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देश में दंगे, राजनीतिक मानसिकता बदलिए..!

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 25 Sep

सार

देश में जो कुछ घट रहा है यह हमेशा इसी पैटर्न में घटा है और जब तक देश की राजनीतिक मानसिकता नहीं बदलती,घटता ही रहेगा..!

janmat

विस्तार

वैसे इन दिनों भोपाल में नहीं हूं,पर देश के साथ हूं पूरी सजगता के साथ। देश में जो कुछ घट रहा है यह हमेशा इसी पैटर्न में घटा है और जब तक देश की राजनीतिक मानसिकता नहीं बदलती,घटता ही रहेगा।सेवानिवृत्त आई ए एस अधिकारी लहरी की सालों पहले प्रकाशित किताब हो, या सीएसडीएस द्वारा कुछ सालों पहले कराया गया अध्ययन नतीजे नहीं बदले हैं,क्योंकि देश की मानसिकता नहीं बदली है।  

कुछ सालों पहले ‘सीएसडीएस’ ने एक अध्ययन साल किया था। यदि इसको नवीनतम मानकर चलें, तो देश की तीन चौथाई आबादी को किसी भी मजहब से, किसी भी त्योहार से, जुलूस और शोभायात्रा से कोई परेशानी नहीं है। उन्हें पड़ोसी का [किसी भी धर्म का] कोई भी होने से भी कोई परेशानी नहीं है। सिर्फ़ एक चौथाई से भी कम लोगों को मंदिर या मस्जिद पर लगे लाउडस्पीकर और उस पर सुनाई देने वाली अजान या भजन परेशान करते हैं ।

देश में ज्यादातर लोगों को आपके खाने-पीने से किसी प्रकार का नहीं है, बल्कि एक अध्ययन के मुताबिक, देश की ६० प्रतिशत के आसपास की आबादी मांसाहार करती है। इसमें अंडा खाने वालों को जोड़ दें, तो यह आँकड़ा  70 प्रतिशत से ऊपर बैठता है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 के मुताबिक, देश के 30 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में से आधे से ज्यादा में आबादी मछली या चिकन खाती है।

केवल चार राज्य हरियाणा, पंजाब, राजस्थान और गुजरात में 60 प्रतिशत आबादी शाकाहारी बताई गई है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में सबसे ज्यादा करीब 75 प्रतिशत लोग शाकाहारी हैं। सरकारी आंकड़ों के हिसाब से मांस उद्योग में लगे बड़े घरानों में ज्यादातर हिंदू परिवार हैं, तो क्या भोजन के आधार पर देश में कोई मजहबी बंटवारा हो सकता हैं? यह भी एक नज़ीर है कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार के उस फैसले को खारिज कर दिया, जिसमें नवरात्र के दौरान खुले में मांस बेचने पर रोक लगाई गई थी।

यह भारत का दुर्भाग्य है कि अब भी  समाज भाषा, कपड़े और भोजन और मजहब से पहचान पा रहा है, राष्ट्रीय भाव से नहीं। देश में खीर और बिरयानी को बांटने वाले लोग हैं। जो पायजामा और मर्दाना धोती को बांट रहे हैं। एक  भाषा को हिंदुओं और दूसरी को मुसलमानों की जुबान साबित करने में लगे हैं।

शायद आप जानते हैं कि देश के बहुत बड़े हिस्से में लोग अपनी-अपनी प्रांतीय भाषाएं बोलते हैं? हमारे यहां राज्य बंटवारा भाषायी आधार पर बने हैं , धार्मिक आधार पर नहीं। अधिकांश  फिल्मकारों, नाटककारों और कलाकारों की जुबान उर्दू है, लेकिन उनकी लिपि देवनागरी, मतलब हिंदी है। ज्यादातर प्रसिद्ध भजन मुस्लिम कलाकारों के लिखे और गाए हुए हैं। संगीत की दुनिया के ज्यादातर उस्ताद मुसलमान हैं। डागर बंधुओं को कभी आपने वैदिक ऋचाएं गाते हुए या ध्रुपद सिखाते हुए देखा है? दुर्भाग्य देश में अब कव्वाली और भजन बांटे जा रहें हैं। कविता और शायरी तकसीम हो रही है ।मुशायरे और कवि सम्मेलन भी रंगो में बंटने लगे हैं।

इस बार तो एक ही जैसी क्रिया की प्रतिक्रिया अलग-अलग स्थानों पर भिन्न हुई है। ठीक वैसी ही कि बाजार में दो सांड़ों के लड़ जाने के बाद वहां दंगा। और कई दिनों तक अमन- चैन ग़ायब। भोपाल में ऐसा कुछ घटा, कि वहां कुछ नहीं हुआ। वहाँ की मानसिकता फ़िल्म के साथ  उद्वेलित जो नहीं हुई थी। ऐसा अकारण नहीं होता।

सही मानिए,सांप्रदायिक हिंसा का उभार एक पिरामिड की शक्ल में होता है। यह पिरामिड धीरे-धीरे निर्मित होता है। इस प्रक्रिया में एक ऐसा बिंदु आता है, जब एक पत्थर फेंकने, किसी अंतरधार्मिक विवाह, यहां तक कि दो अलग समुदायों के चालकों की साइकिलों के टकराने भर से दंगा हो सकता है। और यदि भोपाल की तरह यह पिरामिड निर्मित न हो, तो बड़ी से बड़ी घटना भी हिंसा नहीं करा पाती।