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‘PAY नाथ’ और ‘फोन Pe’ के बीच कहां है जनता के लिए WAY

सार

भ्रष्टाचार का सत्य सरकार और राजनेता को तब तक समझ नहीं आता जब तक कुर्सी और राजनीति किनारा नहीं कर लेती. राजनीति के पॉवर का नशा भ्रष्टाचार के हाईवे पर ही सरपट दौड़ता है. जैसे जीवन में राम नाम की सत्यता का बोध और जागरण भले ही नहीं हुआ हो लेकिन अर्थी पर लेटे पार्थिव शरीर को राम नाम सत्य बोल बोल कर सुनाया जाता है. वैसे ही सरकारों में शामिल राजनेता भ्रष्टाचार को न देख पाते हैं न महसूस कर पाते हैं. जैसे ही कुर्सी छिटकती है और विपक्ष की दृष्टि मिलती है वैसे ही भ्रष्टाचार का सत्य बंद आंखों से भी दिखाई पड़ने लगता है.

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विस्तार

चुनाव ऐसा ही एक अवसर होता है जब सत्ता को विपक्ष का भ्रष्टाचार राजनीति का सत्य दिखता है. मध्यप्रदेश में भ्रष्टाचार का सत्य ऐसे उजागर हो रहा है जैसे धर्मराज पूरे जीवन का हिसाब बता रहे हों. 'पे नाथ' और 'फोन पे' का गौरव गान सुनने के लिए राज्य की जनता को मजबूर होना पड़ रहा है. राज्य मूकदर्शक बनकर राजनीतिक पहलवानों के करतब देख रहा है. राज्य का अतीत वर्तमान और भविष्य अनाथ जैसा 'पे नाथ' और 'फोन पे' के बीच छटपटा रहा है. राम नाम सत्य तभी जीवन के लिए उपयोगी और सार्थक है जब चैतन्य स्थिति में उसका स्मरण किया जाए. इसी तरह से भ्रष्टाचार का सत्य तभी राज्य के लिए सार्थक है जब सत्ता की कुर्सी के समय भ्रष्टाचार विरोधी चेतना जागृत और क्रियाशील हो जाए.

मध्यप्रदेश के बुनियादी विषयों पर ना तो सत्य सामने लाया जाता है और ना ही सत्य पर विमर्श होता है. राज्य में शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार के हालात पर पिछड़ापन किसी को भी उद्वेलित नहीं करता. अस्पतालों के हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य केंद्र सुविधाओं के लिए कराह रहे हैं. आए दिन ऐसे तथ्य सामने आते हैं लेकिन लीपापोती के बाद फिर वही ढर्रा चलने लगता है. धनी लोग सरकारी अस्पतालों में इलाज ही नहीं कराते. नेता-अफसर और पैसे वाले निजी अस्पतालों में बेहतर सुविधाओं का लाभ उठाते हैं. गरीब लोग अपनी बेबसी सरकारी अस्पतालों में जीते हैं. 

राजनीति का सत्य देखिए कि अस्पतालों में बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के लिए एक दूसरे पर आरोप लगाने से भी नेता बचते हुए दिखाई पड़ते हैं. शिक्षा के मामले में भी हालात बहुत अच्छे नहीं हैं. विवाद केवल इस बात पर होता है कि राजनीतिक विचारधारा से प्रेरित महापुरुषों को पाठ्यक्रमों में पढ़ाया जाए कि नहीं पढ़ाया जाए. सरकारी और प्राइवेट स्कूलों में व्यवस्थाओं में जमीन आसमान का अंतर देखा जा सकता है. रोजगार में तो शायद इसलिए कोई बुनियादी प्रयास नहीं होता क्योंकि राजनेताओं के पुत्र-पुत्री को तो रोजगार की आवश्यकता ही नहीं पड़ती. उनके लिए रोजगार राजनीतिक क्षेत्र में ही उपलब्ध है. परिवारवाद की राजनीति वारिसों के रोजगार का माध्यम बनी हुई है.

भ्रष्टाचार का अपराध दो अलग-अलग लोग करें और ऐसा करने वाले दोनों लोग ही एक दूसरे के खिलाफ गवाही देने को तैयार हैं. इसके लिए पोस्टर और दस्तावेज भी दोनों बाजार में स्थापित कर रहे हैं तो फिर भ्रष्टाचार के किसी भी अपराधी का बचाव क्यों होना चाहिए? गवर्नेंस का पूरा सिस्टम भ्रष्टाचार की गिरफ्त में आ गया है. टेंडर, पोस्टिंग, ट्रांसफर, अपॉइंटमेंट और ठेकों के पूरी प्रक्रिया राम नाम सत्य के दौर में पहुंच गई है.

किसी को इंगित कर कोई भी आक्षेप लगाने की आवश्यकता ही नहीं है. केवल पब्लिक के बीच परसेप्शन पर विचार करने की जरूरत है. जाति और संप्रदाय की राजनीति आज की राजनीति का बहुत बड़ा सत्य ही है. चुनाव में इसको उभारा जाता है. जो विचार और परिस्थितियां राष्ट्र और राज्य के लिए घातक हैं वही राजनीतिक दलों के लिए लाभदायक दिखाई पड़ती हैं.

अगर कोई सामान्य नागरिक किसी भी एक व्यक्ति के खिलाफ कोई आरोप लगाता है, उसके खिलाफ कोई पोस्टर लगाता है तो तत्काल कानून के तहत कार्यवाही प्रारंभ हो जाएगी लेकिन 'पे नाथ' और 'फोन पे' के आरोपों पर केवल राजनीतिक विमर्श ही दिखाई पड़ रहा है. इसको लेकर कोई गंभीरता दिखाई नहीं पड़ रही है. राजनीतिक बयानबाजी केवल इस बात को लेकर हो रही है कि परसेप्शन में एक दूसरे को भ्रष्ट साबित करने में आगे निकल कर जनमानस में चुनाव के समय समर्थन में आगे निकला जा सके.

ऐसा नहीं है कि इसके पहले राजनीति नहीं होती थी. बड़े-बड़े राजनेता इस राज्य में हुए हैं जिनके एक इशारे पर बड़े-बड़े फैसले हुआ करते थे. राम नाम सत्य होने के बाद बड़े-बड़े नामों को अनाम होते हुए देखा गया है. जीवन की इस सत्यता का आभास न मालूम वर्तमान को तब तक क्यों नहीं होता जब तक उसका पॉवर भी भूत नहीं हो जाता.

गुड गवर्नेंस और ‘शुद्ध के लिए युद्ध’ के नारे तो बहुत सुनाई पड़ते हैं लेकिन चुनाव के समय नारे देने वाले दल 'पे नाथ' और 'फोन पे' पर सिमट जाते हैं. मध्यवर्ग का नागरिक राजनीतिक दलों की फ्रीबी के महाजाल में जानलेवा संकट से गुजर रहा है. सरकारी धन से वोट खरीदने की रणनीति पर नगद सहायता देने के कदम ही अब राजनीतिक सत्य बचे हैं. सरकारें कब डूब जाएं? कब वेतन और पेंशन देना बंद हो जाए? राज्यों के कर्जों की हालत बेतहाशा बढ़ती जा रही है. इसके बावजूद पुरानी पेंशन योजना लागू करने का वादा राज्य के भविष्य के लिए नहीं है बल्कि इसका उद्देश्य राजनीतिक भविष्य बनाना है.

कोई भी राजनीतिक दल समाज सेवा का कोई भी प्रसंग दल के स्तर पर नहीं करता है. सरकारी धन से ही सारे ढोंग रचे जाते हैं. सफेदपोश नेताओं की गाड़ियों और कपड़ों के कलफ पर जितने पैसे खर्च होते हैं उतने में कई परिवार जीवन यापन कर सकते हैं. भ्रष्टाचार पर राजनीतिक प्रवचन तो अब लोगों को न केवल निराश करने लगे हैं बल्कि आक्रोशित तक कर रहे हैं.

जीवन का सत्य जब तक राजनीति का सत्य नहीं बनेगा तब तक दिखावे के असत्य पर जो इमारत खड़ी होगी, उसका बहुत लंबे समय तक खड़े रहना संभव नहीं होगा. नीति और नियत के बिना राज्य के संसाधनों से खिलवाड़ राज्य के भविष्य को उज्जवल और तेजपूर्ण नहीं कर सकेगा. राजनीति का तमाशा, जन आशा को निराशा में बदलता दिखाई पड़ रहा है. जन जागरुकता से राजनीति की असत्यता का 'राम नाम सत्य' करने का समय आ गया है.