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चुनावी घाट पर कन्वर्जन की आहट

सार

चुनावी सियासत के चीत्कार में बजरंग बली के मंदिर निर्माण की घोषणा भी हो गई. मतदान के पहले जय बजरंग बली का नारा बुलंद करने की अपील के बाद मुकाबले में अल्लाह हू अकबर का नारा भी सामने आ गया है. कर्नाटक चुनाव में सत्ता के दावेदार दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और बीजेपी के घोषणा पत्रों के सुशासन और विकास के चुनावी वायदे बजरंग बली की बाढ़ में बह गए हैं. भ्रष्टाचार के मुद्दे गायब से हो गए हैं. चुनावी घाट पर मुद्दों का कन्वर्जन हो गया है. धर्म और आस्था के विषय उठाकर भावनाओं को उभारने का पूरा प्रयास वैसे ही किया जा रहा है जैसे लोभ और लालच देकर लोगों को धर्म परिवर्तन के जाल में फंसाया जाता है..!

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विस्तार

कर्नाटक चुनाव में बीजेपी और कांग्रेस दोनों दलों ने मुफ्तखोरी और रेवड़ी की योजनाओं को अपने घोषणापत्र में सारे तर्कों को दरकिनार करते हुए शामिल किया है. शायद यह पहली बार हो रहा होगा कि मतदाताओं को आधा लीटर प्रतिदिन सरकार के सहकारी संघ के ब्रांड नंदिनी का दूध देने का वायदा किया गया है. बजरंगबली का मुद्दा चुनाव पर हावी हो गया है और सारे मुद्दे पीछे चले गए हैं.

लोगों के भले के लिए होने वाली सियासत की गली को भले ही सबसे भली गली के रूप में देखा जाता है लेकिन वास्तव में आजकल सियासत हर क्षेत्र में बली साबित हो रही है. राजनीति में अभी तक भगवान राम के मंदिर के निर्माण के लिए आंदोलन तो हुआ था लेकिन हनुमान के मंदिर के लिए किसी राजनीतिक दल ने वायदा नहीं किया था. 

कर्नाटक को हनुमान की जन्म स्थली के रूप में मान्यता प्राप्त है. जैसे ही ऐसा महसूस किया गया कि बजरंगबली के मुद्दे पर कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ सकता है तो कांग्रेस ने राज्य में हनुमान मंदिर बनाने का ऐलान कर दिया.धर्मनिरपेक्षता की बात करने वाली कोई भी पार्टी उसकी सरकार बनने पर मंदिर बनाने का वादा नहीं कर सकती है. 

कर्नाटक में 10 मई को मतदान है. चुनाव प्रचार बंद होने में अभी जितना भी समय बचा है, उसमें बजरंगबली के अलावा  शायद ही कोई मुद्दा चर्चा में आने वाला है. पूरे राज्य में एक साथ हनुमान चालीसा का पाठ, चुनाव प्रचार अभियान के रूप में जितनी संख्या में हुआ है उतना शायद पहले कभी नहीं हुआ होगा.

चुनावी जेहाद में बजरंग दल पर प्रतिबंध की बात आते ही बजरंगबली कर्नाटक चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा बन गए हैं. चुनाव के ओपिनियन पोल जो पहले सुशासन, भ्रष्टाचार रोजगार और विकास के मुद्दों पर हो रहे थे वह अचानक बदल गए. अब बड़े मीडिया समूह बजरंगबली के मुद्दे पर सर्वे प्रचारित-प्रसारित कर रहे हैं. यह सर्वे बता रहे हैं कि बजरंगबली का मुद्दा चुनाव नतीजों को प्रभावित करने जा रहा है.

चुनावी घोषणा पत्र चुनाव परिणामों के बाद अक्सर भुला दिए जाते हैं. ऐसा तो कभी भी नहीं होता कि घोषणापत्र के सभी वायदों को अमल में लाया जाए. राजनीतिक दल घोषणा पत्र में तो उन्हीं बातों को स्थान देते हैं जिनका भावनात्मक शोषण कर जनादेश को अपने पक्ष में किया जा सके. परिणाम जिस राजनीतिक दल के पक्ष में जाता है वह तो घोषणा पत्र को तोड़ मरोड़ कर लागू करने की कोशिश करते दिखाई पड़ते हैं लेकिन जो दल चुनाव में हार जाता है उसके घोषणा पत्र के मुद्दे दोबारा चर्चा में भी नहीं आते. शायद वह दल भी भूल जाता है कि उसने पिछले चुनाव में क्या वायदे किए थे. जहां घोषणा पत्रों की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं है वहां घोषणापत्र के किसी एक मुद्दे पर सारे चुनाव की दिशा बदल जाए यह कर्नाटक चुनाव में देखने को मिलता है.

कर्नाटक चुनाव में चल रहे मुद्दों का अगर विश्लेषण किया जाए तो सत्ता के दावेदार दोनों दल वही मुद्दे उठा रहे हैं जो धर्म और आस्था से जुड़े हुए हैं. किसी की सरकार बने अगर चुनावी मुद्दों के आधार पर कहा जाए तो निश्चित रूप से यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि कर्नाटक की अगली सरकार धर्म की सरकार होगी. यह अलग बात है कि सरकार का धर्म चुनाव परिणाम के पहले कुछ और होता है और सरकार गठन के बाद कुछ और होता है. बजरंग बली चुनाव जीतने के लिए ही मददगार नहीं हो सकते, पब्लिक के लिए गुड गवर्नेंस की आशा और विश्वास भी बजरंगबली ही पूरा कर सकते हैं.

बजरंगबली को हम हनुमान, महावीर, अंजनीपुत्र, कपीश, पवनपुत्र नामों से पूजते हैं. रामभक्त हनुमान के जितने नाम हैं उतनी ही उनकी शक्तियां भी हैं. शिव पुराण के अनुसार महावीर हनुमान, शिव जी के ही अवतार थे. पौराणिक मान्यता के अनुसार बजरंग बली को आज भी जीवित देवता के रूप में माना जाता है.

आस्था अपनी जगह है लेकिन अगर चुनावी आस्था की दृष्टि से देखा जाए तो बजरंग बली कर्नाटक चुनाव में जीवित देवता के रूप में सारे चुनावी मुद्दों को लील गए हैं. कांग्रेस और बीजेपी दोनों बजरंग बली को अपनी चुनावी जीत का आधार बनाने में जुटे हुए हैं. चुनाव परिणाम कुछ भी आए विजय बजरंग बली की ही होगी.