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एक तरफ जीत का आत्मविश्वास, दूसरी तरफ हार का अतिविश्वास

सार

विपक्ष ने मोदी सरकार के खिलाफ लोकतंत्र का ब्रह्मास्त्र अविश्वास प्रस्ताव चल दिया है. लोकसभा में नो कॉन्फिडेंस मोशन चर्चा के लिए स्वीकार कर लिया गया है. सरकार को लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है. विपक्ष के ब्रह्मास्त्र का पतन सुनिश्चित है. यह जानते हुए भी क्या कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ने कोई रणनीतिक भूल की है..!

janmat

विस्तार

पिछले लोकसभा चुनाव के पहले भी ऐसे ही मोदी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चर्चा के उत्तर में खुद के लिए सकारात्मक एजेंडा सेट कर दिया था और विपक्ष पर ही अविश्वास की जनधारणा चस्पा कर दी थी. उस समय भी पीएम मोदी ने अपनी जीत का आत्मविश्वास दिखाते हुए विपक्ष को 2023 में फिर से अविश्वास प्रस्ताव लाने के लिए शुभकामनाएं दी थी. पांच साल बाद देश जब अगली सरकार चुनने के लिए चुनाव में उतरने जा रहा है तो फिर विपक्ष ने पुरानी गलती दोहराई है. 

विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को अविश्वास प्रस्ताव के ब्रह्मास्त्र से तो घायल नहीं कर पाएगी लेकिन संसद में यही ब्रह्मास्त्र विपक्ष को लहूलुहान जरूर कर सकता है. विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव की हार का अतिविश्वास सुनिश्चित है तो नरेंद्र मोदी को उनकी सरकार की जीत का अद्भुत आत्मविश्वास है. प्रधानमंत्री मोदी ऐसे ही यह नहीं कह रहे हैं कि उनकी सरकार के तीसरे टर्म में भारत की इकोनोमी दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंचने की गारंटी है.

अविश्वास प्रस्ताव विपक्ष का बहुत बड़ा हथियार होता है. इसका उपयोग होना चाहिए लेकिन जनविश्वास का अनादर करते हुए इसके दुरुपयोग की कोशिश तो लोकतंत्र में स्वार्थ की राजनीति ही कही जाएगी. संविधान में विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव का ब्रह्मास्त्र मिला है. इसका उपयोग कर संसद में विपक्ष नेरेटिव तो गढ़ सकता है लेकिन इससे जन विश्वास को कैसे परास्त किया जाएगा? 

विपक्षी नेताओं की ओर से अविश्वास प्रस्ताव लाने के पीछे यह तर्क दिए जा रहे हैं कि प्रधानमंत्री को सदन में बोलने के लिए मजबूर करने की दृष्टि से यह प्रस्ताव लाया गया है. उन्हें मालूम है कि सदस्यों की संख्या के हिसाब से इस प्रस्ताव का कोई औचित्य नहीं है लेकिन इसके माध्यम से विपक्षी दलों द्वारा प्रधानमंत्री को बोलने के लिए मजबूर किया जाएगा. एक सप्ताह से संसद ठप होती जा रही है. मणिपुर पर प्रधानमंत्री के बयान की मांग करते हुए विपक्षी गठबंधन संसद नहीं चलने दे रहा है. अकुलाहट में विपक्षी दलों ने अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दे तो दिया है और सरकार ने इस मौके को बिना समय गँवाए मंजूर भी कर लिया.

सदन में सदस्यों की संख्या के अनुसार ही राजनीतिक दलों के प्रतिनिधियों को बोलने के लिए समय आवंटित किया जाता है. इस दृष्टि से भी एनडीए और बीजेपी के सदस्यों को ज्यादा समय तक अपनी बात रखने का समय मिलेगा. जिन चार राज्यों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश, राजस्थान और तेलंगाना में इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं. मध्यप्रदेश को छोड़कर तीनों राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं. बीजेपी अविश्वास प्रस्ताव के बहाने इन राज्यों में कांग्रेस और विपक्षी दल के विरोध में अपना एजेंडा भी सेट करेगी.

देश के सामने जो भी ज्वलंत मुद्दे जनमानस को उद्वेलित करते हैं उनमें कांग्रेस की सरकारों का चेहरा साफ साफ दिखाई पड़ता है. भ्रष्टाचार पर बात होती है तो कांग्रेस अपने भार से ही झुकी हुई दिखाई पड़ती है. परिवारवाद और तुष्टिकरण की राजनीतिक लड़ाई में भी कांग्रेस को पीछे झुकना पड़ता है. कश्मीर में हिंदुओं के उत्पीड़न के लिए भी कांग्रेस की नीतियां जिम्मेदार दिखाई पड़ने लगती हैं. 

धारा 370 हटाने को लेकर कांग्रेस आज तक देश के सामने ऐसा कोई सकारात्मक नैरेटिव नहीं प्रस्तुत कर सकी है कि यह विशेष व्यवस्था कश्मीर में क्यों लगाई गई थी और इसके कारण कश्मीर के लोगों को क्या लाभ हुआ? कश्मीर से हिंदुओं के पलायन का दाग भी कांग्रेस के दामन पर लगा हुआ है. महंगाई-बेरोजगारी और देश की अर्थव्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर भी कांग्रेस की सरकारों और बीजेपी की सरकार की तुलनात्मक स्थितियां कांग्रेस के लिए बहुत उत्साहजनक नहीं हो सकती हैं.

महिला, दलित और आदिवासियों के विरुद्ध अत्याचार के मामलों में भी कांग्रेस की राज्य सरकारों के परफॉर्मेंस के कारण प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार को कटघरे में खड़ा करने में विपक्षी गठबंधन शायद ही सफल हो सकेगा. इसके विपरीत इन सभी मामलों में मोदी सरकार विपक्षी गठबंधन को दोषपूर्ण नीतियों को जिम्मेदार ठहराने में सफल हो जाएगी.

मणिपुर का जहां तक मामला है एनडीए सरकार के लिए इस पर अपना डिफेंस तार्किक ढंग से प्रस्तुत करना चुनौतीपूर्ण होगा. मणिपुर की शर्मनाक घटनाओं को नियंत्रित करने में राज्य की बीजेपी सरकार की असफलता के कारण केंद्र की एनडीए सरकार को कटघरे में खड़ा करने के लिए विपक्षी गठबंधन कोई कमी नहीं छोड़ेगा. मणिपुर में जातीय संघर्ष के पीछे ऐतिहासिक तथ्यों और कारणों को अगर देखा जाएगा तो इसके लिए कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन को उनके दलों की पूर्व सरकारें ही तकलीफ बनेंगी. जैसे कश्मीर में धारा 370 हटाते समय लोकसभा में भाषण में कांग्रेस की गलतियों का पिटारा देश के सामने खोला गया था.

कांग्रेस सहित विपक्षी गठबंधन का सबसे बड़ा आरोप यह है कि बीजेपी देश में नफरत फैलाकर विभाजन कर रही है. सेक्युलर दलों और बीजेपी के बीच धर्मनिरपेक्षता और हिंदुत्व का संघर्ष चल रहा है. हिंदुत्व की राजनीतिक जरूरत को देखते हुए बीजेपी तो इसे अपना आधार मानती है लेकिन दूसरे दल भी चुनावी उद्देश्यों के लिए हिंदुत्व के झंडाबरदार होने का दिखावा करने से पीछे नहीं रहते. कांग्रेस का कोई भी नेता अब मस्जिद जाने का साहस नहीं करता लेकिन मंदिर जा जाकर चुनावी हिंदू होने का ढिंढोरा पीटने में कोई कमी भी नहीं रखता. चुनावी लाभ के लिए कांग्रेस भी देवी देवताओं और धर्म आचार्यों का पूरा उपयोग करती दिख रही है.

मध्यप्रदेश में ही देखा जाए तो बीजेपी नेता ही नहीं कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ भी पंडित प्रदीप मिश्रा और बागेश्वर धाम के कथावाचक पंडित धीरेंद्र शास्त्री की छिंदवाड़ा में कथाएं कराने से पीछे नहीं है. इस मामले में भी विपक्ष मोदी सरकार को शायद ही कटघरे में खड़ा कर पाएगा.

कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन बीजेपी को मुस्लिम विरोधी साबित करने में कोई कमी नहीं छोड़ता. बीजेपी सरकार की योजनाओं का लाभ तो सभी धर्मों के लोगों को समानता के साथ मिलता है. प्रधानमंत्री मोदी की सरकार का आचरण तो ‘सबका साथ सबका विकास’ की अवधारणा को साबित करता है लेकिन राजनीतिक नजरिए की धारणा में मुस्लिमों के बीच बीजेपी अपना पक्ष आगे बढ़ाने की कोशिश में लगी हुई है. पसमांदा मुसलमानों के संरक्षण के विशेष प्रयासों के पीछे यही योजना है. तीन तलाक पर कानून बनाने के साथ ही समान नागरिक संहिता की मोदी सरकार की सोच भी समानता की दृष्टि से ही उठाया कदम कहा जाएगा लेकिन विपक्षी दल इसे मुस्लिम विरोध का एकतरफा प्रयास कहने से पीछे नहीं हैं. 

अविश्वास प्रस्ताव की चर्चा में मोदी सरकार अपनी उपलब्धियों को रेखांकित करने में कोई कमी नहीं रखेगी. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की बढ़ती हैसियत को भी देश में राष्ट्रवाद के एजेंडे के रूप में अविश्वास प्रस्ताव स्थापित करने में सफल ही होगा. देश की सीमाओं पर भारत की मजबूत स्थिति और आतंकवाद पर करारा प्रहार भी मोदी सरकार अपनी उपलब्धि के रूप में सामने रख सकती है. विपक्षी दलों की सरकारों के भ्रष्टाचार में लिप्त होने के तथ्यात्मक विवरण इस पर जन धारणा को मजबूत करेंगे.

यह सब जानते हुए भी कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन ने अविश्वास प्रस्ताव लाकर मोदी सरकार को अपना सकारात्मक एजेंडा देश के सामने रखने का अवसर क्यों दिया? इसको शायद यही कहा जा सकता है कि नियति निर्धारित होती है, उसी के अनुसार व्यक्ति आचरण करने लगता है. विपक्ष का आचरण भी भारत की नियति के अनुरूप ही चल रहा है. मजबूत लीडर का आकांक्षी भारत अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बहाने अपनी धारणा को नए सिरे से परिभाषित करेगा. भारत के सामान्य लोगों की बुद्धिमत्ता और देश की सामूहिक चेतना पर अविश्वास करने वाले पहले भी धोखा खा चुके हैं और आगे भी धोखा खाना उनकी नियति है.