान होता है कि नहीं होता है यह बात कोई भी सुनिश्चित तौर पर नहीं कह सकता है लेकिन जिस तरह से दोनों धामों में दरबार लगाकर समस्याओं के समाधान के तरीके बताए जाते हैं, उसे अंधविश्वास कहना कोई गलत नहीं होगा. इन धामों के जरिए अगर लोगों के कष्ट और तकलीफों का समाधान हो रहा है तो फिर सरकारों की कोई आवश्यकता क्या रह जाती है?

जब इस तरीके के धामों में धर्मगुरु आम लोगों के कष्ट दूर करने में सक्षम हैं तो फिर सरकारों को अधिकृत रूप से इन धामों को प्रोत्साहित करना चाहिए. पब्लिक को कष्ट और दुख से मुक्ति अगर धामों में ही मिल रही है तो फिर सरकार के लिए तो यह बहुत सुविधाजनक स्थिति है कि उसके प्रदेश के लोग बिना सरकार के किसी प्रयास के ऐसे धामों में जाकर कष्ट और तकलीफों से मुक्त हो सकेंगे. इन दोनों धामों में आज अराजकता की स्थिति इसलिए बनी है क्योंकि धीरे-धीरे इनका ऐसा प्रचार किया गया कि यहां जाने से लोगों की तकलीफों का निवारण होता है.

जिस दिन इसकी शुरुआत हुई थी तब ही सरकार और प्रशासन धामों की सच्चाई सार्वजनिक कर देता तो शायद आज भीड़ के कारण ऐसी स्थिति निर्मित नहीं होती. बागेश्वर धाम के धर्मगुरु के कथित चमत्कार पर राजनीतिक रूप से विवाद भी पैदा हुए हैं.
 
सनातन संस्कृति में जीवन ऊर्जा ही परमात्मा है. जीवन को वर्तमान में जीने की बजाय बेहतर भविष्य और कष्टों के निवारण के लिए इस तरह की धार्मिक गतिविधियों में शामिल होकर लोग अपने जीवन को नई दिशा नहीं बल्कि खराब दिशा दे रहे हैं. यह अलग बात है कि ऐसी परिस्थितियां राजनेताओं के लिए मुफीद हो सकती हैं लेकिन इससे समाज में अंधविश्वास फैलता है. 

अंधविश्वास को फैलने से रोकने की संवैधानिक जिम्मेदारी भी राज्य सरकारों पर ही होती है. जीवन में आनंद का, धन्यता का आभास धामों में नहीं बल्कि वर्तमान जीवन के लक्ष्यों को खोजने और जीने में ही मिलेगा. राजनीति और धर्मगुरुओं का यह घालमेल अंततः समाज के लिए फायदेमंद होने की बजाय हानिकारक साबित होगा. सरकारों को ऐसे अंधविश्वास और अराजक दौर से लोगों को बचाने के लिए सतर्क रहने की जरूरत है.