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भारत में रेडियो के दिन बदलेंगे?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 14 Jul

सार

ये दिन रेडियो के लिए अच्छे नहीं गुजर रहे। पिछले साल रेडियो ऑपरेटरों ने बमुश्किल  2,100 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया इसके विपरीत समूचे मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग के वर्ष 2022 में कमाए 2.1 लाख करोड़ रुपये कमाए..!

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विस्तार

लगता है देश में रेडियो के दिन कुछ बदलेंगे। भारतीय दूरसंचार नियामक प्राधिकरण ने 5 सितंबर को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय को दीं अपनी सिफारिशों में एफएम चैनलों पर समाचारों की इजाजत देना, लाइसेंस व्यवस्था को तर्कसंगत बनाना और मोबाइल फोन में एफएम रिसीवर अनिवार्य करना शामिल किया है।सब जानते हैं ये दिन रेडियो के लिए अच्छे नहीं गुजर रहे। पिछले साल रेडियो ऑपरेटरों ने बमुश्किल  2,100 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया इसके विपरीत समूचे मीडिया और एंटरटेनमेंट उद्योग के वर्ष 2022 में कमाए 2.1 लाख करोड़ रुपये कमाए। 

पता नहीं क्यूँ मीडिया प्लानर रेडियो को महत्त्वपूर्ण माध्यम के रुप में नहीं देखते हैं। वर्ष 2018 में अपने चरम काल में रेडियो ने 3,360 करोड़ रुपये का राजस्व कमाया, लेकिन 2020 में कोविड महामारी ने इसे आधे से भी कम करके 1,430 करोड़ रुपये कर दिया। उसी साल भारत के सबसे बड़े ब्रांड ने अपने नाम से रेडियो शब्द हटा दिया।ईएनआईएल का रेडियो मिर्ची नाम मिर्ची अनलिमिटेड हो गया। यह सही है कि ज्यादातर ऑपरेटरों ने अपना नाम नहीं बदला है लेकिन उनमें से कई अपने राजस्व का 30 से 40 प्रतिशत डिजिटल सामग्री, इवेंट या रेडियो के सिवा अन्य तरीके से कमाते हैं। और शायद इसी एकमात्र तरीके ने उनको बचा रखा है।

अभी आई नयी सिफारिशों में एफएम चैनलों पर समाचारों की इजाजत देना, लाइसेंस व्यवस्था को तर्कसंगत बनाना और मोबाइल फोन में एफएम रिसीवर अनिवार्य करना शामिल है।अगर इन पर अमल हुआ तो इनसे रेडियो को अपने श्रोताओं की संख्या दोगुनी करने, लागत घटाने और विज्ञापनों की बेहतर दर हासिल करने में मदद मिल सकती है।इन सुझावों से इतनी ज्यादा उम्मीद की क्या वजह है। वर्ष 2000 में जब रेडियो को मुक्त किया गया था तो उस समय लगभग अन्य सभी तरह का मीडिया-टीवी, प्रिंटऔर फिल्म उससे कहीं आगे पहुंच चुके थे।

दूसरों के विपरीत रेडियो की मुक्ति तो हुई मगर भारी लाइसेंस फीस के साथ। उदाहरण के लिए 2015 में तीसरे दौर के लाइसेंस के दौरान एफएम रेडियो परिचालकों को 3,100 करोड़ रुपये से अधिक लाइसेंस और माइग्रेशन फीस के रूप में भरने पड़े। यह रकम 2014 में रेडियो के कमाए राजस्व 1,720 करोड़ रुपये की करीब दोगुनी है। इससे भी बुरा यह था कि दिशानिर्देशों में लाइसेंस फीस सकल राजस्व (इसमें जीएसटी भी शामिल) की चार फीसदी या फिर किसी एक शहर के लिए ढाई प्रतिशत का एकबारगी प्रवेश शुल्क या इनमें से जो भी ज्यादा हो, तय की गई।

ट्राई के विश्लेषण को देखें तो 182 रेडियो केंद्रों ने 4 प्रतिशत से अधिक का लाइसेंस शुल्क चुकाया जबकि 34 केंद्रों ने जो लाइसेंस फीस चुकाई, वह वर्ष 2021-22 के राजस्व का 30 प्रतिशत थी। अगर लाइसेंस शुल्क ने लागत बढ़ाई तो लाइसेंस की शर्तों ने राजस्व जुटाने की उनकी क्षमता को प्रभावित किया।

एक ही शहर में कई रेडियो स्टेशनों का मालिक होने से लेकर टावर की सह-साझेदारी की इजाजत नहीं दी गई और ना ही समाचार प्रस्तुत करने की अनुमति मिली। इस तरह से लगभग सभी शर्तों ने प्रोग्रामिंग के नवाचार को न केवल सीमित कर दिया बल्कि पहुंच और राजस्व को भी प्रभावित किया।

अब ट्राई ने सिफारिश की है कि लाइसेंस फीस को एकबारगी वापस न किए जाने वाले प्रवेश शुल्क से अलग किया जाए और इसकी गणना सकल राजस्व के चार प्रतिशत पर होनी चाहिए जिसमें जीएसटी शामिल नहीं हो। अगर ऐसा होता है तो इससे रेडियो परिचालकों की लागत 10 से 40 प्रतिशत के बीच कम करने में मदद मिलेगी जो किसी परिचालक के पास मौजूद शहरों और रेडियो केंद्रों पर निर्भर करेगी।

करीब दो दशक के निजीकरण और करोड़ों रुपए के पूंजी खर्च के बाद रेडियो राजस्व और पहुंच दोनों के लिहाज से अभी भी कमजोर माध्यम है। इसमें आश्चर्य नहीं जो अगले दौर की नीलामी में उन 200 से अधिक फ्रीक्वेंसी के लिए कोई बोलीदाता नहीं मिला जो तीसरे दौर के बाद बच गई थीं। भारत में रेडियो की पहुंच लगभग एक ही जगह टिके होने की एक वजह यह भी है कि कई निर्माता अपनी संगीत प्रसारण सेवा या ऐप को बढ़ावा देने के लिए हैंडसेट में रेडियो रिसीवर को डिसएबल कर देते हैं।

यही कारण है कि ट्राई ने सिफारिश में कहा है कि एफएम रेडियो से जुड़े फीचर और फंक्शन सभी तरह के मोबाइल हैंडसेट में इनेबल और एक्टिवेट रहने चाहिए और स्थाई समिति इसकी निगरानी करे कि फोन निर्माताओं और आयातकों ने ऐसा किया या नहीं। इस नियमाकीय उपाय के और भी कई व्यावहारिक कारण हैं।

अगर निर्माता इस पर अमल करते हैं तो एफएम रेडियो एक अरब से अधिक मोबाइल धारकों तक पहुंच सकता है। इसका मतलब यह हुआ कि श्रोताओं की संख्या बढ़कर आराम से 52 करोड़ से अधिक हो जाना।ज्यादा श्रोता होने का मतलब है अधिक राजस्व और बेहतर प्रोग्रामिंग और बड़े स्तर की आर्थिकी। रेडियो परिचालकों को इससे अधिक चाहिए भी नहीं। अब देखना है कि मंत्रालय उनको कितना उपकृत करता है और इन सिफारिशों को नीति में बदलता है या नहीं।