अदृश्य उज्जैन

उज्जैन जाने को मन फिर मचल रहा है.इस नगर में न जाने ऐसा क्या है, जो बार-बार अपनी ओर खींचता है. अपनी पिछली उज्जैन यात्रा में क्षिप्रा के तट पर इस पवित्र नदी की लहरों को निहारते बैठे उज्जैन के आकर्षण को लेकर चिन्तन हुआ.

मैंने महसूस किया जैसे प्रत्यक्ष दिखाई देने वाले उज्जैन नगर के भीतर भी एक उज्जैन है, जो भौतिक दृष्टि से दिखाई नहीं देता. यह एक आध्यात्मिक ऊर्जा क्षेत्र है, जो सिर्फ अनुभवगम्य है. यह कभी नहीं बदलता.

जब हमारे पूर्वज यहाँ आते होंगे, तब यह नगर एकदम भिन्न लगता होगा. इसके मकान पुराने तरह के होंगे, जिनके कुछ अवशेष आज भी कहीं-कहीं दिख जाते हैं.परिवहन के साधन नगण्य होंगे, बिजली होने का तो सवाल ही नहीं. अलग-अलग समय पर इसके अलग-अलग नाम भी रहे, जैसे उज्जयनी, अवंतिका आदि. इस नगर का बाहरी स्वरूप और नाम बदलते रहे; जो नहीं बदला, वही आंतरिक उज्जैन अर्थात आध्यात्मिक ऊर्जा क्षेत्र है. इसी उज्जैन के राजा महाकाल हैं. भौतिक नगर का शासक कोई भी रहा हो, लेकिन आंतरिक उज्जैन के शासक महाकाल ही हैं, जिन्हें शास्त्रों में सम्पूर्ण पृथ्वीलोक का शासक कहा गया है. कदाचित इसी अवधारणा के कारण कोई भी शासक रात को उज्जैन में नहीं ठहरता.

हमारे पूर्वज जब यहाँ सिंहस्थ में आते थे तब भी शाही स्नान होते थे, साधुओं के खालसा, शिविर और अखाड़े सजते थे. उनकी शोभा यात्राएं निकलती थीं. इन साधुओं के शरीर कब के मर गये, जिस तरह हमारे पूर्वजों के. वे शरीर या चेहरे बदल गये (शायद न भी बदले हों), लेकिन खालसा, अखाड़े और शिविर सजते हैं; शोभा यात्राएं निकलती हैं.

इन साधुओं को देखने भीड़ तब भी उमड़ती थीं, तब भी बच्चे, बूढ़े, युवा, सभी इनकी शोभा यात्राओं की झलक पाने को उत्सुक थे. आज भी लोग इसके लिए उतने ही उत्सुक हैं, उनमें फर्क नहीं है. उनके कपड़े, रहन-सहन, भाषा आदि बदल गये हों, लेकिन जो नहीं बदला वही उज्जैन है, जिसकी बात करने की मैं कोशिश कर रहा हूँ।

यह उज्जैन उस उज्जैन नगर में छुपा है, जो दिखाई देता है. यह अदृश्य उज्जैन वही आँखें देख सकती हैं, जो भक्ति के गंगाजल से निर्मल हो चुकी हों; जो ध्यान में लंबे समय तक उन्मीलित रही हों; अथवा जो पर किसी संत का कृपा-कटाक्ष पा चुकी हों. वही ह्रदय इसका अनुभव कर सकता है, जो साधना से निर्मल हो गया हो.

इसी  आंतरिक उज्जैन को देखने का बड़ा सुन्दर अवसर पिछले सिंहस्थ के दौरान मिला. यहाँ महीने भर एक ऐसा अद्भुत धार्मिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक समागम हुआ, जिसकी मिसाल दुनिया में ढूँढे नहीं मिलती.

इस एक महीने में यहाँ अद्भुत नाम और रूपधारी संत, योगी, ध्यानी, मुनि, महंत, मंडलेश्वर, सिद्ध, नाथ, हठयोगी तांत्रिक, भक्त तथा अन्य अनेकानेक पथों के पथिक एकजुट हुए. इनमें से अधिकतर तो ऐसे हैं, जो अपने मठ या अखाड़े से यदाकदा ही बाहर निकलते हैं. देश के कोने-कोने में ये अपने मठ, अखाड़े अथवा केन्द्र से अपने गृहस्थ अनुयायिओं तथा भक्तों को सद्गृहस्थ बनकर जीने में मार्गदर्शन और मदद करते हैं. सुख-दुख की घड़ी में वे इन परिवारों के संबल हैं.

इनकी साधना पद्धतियां, मंत्र, परम्पराएं, विधि-विधान, अनुष्ठान आदि अलग-अलग हैं, लेकिन इन सभी में एक आंतरिक एक्य है. यही एक्य आंतरिक उज्जैन है. ये सभी पूरे एक माह यहाँ रहे. इनके अखाड़ों, खालसों तथा शिविरों में इनके अनुयायी और भक्त, सपरिवार आकर ठहरे. वे कुछ दिन अथवा पूरे माह सांसारिक कार्यों से मुक्त होकर सत्संग, सेवा और साधना से अपने वैराग्य भाव को पुष्ट कर, वापस संसार में नयी ऊर्जा, उत्साह और सकारात्मकता से लौटे. संतों ने भी भक्तों की सुख-सुविधा का खूब ध्यान रकहा.

सिंहस्थ तो अपनी जगह, लेकिन आम दिनों में भी उज्जैन सदा दिव्य है. यहाँ एक से एक बढ़ कर मंदिर, मठ, अखाड़े, आश्रम और उनमें रहने वाले साधू-संतों के सामीप्य और आशीर्वाद से वह उज्जैन दिख सकता है, जो शाश्वत है, जो बदलता नहीं और जिससे भीतर के तार जुड़ जाने पर अंतर स्वयं उज्जैन अर्थात ऊर्जा क्षेत्र हो जाता है – जिसके राजा श्रीमहाकालेश्वर यानी अपने महाकाल हैं.

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