ब्रह्माँड के रहस्य -10… ब्रह्म और विज्ञान

ब्रह्म और विज्ञान

ब्रह्माँड के रहस्य -10

रमेश तिवारी 

देवासुर संग्रामों के प्रत्यक्षदर्शी वर्णन सुने गये हैं। देवताओं और असुरोंं के मध्य कितने ही युद्ध हो भी चुके हैंं। देवासुर संग्राम तो रूके नहीं। चल रहे हैं। प्रश्न है कि यह देवासुर संग्राम होते ही क्यों हैं। क्या इन युद्धों को रोका नहीं जा सकता। क्या इन संघर्षों को "ब्रह्म "की खोज भी नहीं रोक पाई। "ब्रह्म "को विज्ञान से जोडा़ गया। उन महान साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिक को कितने कष्ट झेलना पडे़। और अंत में परिणाम क्या निकला -"विभाजन "। देवताओं और असुरों के बीच बंटवारा कैसे हुआ...! हम आज जान लेते हैं।

"शतपथ ब्राह्मण "में ब्रह्माँड के सभी कठिन रहस्यों पर से अंधकारमयी परदे को हटा कर प्रकाशमयी जगत के दर्शन कराने के सफल प्रयास किये गये हैं। जहां कि मात्र अंधकार ही अंधकार था। हमने कल मेरू, कुमेरू और सुमेरू की बात प्रारंभ की थी। असलियत में यह तीनों कोई पर्वत नहीं हैं। भौतिक जगत में सुमेरू कहते हैं उत्तर ध्रुव को और कुमेरू अर्थात दक्षिण ध्रुव। इन दोनों ध्रुवों को एक दूसरे से संधिबद्ध कराने वाला मेरू कहलाता है। हमारी रीढ़ की हड्डी की तरह। पृथ्वी पिंड को एकता बद्ध रखने वाला अग्नि। यह समझ लें कि पृथ्वी के नीचे धधक रही अग्नि की एक बहुत मोटी "राड"। जिसके एक सिरे पर उत्तर (ध्रुव) है, तो दूसरे सिरे पर दक्षिण (ध्रुव)। पृथ्वी में खदबदाती रहने वाली अग्नि में यह तप्त राड इस प्रकार ही समझो, जैसे मनुष्य के शरीर में मष्तिस्क से लेकर नीचे पृष्ठ भाग को जोड़ने वाली सुशुम्णा नाडी़।

इस ब्रह्मांँड में जिन लोकों के आधार पर मनुष्य के शरीरांगों का बंटवारा और नामकरण है। उसमें शरीर के दो हिस्से बहुत महत्वपूर्ण हैं। शरीर में एक भाग है -विज्ञान ( मस्तिष्क) का और दूसरा प्रज्ञान ( कंठ से लेकर कटि प्रदेश) का। हम अभी विज्ञान विभाग की ही चर्चा करेंगे। क्योंकि विज्ञान विभाग से ही प्रज्ञान का संचालन हो रहा है। विज्ञान में विचार उठा की दौडो़। तो पांव तत्काल आदेश मान कर दौड़ने लगते हैं। मष्तिस्क कहे कि फलां फलां को थपाडा़ मार दो। हाथ एक दम पिल पडेंगे। दे तडा़तड़। जब तक कि मष्तिस्क अपने अगले आदेश की घोषणा नहीं कर देता, आज्ञाकारी हाथ, प्रसाद बांटते ही रहेंगे। यहां एक बात और भी महत्वपूर्ण है। और वह यह कि क्या प्रज्ञान विभाग में इतनी क्षमता है कि वह विज्ञान विभाग को कोई आज्ञा दे सके...?

BRAHMAND (UNIVERSE 🌌): सूर्य(SUN🌣)
हम अदरू नामक दैत्य की कथा सुनायेंगे। यह भी बतायेंगे की कि ये दैत्य और असुर कितनी खापों में विभक्त थे, और हैं भी। इनकी आधिभौतिक स्थिति, अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका में कैसे बनी। देव और असुरों में ऐशिया और ऐशिया माइनर का बंटवारा कब, किसने और क्यों किया। और यह भी कि -क्या ये दोनों पक्ष आपस में भाई, भाई थे। तो इतना सक्षम वह मध्यस्थ कौन होगा जो प्रलयंकारी देवों और असुरों के बीच सुलह करवा सके। यहां फिर यह प्रश्न उठ सकता है कि वह साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिक महोदय आखिर थे कौन...!

तो मित्रो, समझ लीजिये..! उस साध्य वैज्ञानिक ब्राह्मण का कोई नाम तो नहीं मिलता। किंतु उन महोदय का यशोनाम अवश्य पड़ गया था। और वह "यशोनाम "था, है और हमेशा ही रहेगा भी "ब्रह्मा "। नास्तिक साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिकों को ब्रह्म के साथ जोड़ने का काम अकल्पनीय था। और वह भी इसलिये बहुत महत्वपूर्ण ,क्योंकि ब्रह्मा जी ने अहंकारी और नास्तिकों की "नट्टी "ठिकाने लाने में पहली बार क्रांतिकारी (दलित, शूद्रों को ब्राह्मणों के साथ जोड़ने का ) कदम उठाया।

ब्राह्मण ग्रंथ क्या लिखते हैं.. तब के प्रचलित चारों वर्ण थे। साध्य, महाराजिक(क्षत्रिय) वणिक (वैश्य) और तुषित (शूद्र) ।किंतु गुटबाज और ब्रह्म को लेकर घनघोर नास्तिक साध्यों को उनकी स्थिति (हद, हैसियत) में रखने के लिए इस महान यशोनाम ब्रह्मा ने तुषितों से सहयोग लिया । तुषित जो बात समझे वह बात ये अन्य अहंकारी साध्य ब्राह्मण नहीं समझ पा रहे थे। परन्तु ब्रह्मतत्व की स्थापन हो ही गई। तुषितों के सहयोग से ही इस महान ब्रह्म तत्व की स्थापना हो सकी है। तब अन्य साध्य ब्राह्मण वैज्ञानिक भी ब्रह्मा एंड ब्रह्म समर्थक पार्टी के साथ आ गये ।"जिधर दम, उधर हम "की तर्ज पर।

यह थी "यशोनाम "की कथा। अब हम अदरु दैत्य की बात करते हैं। आपने टैरिसमाऊंट (महल) का नाम तो सुना ही है। यह टैरिस माऊंट आध्यात्मिक संकेत का प्रतीक है।आसुरी प्रवृत्ति का प्रतीक। धन, वैभव, वासना ,अनाचार, दुराचार, आदि का प्रतिनिधि त्रिवासुर द्वारा निर्मित वह तीन खंडा महल (नगर) जो कि लौह ,रजत और स्वर्ण द्वारा निर्मित किया गया था। इसी संपन्नता से असुर गण बौरा गये। "कनक कनक ते सौ गुना, मादकता अधिकाय। जा पाये बौरात है बा खाये बौराय "। उत्पात मचाने लगे। देव शक्तियों को सताने लगे। पेट की भूख मिटते ही दीगर भूखें बढ़ने लगीं। और अंत में इन असुरों का जो हश्र हुआ। वह भौतिक जगत में प्रसिद्ध है।

उत्पातियों के खिलाफ एकत्रित होकर सामूहिक दंड कैसे दिया जाता है,अर्थात सामूहिक पिटाई। घेर घेर कर मारना...! तो मित्रो मिलते हैं कल

धन्यवाद |

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं


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