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एकात्म नहीं खंड-खंड करता अंधविश्वास-आडंबर-पाखंड

सार

धर्म जीवन जीने का विज्ञान है. अध्यात्म, आत्मिक ऊर्जा को जगाने का उपक्रम है. प्रकृति ही जीवित परमात्मा है. आत्मिक ऊर्जा को जानने समझने और आत्म कल्याण का शिवतत्व चैतन्य जीवन में समाहित है. सनातन धर्म और अध्यात्म जीवन ऊर्जा को जागृत करने का विज्ञान है. इस पर अंधविश्वास-आडंबर और पाखंड न केवल अवैज्ञानिक है बल्कि भौतिक और पदार्थ की उपलब्धि के लिए जीवन को गलत दिशा में ले जाने का प्रयास है.

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विस्तार

धर्म और अध्यात्म के नाम पर जो भी इस तरह के व्यापार और व्यवसाय में लगे हुए हैं, उन्हें धर्म के विज्ञान को विस्तारित करने में ही अपनी ऊर्जा और समय लगाना समाज कल्याण के साथ ही उनके आत्म कल्याण के लिए भी जरूरी है. महाशिवरात्रि के पर्व पर हर सनातन आस्थावान व्यक्ति जीवन ऊर्जा को जगाने का प्रयास जरूर करना चाहेगा.

मध्यप्रदेश में कुबेरेश्वर धाम में महाशिवरात्रि उत्सव के अंतर्गत रुद्राक्ष वितरण के व्यवसायिक आयोजन से निर्मित अव्यवस्थाएं जीवन ऊर्जा जाग्रत करने में किसी भी तरह से क्या लाभान्वित हो सकती हैं? इस धाम पर उमड़ी भीड़ पूरे देश में चर्चा का विषय बनी हुई है. कोई भी धार्मिक और आध्यात्मिक व्यक्ति एकांत तलाशता है, अकेलापन खोजता है. ऐसा व्यक्ति दूसरे से मुक्त होकर अपने भीतर की ऊर्जा की खोज करने की कोशिश करता है.

धर्म के नाम पर भी सबसे बड़ा पाखंड यह लगता है कि भौतिकवादी होने के बावजूद व्यक्ति को आध्यात्मिक होने का भ्रम हो जाता है. हमारी सनातन संस्कृति में ऐसे महान अवतार और दिव्य पुरुष हुए हैं जो आध्यात्मिक थे. जिन्होंने दुनिया को धर्म और अध्यात्म का दर्शन दिया है. हमारा यह दर्शन देश की उपलब्धि तभी बन सकेगा जब हर मनुष्य को सही मार्गदर्शन और अनुभव मिले. इसके लिए जरुरी है कि समाज में धर्म और अध्यात्म के नाम पर आडंबर और अंधविश्वास न फैलाया जाए बल्कि चैतन्य जीवन की ऊर्जा की खोज में जीवन को लगाने का प्रयास किया जाए.

धर्म और अध्यात्म को भी आज व्यवसाय के रूप में कुछ खास लोगों द्वारा उपयोग किया जा रहा है. आत्मिक पहचान की बजाय मनुष्य आडंबर और पाखंड में संपूर्ण जीवन लगा देता है. ऐसी चालबाजियां और बेईमानी के कुचक्र रचे जाते हैं कि भोले भाले इंसान उससे प्रभावित होकर भटक जाते हैं.

कुबेरेश्वर धाम में उमड़ी भीड़ ने हमारी धार्मिक सोच और चिंतन पर सवाल खड़े कर दिए हैं. भीड़ की जरूरत तो हमेशा राजनीति में होती है. भीड़ तो राजनीति का ही छद्म वेश है. जहां भी भीड़ होती है वहाँ राजनीति की ही छुपी हुई शक्लें होती हैं. हमारे यहां धर्म भी राजनीतिक ढांचे पर खड़ा हुआ है. धर्म का नाम होता है और गहराई से देखने पर पता चलता है कि बदमाशी राजनीति की होती है.

अक्सर ऐसा देखा गया है कि चोर चोरी के खिलाफ आवाज उठाता है. बेईमान व्यक्ति बेईमानी के खिलाफ सर्वाधिक तेजी से आवाज उठाता है. भ्रष्टाचार के खिलाफ भ्रष्टाचारी जितना तेजी से और ताकत से आवाज रखेगा उतना ईमानदार आदमी नहीं रख सकेगा. इंसान का स्वभाव विश्वास पर टिका हुआ है. इसका जितना दुरुपयोग धर्म और राजनीति में दिखाई पड़ता है उतना दुरुपयोग किसी अन्य चीज का नहीं दिखाई पड़ता है.

आज धर्म के आधार पर विभाजन और टकराव सामान्य रूप से दिखाई पड़ता है. इसके पीछे भी धर्म के नाम पर चालबाजियों की ही भूमिका देखी जा सकती है. अलग-अलग धर्मों के बीच टकराव की बात तो विचारों में अंतर के कारण समझी जा सकती है लेकिन एक ही धर्म में टकराव और मान्यता में बड़ा विभेद दिखाई पड़ता है. सनातन संस्कृति में जो मान्यताएं हैं उसमें 33 करोड़ देवी-देवताओं की मान्यता है. जब देवी-देवताओं की मान्यता में ही इतना विभाजन है तो फिर इंसान और राष्ट्रीय एकता का स्वरूप कैसे मजबूत होगा?

आजकल धार्मिक और आध्यात्मिक आयोजन के नाम पर प्रतियोगिता सी चल रही है. अयोध्या में रामनवमी पर दीपों का एक रिकॉर्ड बनाया गया था तो अब उज्जैन में महाशिवरात्रि के अवसर पर उस रिकॉर्ड को तोड़ने की प्रतियोगिता चल रही है. ऐसी प्रतियोगिता से किसको लाभ होगा? क्या इससे जीवन में ऊर्जा की पहचान के लिए धर्म के विज्ञान को बढ़ावा मिलेगा? या इससे राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश की जाएगी? धर्मगुरु और कथावाचक आजकल अपनी कथाओं में राजनीतिक संदेश देने से नहीं चूकते हैं. धार्मिक आयोजन का राजनीतिक रूप से उपयोग सामाजिक जीवन को विकृत करने की दिशा में ले जा रहा है.

सनातन शास्त्रों ने शिव के परम तत्व को अव्यक्त, अजन्मा, सब का कारण, सृष्टि, पालक एवं संघारक बताया है. शिव का अर्थ कल्याण स्वरूप और कल्याण प्रदाता है. परम ब्रह्म शिव के इस कल्याणकारी रूप की उपासना उच्च कोटि के सिद्ध, आत्म कल्याणकामी साधकों एवं सभी श्रद्धालुओं के लिए परम मंगलमय, परम कल्याणकारी, सर्व सिद्धिदायक एवं सर्व श्रेयस्कर है. भगवान राम तथा श्री कृष्ण के तो महादेव परम आराध्य हैं. महाशिवरात्रि का पावन अवसर जीवन की ऊर्जा को जगाने और पहचानने का अवसर बनेगा तो आत्म कल्याण की दिशा में मानव धर्म को नया अनुभव अवश्य मिलेगा।