वस्ति योग क्रिया क्या है। Basti Kriya is effective in reducing obesity, know the right way to do it 

वस्ति योग क्रिया क्या है। Vasti yoga in hindi

वस्तिकर्म के प्रकार। Types of Vasti yoga kriya in Hindi
Basti Kriya is effective in reducing obesity, know the right way to do it 

Basti Kriya Kya Hai | Basti Kriya in Hindi | Basti Kriya Benefits

वस्ति को पंचकर्मों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्थान दिया गया है। सुश्रुत कहते हैं कि स्नेहन, स्वेदन, वमन, विरेचन की अपनी सीमाएँ हैं। वे मर्यादा में रहकर ही संपादित किए जाते हैं, पर वस्ति का क्षेत्र तो अति व्यापक है (सु०चि० ३५/१)। वस्ति के बहुत से गुण बताए गए हैं।

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वस्ति इसलिए महत्त्वपूर्ण है कि यह शरीर के हर भाग में जो दोष हैं, उन्हें विभिन्न मार्गों से बाहर निकालने में समर्थ है। अन्य शोधन कर्म मात्र शोधन करते हैं, पर यह शोधन के साथ शमन भी करती है। वस्ति लगभग सभी रोगों को ठीक करने में समर्थ है। अतः यह आधी से भी अधिक चिकित्सा मानी गई है। कुछ वैद्य कहते हैं कि यह संपूर्ण चिकित्सा है। 

वस्ति योग क्रिया
वस्ति का माहात्म्य इस प्रकार बताया गया है:

(१) अनेक औषधियों को मिलाकर दिए जाने के कारण यह तीनों दोषों वात, कफ, पित्तादि दोषों का शमन करती है।

(२) वस्ति मलों (दोषों) की संग्राही भी होती है।

(३) अतिस्थूल व्यक्तियों (ओबेसिटी से ग्रस्त) को दुबला बनाती है। 

(४) दुबलों को सबल-मांसल बनाती है।

(५) शुक्रवृद्धि करती है। 

६) वयः स्थापन करती है। आयु बढ़ाती है।

(७) त्वचा का रंग उज्ज्वल बनाती है। 

(८) शरीर का बल समग्र रूप में बढ़ाती है।

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वमन मात्र दोषों को ऊर्ध्व मार्ग से निकालता है और भी आमाशय से ही। विरेचन बड़ी आँत– रेक्टम से कोष्ठ गत दोषों को निकालता है, जबकि वस्ति प्रत्येक मार्ग से गए हुए दोषों को बाहर निकालने में सक्षम है। शिरोविरेचन ऊर्ध्व मार्ग के दोषों का शमन करता है; परंतु वस्ति त्रिदोषों के साथ रक्त का पूरी तरह शोधन करती है। 

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'वस्ति' शब्द वस्तुतः प्राणियों के मूत्राशय (यूरीनरी ब्लैडर) से प्रचलित है। प्राणियों के मूत्राशय द्वारा निर्मित यंत्र से औषधि को अंदर प्रविष्ट कराना ही वस्तिकर्म है। 'अष्टांग हृदय' में लिखा है- वस्तिना दीयते इति वस्तिः (१९/१)। 

प्राचीन काल में गाय, बैल, बकरे व भैंस के मूत्राशय से गुदा 'प्रदेश में औषधि दी जाती रही होगी। संभवतः इसी कारण यह नाम पड़ा है। आज तो रबर एवं अन्य सिंथेटिक पदार्थों के बने यंत्र आ गए औषधि क्वाथ, तैल, दुग्ध, स्नेह क्षीर, रक्तादि द्रव्यों गुदा मार्ग से जब पक्वाशय में प्रविष्ट कराया जाता है, को तब उसे वस्तिकर्म कहते हैं। 

पूर्व से ही स्नेहित, स्वेदित रोगी के गुदामार्ग से प्रक्षेपित औषधि नाभि-क्षेत्र में जाकर मलों-दोषों का निराकरण करती हुई गुदा मार्ग से बाहर निकलती है, तब इस कर्म को वस्तिकर्म कहते हैं। वस्तिकर्म वैसे तो त्रिदोष निवारक चिकित्सा है, पर यह मूलत: वांत दोष की विशेष चिकित्सा है।

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कुछ लोग एनिमा को ही वस्ति कहने लगते हैं। यह एक भूल है। वस्ति के अनेक प्रकारों में एक प्रकार एनिमा भी है, पर एनिमा वस्ति का पर्याय नहीं है। सामान्यतया एनिमा का प्रयोग कठोर मल को निकालने के लिए किया जाता है। तत्काल लाभ तो इससे मिलता है, पर इसमें कोई पूर्वकर्म नहीं होता। वस्ति वस्तुतः वात दोष शमन हेतु किया जाने वाला एक प्रधान कर्म है। वायु की चिकित्सा से तीनों दोषों की चिकित्सा हो जाती है। पंचकर्मों में यह सर्वश्रेष्ठ, अतिशय महत्त्वपूर्ण एवं लाभकारी क्रिया है।

वस्ति देने की विधि के कई प्रकार हैं। अंग विशेष के नाम से, द्रव्यों के भेद से, कर्म के भेद से तथा संख्या के आधार पर वस्ति की विधियाँ हैं। अंग विशेष के नाम से अधिष्ठान भेद से वस्ति दी जाती है- इसी क्रम से इनका नामकरण किया गया है।

(१) पक्वाशयगत- गुदा मार्ग से औषध द्रव्य अंदर प्रेषित करना। पक्वाशय-बड़ी आँत एवं रेक्टम वाला क्षेत्र है।

(२) गर्भाशयगत- इसमें योनि मार्ग से गर्भाशय से औषधीय द्रव्यों को गर्भाशय के दोषों को दूर करने के लिए अंदर भेजा जाता है ।

(३) मूत्राशयगत- मूत्र मार्ग से मूत्राशय में वस्ति द्रव्य पहुँचाया जाना। इस वस्ति को गर्भाशय वस्ति के साथ उत्तर वस्ति कहा जाता है।

(४) व्रणगत- व्रण या किसी भी घाव-गाँठ के मुख से शोधन, रोपण हेतु औषधि पहुँचाया जाना ।

वस्ति योग क्रिया
द्रव्य भेद:- 

(i) क्वाथप्रधान वस्ति को निरूह वस्ति कहा जाता है। इसे ही आस्थापन वस्ति भी कहते हैं। आयु स्थापन करने के कारण, सभी दोषों का हरण करने के कारण इसे आस्थापन वस्ति कहते हैं ।

(ii) अनुवासन वस्ति में स्नेह द्रव्य देते हैं। इसे प्रतिदिन किया जा सकता है। अत: इसे अनुवासन कहते हैं । यह स्नेह वस्ति का एक विशिष्ट प्रकार है। मात्रा के आधार पर इसके अलग-अलग भेद हैं।

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कर्म भेद:-

निरूह वस्ति की क्रियापद्धति के आधार पर इसके १२ प्रकार बताए गए हैं। ये हैं- शोधन, लेखन, उत्क्लेदन, शमन, बृंहण, रसायन, बाजीकरण, कर्षण, स्नेहनीय, चक्षुष्य, संग्राही, वर्ण प्रसाद। इन सभी में अतिरिक्त चरबी को हटाकर शरीर को कृश करने का, चिपके दोषों को निकालकर शरीर को हलका बनाने का, कुपित दोषों के शमन, धातु बढ़ाने का, वीर्यबल, आयुवर्द्धन, शरीर के वर्ण (रंग) को उजला बनाने के गुण निहित हैं।

संख्या भेद:- 

आचार्य चरक के अनुसार वस्ति देने की संख्या के आधार पर तीन भेद हैं- कर्मवस्ति, कालवस्ति, योगवस्ति।

कर्मवस्ति में ३० वस्तियाँ दी जाती हैं। पहले एक अनुवासन, फिर एक निरूह, फिर एक अनुवासन- इस क्रम से १२ निरूह एवं १२ अनुवासन। फिर अंत में ५ अनुवासन। १८ अनुवासन एवं १२ निरूह वस्ति के क्रम से ३० वस्ति दी जाती हैं। 

कालवस्ति में १६ वस्ति (१०) अनुवासन एवं ६ निरूह) तथा योगवस्ति में ८ वस्ति (५) अनुवासन एवं ३ निरूह) दी जाती हैं।

वस्तिकर्म में प्रयुक्त द्रव्य-चरक-सुश्रुत, दोनों वस्तिकर्म के द्रव्यों की चर्चा करते हैं। इन द्रव्यों में अधिकतर आस्थापन वस्ति के हैं।

(i) फलनी द्रव्य- इक्ष्वाकु, मदनफल, कुटज, धामार्गव के फल ।

(ii) अष्ट मूत्र- बकरी, भेड़, गौ, भैंस, हस्ती, ऊँट, घोड़ा, गदहा। 

(iii) अष्ट क्षीर- स्त्रीदुग्ध, भेड़, बकरी, गाय, भैंस, हथिनी, ऊँटनी, घोड़ी।

(iv) पाँच लवण- काला नमक, सेंधा नमक, बिड़ नमक, समुद्र नमक, औद्धिद नमक। 

(v) आस्थापन उपयोगी द्रव्य- बिल्व, पिप्पली, कुष्ठ, वचा, कुटंज, सौंफ, यष्टीमधु, मदनफल।

(vi) अनुवासन उपयोगी द्रव्य- घृत, तैल, वसा, मज्जा।

आचार्य सुश्रुत ने आस्थापन के लिए उपयोगी द्रव्यों में अष्ट क्षीर, अम्ल वर्ग, त्रिफला, मधु, सौंफ, वचा, एला, त्रिकटु, रास्ना, हरिद्रा आदि का भी वर्णन किया है। वस्ति वस्तुतः दो ही प्रकार की है - अनुवासन एवं आस्थापन, पर इन दोनों क्रियाओं में योग्य-अयोग्य व्यक्तियों का ध्यान रखना होता है। 

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