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दो चुनाव और भाजपा की प्रच्छन्न शक्ति

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 20 Jul

सार

गुजरात एक बड़ा सवाल है ? रिकार्ड देखें तो पिछले कुछ चुनावों में 182 सीटों में से 100 से ज्यादा सीटें उसके खाते में रही हैं, परन्तु 2017 का चुनाव अपवाद था, जिसमें वह सीटों का सैकड़ा पूरा करने में चूक गई,इसी कारण यह सवाल खड़ा है..!

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विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

05/11/2022

विधानसभा चुनावों का बिगुल बजने के बाद गुजरातऔर हिमाचल के सियासी समीकरण चर्चा में आ गये हैं | 1995 से गुजरात में काबिज भाजपा कायम रहेगी या नहीं, हिमाचल में तो जनता सरकार बदलती रहती है | गुजरात एक बड़ा सवाल है ? रिकार्ड देखें तो पिछले  कुछ चुनावों में 182  सीटों में से 100 से ज्यादा सीटें उसके खाते में रही हैं, परन्तु 2017  का चुनाव अपवाद था, जिसमें वह सीटों का सैकड़ा पूरा करने में चूक गई,इसी कारण यह सवाल खड़ा है | जहाँ तो मोर्चेबंदी का सवाल है, ‘कांग्रेस’ और ‘आप” को चुनौती  मानकर भाजपा ने इस बार गुजरात चुनाव में अपने पैतृक सन्गठन की जमावट करना शुरू कर दी है |इसी पैतृक सन्गठन के एक बुजुर्ग हितचिंतक को इस बार जीत आसान नहीं दिख रही |

2017 में सीटें कम मिली थीं लेकिन वोट प्रतिशत के लिहाज से पूर्व की तरह कांग्रेस और उसमें बड़ा फासला  था |

यूँ तो कांग्रेस यहां सफल प्रतिद्वंद्वी रही है, क्योंकि किसी तीसरे मजबूत दल का यहां अभाव था | मगर इस बार उसकी राह कुछ ज्यादा कठिन जान पड़ती है, क्योंकि आम आदमी पार्टी ने यहां सफल दस्तक दी है। इससे यहां का चुनावी समीकरण बदलता दिख रहा है। आप नेता अरविंद केजरीवाल कई महीनों से यहां प्रचार कर रहे हैं, जिसका असर भी दिखने लगा है। आप ने यहाँ एक पहचान बनाई है। इसी चिंता ने स्वयंसेवकों को जागृत कर दिया है |

पिछले उप-चुनाव भी त्रिकोणीय संघर्ष के संकेत दे रहे हैं। मगर इस संघर्ष में एक तरफ भाजपा है, तो दूसरी तरफ आप और कांग्रेस। मौजूदा स्थिति यही बताती है कि यहां भाजपा व दूसरी पार्टियों के बीच ठीक-ठाक फासला है। यहां के मतदाता भाजपा, विशेषकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से प्रभावित हैं। इसीलिए नजर इस बात पर होगी कि गुजरात चुनावों में दूसरे और तीसरे पायदान पर कौन सी पार्टी कब्जा करती है? याद कीजिये,स्थानीय निकाय के चुनावों में, खासकर सूरत के इलाकों में आम आदमी पार्टी ने अच्छा प्रदर्शन किया है, जिससे उसे नई ऊर्जा मिली है, मगर यह जोश जीत में कितना बदल पाएगा, नहीं कहा जा सकता।

वैसे कांग्रेस के लिए प्रत्यक्ष तौर पर तो दोतरफा जंग है। एक तरफ उसे भाजपा से लड़ना है, तो दूसरी तरफ, आप से मिल रही चुनौतियों से पार पाना होगा। बावजूद इसके उसकी चाल सुस्त दिखती है। भाजपा और आप जहां पुरजोर तरीके से अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही हैं| अपने सांस्कृतिक सन्गठन कहने वाले सन्गठन की प्रच्छन्न रणनीति का भी सामना उसे करना होगा | यूँ तो अमित शाह व अरविंद केजरीवाल जैसे नेता लगातार सक्रिय हैं, वहीं मतदाता कांग्रेस के पास कोई  ढंग का नेतृत्व न होने की बात कह रहे हैं। कभी कांग्रेस यहां मजबूत दल हुआ करती थी, लेकिन अब वह काफी कमजोर लग रही है। घर-घर जाकर अभियान चलाने का दावा कांग्रेस जरूर कर रही है, लेकिन इसका असर कम ही दिख रहा है। एक बात यह भी है कि आप जितना ऊपर उठेगी, कांग्रेस उतना नीचे की तरफ जाएगी। दिल्ली और पंजाब में आप ने कांग्रेस का आधार ही अपनी ओर खिसकाकर ही सरकार बनाई है, और गुजरात भी इसका अपवाद नहीं दिख रहा।

चुनाव परिणाम बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि पार्टियां किस तरह के उम्मीदवारों पर दांव लगाती हैं। यह चर्चा है कि जो पार्टी ढाई दशक से सत्ता में है, उसके खिलाफ अंदरूनी लहर है, लेकिन यह काफी ज्यादा इसलिए नहीं दिख रही, क्योंकि भाजपा ने इसकी काट ढूंढ़ ली है। उसने करीब एक साल पहले यहां का पूरा मंत्रिमंडल बदल दिया था। यहां तक कि नए मुख्यमंत्री की भी ताजपोशी की गई थी। यह सब इसलिए किया गया, जिससे राज्य सरकार के खिलाफ यदि लोगों में कोई असंतोष है, तो उसको दबाया जा सके। साफ- सफाई और सुलह के रास्ते खोजने में भाजपा के पैतृक सन्गठन  की महारत  है|

गुजरात के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश के चुनावों पर भी लोगों की स्वाभाविक नजर है। दोनों राज्यों में मतगणना 8  दिसंबर को होगी। हिमाचल प्रदेश में हर चुनाव में सरकार बदलती रही है। आम आदमी पार्टी ने यहां पर भी अपनी दावेदारी जताने की कोशिश की है, लेकिन पिछले छह माह की सियासी गतिविधियों से यही जान पड़ता है कि वह हिमाचल में शायद ही कोई खास टक्कर दे सके। कुल मिलाकर, हिमाचल में कांग्रेस और भाजपा ही आमने-सामने होंगी। इसीलिए हर चुनाव में सरकार बदलने की संभावना के आधार पर कहा जा सकता है कि इस बार सत्तारूढ़ भाजपा को कांग्रेस से कड़ी टक्कर मिल रही है। एक साल पहले हुए विधानसभा उप-चुनावों के नतीजे भी बताते हैं और लोकसभा उप-चुनाव के परिणाम भी, जिनमें कांग्रेस का ग्राफ भाजपा से काफी ऊपर रहा था। भाजपा के दोनों राज्यों में अपने पैतृक सन्गठन का भरोसा है | यहाँ यह सवाल है यदि आप सांस्कृतिक सन्गठन है, तो राजनीति न करें नहीं तो खुलकर वो राजनीति करें जो आपका घोषित उद्देश्य है | देश में इन दिनों इस सांस्कृतिक सन्गठन की छबि ‘कुर्सी बचाओ’  सन्गठन की बन रही है | खैर ! राजनीति में सब जायज है |