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दिल का फैसला, दिल्ली का बढ़ेगा हौसला 

सार

 यह लोकसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ होने के पहले नतीजों को लेकर वोटर क्लियर थे. चुनाव के मुद्दे भी क्लियर थे. वर्डिक्ट भी क्लियर ही था. चुनाव की शुरुआत से विजडम ऑफ़ क्राउड जिस नतीजे पर थी, लगभग वही नतीजा चार जून को सामने आएगा. पीएम नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में एनडीए सरकार की वापसी लगभग सुनिश्चित है. डिस्कशन हार जीत पर नहीं है बल्कि चर्चा तो सीटों की संख्या पर है..!!

janmat

विस्तार

      इधर चुनावी वेव थमती जा रही है, तो उधर हीट वेव बढ़ती जा रही है. पांच चरणों के बाद दिल्ली की सरकार का फैसला अब EVM में कैद हो चुका है. बचे दो चरणों में 115 सीटों पर मतदान होना है, लेकिन अब तक जो मतदान हो चुका है, उससे ही नई सरकार का रास्ता साफ हो गया है.

    दो चरणों की सीटों के नतीजे तो बहुमत को मजबूत करेंगे, सरकार के स्थायित्व को मजबूत करेंगे, सपने पूरे करने के इरादों को मजबूत करेंगे.  इतने लंबे प्रचार अभियान में लगे राजनेता तो थक ही गए हैं लेकिन जनता भी राजनीति की कलाबाजियों  से ऊब गई है. तमाम प्रयासों के बावजूद मतदान का प्रतिशत अपेक्षा के अनुरूप नहीं हो पाया. अब तक जिन मतदाताओं ने मताधिकार का उपयोग कर लिया है वह नतीजे पर चर्चा कर रहे हैं. तो जहां मतदान होना है वह बाकी देश के दिल की बात समझने की कोशिश कर रहे हैं. 

    यह लोकसभा चुनाव पहला ऐसा चुनाव है, जिसमें चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ होने के पहले नतीजों को लेकर वोटर क्लियर थे. चुनाव के मुद्दे भी क्लियर थे. वर्डिक्ट भी क्लियर ही था. चुनाव की शुरुआत से विजडम ऑफ़ क्राउड जिस नतीजे पर थी, लगभग वही नतीजा चार जून को सामने आएगा. पीएम नरेंद्र मोदी की लीडरशिप में एनडीए सरकार की वापसी लगभग सुनिश्चित है. डिस्कशन हार जीत पर नहीं है बल्कि चर्चा तो सीटों की संख्या पर है. देश के दिल का फैसला दिल्ली के हुक्मरानों का हौसला बढ़ाएगी, राजनीतिक अनुमान यही कह रहे हैं कि एनडीए की हैट्रिक लगेगी और जीत पहले की जीत से ज्यादा रनों से होगी. विपक्ष का सिनेरियो 2019 जैसा ही दिखाई पड़ रहा है.कोई बड़ा उलटफेर दिखाई नहीं पड़ रहा है.

    लोकसभा का यह पूरा चुनाव मोदी वर्सेस मोदी केंद्रित रहा है. पीएम मोदी जहां अपनी उपलब्धियां और भविष्य की योजनाओं को जनता तक पहुंचाने में सफल रहे हैं. वहीं विपक्षी गठबंधन अपना एजेंडा स्थापित भी नहीं कर पाया है. विपक्षी दलों ने लोकतंत्र और संविधान को खतरे में बताने के साथ ही आरक्षण खत्म करने का जो भय पैदा किया, उस पर देश के लोगों ने विश्वास नहीं किया. जातिगत जनगणना का वायदा भी विपक्ष के लिए वाटरलू साबित हुआ है. महंगाई बेरोजगारी जैसे मुद्दों को विपक्ष स्थापित करने में असफल रहा है.

  पीएम नरेंद्र मोदी के विकल्प के रूप में ना तो कोई नेतृत्व विपक्ष पेश कर सका है और ना ही कोई रचनात्मक नीतियां अथवा कार्यक्रम सामने ला सका. यह लोकसभा चुनाव कमजोर विकल्प का भी उदाहरण बनेगा. विपक्षी दलों ने जमीनी हकीकत से ज्यादा सोशल मीडिया की चकाचौंध पर भरोसा किया. मीडिया भी पूरी तौर से मोदी समर्थक और मोदी विरोध में विभाजित दिखाई पड़ा. जो मीडिया निष्पक्ष भी था उसे भी विपक्षी दल के नेताओं ने चुनावी अभियान में गोदी मीडिया साबित करने में कोई कमी नहीं छोड़ी. गवर्नेंस के मुद्दे पर भी विपक्षी गठबंधन पीछे दिखाई पड़ता है. करप्शन के मामले चुनावी मुद्दे के रूप में ताकत से सामने आए. विपक्षी गठबंधन के दो मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी भी भ्रष्टाचार को चुनावी मुद्दे के रूप में हवा को आंधी में बदला है. 

   लोकसभा चुनाव बीजेपी की लीडरशिप में एनडीए गठबंधन और कांग्रेस की लीडरशिप में I.N.D.I.A . गठबंधन के बीच में हो रहा है. गठबंधन के इस समीकरण में भी बीजेपी काफी आगे दिख रही है. विपक्षी गठबंधन का ना तो कोई कामन मिनीमम प्रोग्राम आ सका. ना ही पूरे देश में सीटों का बंटवारा हो सका. पश्चिम बंगाल में तो टीएमसी अलग चुनाव लड़ रही है. आम आदमी पार्टी दिल्ली और हरियाणा में तो कांग्रेस के गठबंधन के साथ है, और पंजाब में कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ रही है. कई क्षेत्रीय दल दोनों गठबंधनों के साथ नहीं है. उत्तर प्रदेश में बीएसपी अलग चुनाव लड़ रही है. इसके कारण भी एनडीए गठबंधन फायदे में दिख रहा है. आंध्र प्रदेश और उड़ीसा में भी त्रिकोणीय लड़ाई है.

    चुनावी नतीजे की चर्चा चुनावी प्रक्रिया प्रारंभ होने के पहले से ही चालू हो गई.बड़ी राजनीतिक सूझबूझ से पीएम मोदी ने नतीजे के गोल पोस्ट को 272 से बढ़कर 370 और 400 पर स्थापित कर दिया है. सरकार बनाने के लिए 272 सीटें पर्याप्त हैं. कोई भी राजनीतिक दल या राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर चर्चा नहीं कर रहे हैं, कि सरकार किसकी बनेगी! बल्कि चर्चा इस बात की हो रही है,कि बीजेपी एनडीए 400 पार पहुंचेगा या नहीं. 

      देश का जो मूड दिखाई पड़ रहा है वह उत्तर और दक्षिण में थोड़ा अलग-अलग है. पूर्व और पश्चिम में भी चुनावी मूड में परिवर्तन है. इसके बावजूद यह स्पष्टता के साथ दिखाई पड़ रहा है, कि बीजेपी और एनडीए गठबंधन अपने वर्चस्व के पश्चिम और उत्तर भारत के इलाकों में बिना किसी खास उलट फेर के अपनी 2019 की स्थितियों को कायम रखने में सफल हो सकती है. जहां तक पूर्वी भारत और दक्षिण भारत के राज्यों का सवाल है, इतना तो निश्चित दिखाई पड़ रहा है, कि एनडीए को इन राज्यों में 2019 की तुलना में लाभ होना तय है. 

    उड़ीसा, बंगाल, असम, तेलंगाना, तमिलनाडु और केरल में बीजेपी की सीटें और वोट प्रतिशत बढ़ने की पूरी संभावना है.  इन राज्यों में जितनी सीटों का बीजेपी को फायदा होगा, उतनी ही उनकी अंतिम टैली बढ़ेगी. यह बात तो क्लियर है, कि 2019 की सीटों से ऊपर ही बीजेपी रहेगी. पूर्वी भारत और दक्षिण भारत के राज्यों में सीटों की संख्या अगर अप्रत्याशित रूप से बढ़ती है? तो फिर चुनाव नतीजे एक तरफा भी हो सकते हैं. पश्चिमी और उत्तर भारत में गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, पंजाब जैसे राज्यों में पहले ही भाजपा के पास अच्छी सीटें हैं.

   तमाम राजनीतिक अनुमान भी इन राज्यों में बीजेपी को बहुत अधिक नुकसान की आशंका नहीं बता रहे हैं. अगर इन राज्यों में कोई फेरबदल होता है तो वह इकाई में ही रहेगा. पूरे प्रचार अभियान में किसी भी राज्य में पीएम नरेंद्र मोदी के विरुद्ध कोई गुस्सा नहीं देखा गया है. कुछ मुद्दों पर अगर कोई नाराजगी देखी गई है, तो आम जनता में यही बात सामने आई है, कि विकल्प क्या है? अगर मोदी को नहीं चुनना है तो किसको चुनना  है?

    विपक्ष विकल्प के रूप मेअपने गठबंधन को स्थापित ही नहीं कर पाया. विपक्षी गठबंधन का पूरा दारोमदार अल्पसंख्यक, विशेष कर मुसलमान और दलीय नेताओं की जातियों पर निर्भर कर रहा है. जहां तक कांग्रेस का सवाल है, कांग्रेस को कोई भी फायदा होता दिखाई नहीं पड़ रहा है. कांग्रेस अगर अपनी पुरानी टैली को ही मेंटेन कर ले, तो वह इसके लिए उपलब्धि ही मानी जाएगी. 

  दशकों बाद भारत खंडित राजनीति से बाहर निकला है. देश ने एक मजबूत सरकार और मजबूत नेता के असर को देखा है. राष्ट्रवाद की मजबूती और उसमें आया निखार, विश्वव्यापी सम्मान के रूप में मजबूत हुआ है. इसके साथ ही पुरानी सरकारों और पीएम मोदी के नेतृत्व में एनडीए सरकार के कामकाज की तुलना का भी अवसर देश को मिला है. लोकतंत्र की परिपक्वता भी निरंतर बढ़ती जा रही है. 

   राजनीतिक सामंतशाही धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है. राजनीतिक घराने और परिवार अपनी चमक खोते जा रहे हैं. लोकतंत्र का सही स्वरूप निखर रहा है. यह लोकसभा चुनाव यह साबित करेगा, कि भारत में जातिवाद टूट रहा है. संप्रदायवाद भी कमजोर हो रहा है. राजनीतिक अल्पसंख्यकवाद भी बिखर रहा है.  राजनीतिक घरानेबाजी का अब कोई भविष्य नहीं है. राजनीति में सेवा और समर्पण को ही सम्मान मिलेगा. देश के दिल का फैसला न केवल दिल्ली का हौसला बढ़ाएगी बल्कि भारत का विश्व में स्वाभिमान को आगे ले जाएगा.

   भारत का गगनयान चमकेगा. भारत का गौरव गान बुलंद होगा. नरेंद्र मोदी को देश ने पहली बार वर्ष 2014 में पीएम उम्मीदवार के रूप में मेंडेड दिया था. अभी भी वह कायम है. वर्ष 2024 इस मैंडेट को पुनर्स्थापित करेगा. मोदी से ज्यादा ऐसा मैंडेट भारत के सुरक्षित भविष्य के लिए जरूरी है.