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आंकड़े नहीं, हकीकत समझिये – बहुत डरावनी है 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Thu , 19 May

सार

आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और उसके परिणामस्वरूप आने वाले संकटों से आम नागरिक त्रस्त है | इन विषयों के उन्मूलन की बात तो छोड़ ही दे इन विषयों पर राहत की भी कोई ठोस योजना किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है | 

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विस्तार

आज़ादी के 75 वर्ष बाद भी महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और उसके परिणामस्वरूप आने वाले संकटों से आम नागरिक त्रस्त है | इन विषयों के उन्मूलन की बात तो छोड़ ही दे इन विषयों पर राहत की भी कोई ठोस योजना किसी भी राजनीतिक दल के पास नहीं है | 

बड़े राजनीतिक दल भाजपा और कांग्रेस के प्रवक्ता आंकड़े देकर अपने-अपने पक्ष में दावे प्रस्तुत कर रहे हैं, ऐसी बहसों से जनता में भ्रम तो पैदा कर दिल्ली या राज्यों में सरकार तो बनाई जा सकती है,पर वह सरकार कल्याणकारी और लोकप्रिय नहीं हो सकती। 

कांग्रेस 8 साल पहले की महंगाई का हवाला देते हुए आज की स्थिति से उसकी तुलना करती है। उसके आंकड़े जरूरत की चीज़ों के दाम तब की तुलना में आज बहुत ज्यादा दर्शाते हैं। इसमें पेट्रोल-डीजल की कीमतों का उदाहरण सबसे मौजूद है। 

तब पेट्रोल की प्रति लीटर दर सत्तर रुपये के आसपास थी और आज सौ के आस-पास है। भाजपा भी साफ तौर पर यह बताने में सक्षम नहीं है कि पिछले आठ सालों में जीवनावश्यक वस्तुओं के दाम लगातार क्यों बढ़े हैं? 

वस्तुत: आम आदमी की जिंदगी लगातार दूभर हो रही है।

भाजपा के नेता प्रतिशत में बात करते हैं | जैसे, मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार के अलग-अलग सालों में महंगाई की वृद्धि-दर का प्रतिशत क्या था और नरेंद्र मोदी की सरकार के सालों में दर का प्रतिशत क्या रहा। 

स्पष्ट है, प्रतिशत में बात करना फायदे का तरीका उन्हें लगता है,  जबकि इस वृद्धि का प्रभाव इस दृष्टि से देखा जाना चाहिए कि आम आदमी महंगाई की मार से कैसे ग्रस्त है। आम आदमी के लिए सब्जी, दालें, गेहूं, चावल,  ईंधन यानी जीवन-यापन का हर साधन, पिछले आठ-दस साल की तुलना में कितना महंगा हो गया है। 

महंगाई की मार में पिसते आदमी की कठिनाइयों को समझने के लिए आंकड़ों की जरूरत नहीं है। जो सामने दिख रहा है उसे ईमानदारी से देखने भर की ज़रूरत है। आंकड़े झूठ नहीं बोलते यह कहना सच है, पर यह भी ग़लत नहीं है कि सिर्फ आंकड़ों के सहारे हकीकत को नहीं समझा जा सकता।

प्रतिशत का हाल भी औसत जैसा ही है। आवश्यकता आंकड़ों को जानने की नहीं, उनके अर्थ को समझने की  है। आज जो भी आंकड़े हमारे सामने हैं, वे यही बताते हैं कि या तो उन्हें सही और पूरे संदर्भों में समझने की कोशिश नहीं की जा रही या फिर स्थिति के लिए उत्तरदायी लोग सही समझना चाहते नहीं हैं।

आज महंगाई और बेरोजगारी दो बड़ी समस्याएं हैं। सबसे महत्वपूर्ण समस्याएं हैं। इन्हें पूरे संदर्भों में और पूरी संवेदनशीलता के साथ समझने की आवश्यकता है। यह सही है कि आंकड़ों के अनुसार आज हमारा भारत अर्थव्यवस्था की दृष्टि से ब्रिटेन को पीछे छोड़कर विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है, पर सही यह भी है कि दो साल पहले यानी 2020 में लगभग साढ़े पांच करोड़ भारतीय लुढ़ककर गरीबी के रसातल में पहुंच गये थे। 

आंकड़े यह भी बताते हैं कि वर्ष 2021 के वैश्विक भूख सूचकांक में भारत 116 देशों में 101वें स्थान पर था| सवाल है क्यों?

पिछले वर्ष ‘ऑक्सफैम इंडिया’ ने  ‘इनइक्वालिटी किल्स’ शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की थी। उसमें बताया गया था कि कोरोना दुष्काल के दौरान देश के 84 प्रतिशत परिवारों की आमदनी में गिरावट आयी थी। 

यह सही है कि इसी दौरान देश के अरबपतियों की संख्या 102 से बढ़कर 142 हो गयी थी। उनकी कुल संपत्ति दोगुनी से भी अधिक हो गई थी| इस रिपोर्ट का निष्कर्ष निकालते हुए ऑक्सफैम ने लिखा था, ‘भारत में संपदा की यह गैर-बराबरी उस व्यवस्था का नतीजा है जो गरीबी और हाशिये के लोगों के खिलाफ चरम धनिकों के पक्ष में चरम धांधली का शिकार है।’

कोरोना दुष्काल के दौरान देश की अस्सी करोड़ आबादी को मुफ्त अनाज दिया गया। चर्चा है उत्तर प्रदेश सरकार ने इसे बंद कर दिया है और केंद्र सरकार भी अगले माह से बंद करने वाली है।  

वास्तव में यह रेवड़ियां बांटने वाली बात नहीं है और मुफ्त अनाज सिर्फ चुनाव जीतने के लिए नहीं बांटा गया था। अस्सी करोड़ लोगों के जीने के लिए यह जरूरी था। महंगाई की मार से त्रस्त आम आदमी की आज भी स्थिति बदली नहीं है। बिगड़ रही है। इस स्थिति को समझने की ज़रूरत है। 

करोड़ लोगों को मुफ्त में खाद्यान्न देना एक जरूरत थी, पर इस बात को भी समझना ज़रूरी है कि अस्सी करोड़ आबादी भीख मांगने जैसी स्थिति में क्यों आयी? यह बात आंकड़ों से नहीं समझी-समझायी जा सकती। उचित और पूरे संदर्भों में स्थिति का आकलन ज़रूरी है। ईमानदारी से सोचना होगा कि देश की जनता को गरीबी से उबारने के लिए क्या किया जाना चाहिए?