EDITORNovember 3, 20201min73

खुदको धोखा कैसे देते हैं हम?  लाइफ इस तरह हो जाती है ट्रैप? 

खुदको धोखा कैसे देते हैं हम?  लाइफ इस तरह हो जाती है ट्रैप? 

How to Break Free When You’re Feeling Trapped in Life

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Why We Stuck in Life and the Secret to Dealing with It

हमारी चालाकियां हमे ही चक्रव्यूह की तरह फंसा देती है| हम कब खुदको धोखा देने लग जाते हैं पता ही नहीं चलता| हमारा मन हमे ही ट्रैप कर लेता है| 

हम अच्छे गुणों का विकास करना चाहते हैं लेकिन कल, हम निस्वार्थ बनना चाहते है लेकिन कल, हम मुक्ति चाहते हैं लेकिन कल, हम आदतें छोड़ना चाहते हैं लेकिन कल … आज सब चलने दो कल से सब सही करेंगे! 

Imprisoned by Your Life

हमारे डर और भय हमारे ही कर्मों की उपज हैं .. झूठ, बेईमानी, छल, कपट नहीं तो डर कैसा? 

हम  आज बुरा करते हैं और भविष्य में अच्छे की आशा करते हैं| 

बदलाव करना है तो आज और अभी क्यों नहीं? कल का क्या भरोसा? 

अच्चा बनना है तो आज ही बन जाओ जितने अच्छे बन सकते हो| परमार्थ करना है तो आज ही शुरू कर दो| सेवा, दया, प्रेम, दान आज ही क्यों नहीं?

सेहत बनानी है तो कल से आसन व्यायाम, कल से घुमने जायेंगे, कल से पक्का| 

किससे कह रहे हैं? कल से पक्का और किसके लिए? 

कल कभी आया है? 

हमारे भगवान भय के भगवान हैं| सिर्फ डर दूर करने के लिए उनकी ज़रूरत है| वरना तो ईश्वर दूर ही रहे, पास रहेगा तो हमारे कारनामे देखेगा| वो दूसरी दुनिया में ही रहे तो ठीक यहाँ न आये| 

यही सोच है| भगवान् सिर्फ एक टूल है| गंगा मैया पाप धोने के लिए है| ये सब चालाकियां खुदको ही फंसाती हैं| गंगा मैया हों या भगवान, उन्हें फर्क नहीं पड़ने वाला, वे टोकेंगे भी नहीं| जैसे हम अपने घर की चीटियों को नहीं टोकते! 

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हम कहते हैं इस भवसागर से पार हो जाएँ| भव सागर को कोसते हैं, भवसागर बाहर  दुनिया नहीं| हमारी अपनी आदतों, विचारों, इच्छाओं का संसार है| 

इस धरती के एक छोर से दूसरी छोर पहुंचने में २4 दिन से ज्यादा नहीं लगेंगे, लेकिन मन की यात्रा की तो कोई सीमा ही नहीं| न कोई ओर है ना कोई छोर|

हमारे दुख इसलिए खत्म नहीं होते, क्योंकि हम उसके पार जाना चाहते हैं| दुःख से लड़ते रहते हैं ताकि वो खत्म हो जाये लेकिन वो कैसे ख़त्म होगा? दुख तो अजर अमर है| किसी न किसी बहाने से बैठ जायेगा गाड़ी में| 

हमारा दुख हमें जितना दुख नहीं देता उससे ज्यादा दुख इस दुख से निपटने का संघर्ष देता है| 

हमारा हरदम सोचते रहना ही हमार सबसे बड़ा कष्ट है|

हमने धर्म और अध्यात्म का चोला भी इसलिए ओढ़ रखा है क्योंकि हमें दुख से मुक्ति चाहिए और परम शांति चाहिए| 

धर्म और अध्यात्म हमारे लिए टूल हैं जिनसे हम सुख की चाबी खोलना चाहते हैं| 

ये दोनों हमारे किसी ख़ास मकसद की पूर्ति ना करें तो हम तुरंत इनसे दूर हो जाएंगे|

जीवन के अर्थ की तलाश भी दुःख ही देती है, अभी सब बेअर्थ लगता है अर्थपूर्ण कुछ और है?  

हमारा ध्यान और प्रार्थना भी हमारे खास उद्देश्य का हिस्सा है| इसलिए दोनों हमें उलटे फल ही देते हैं| क्यूंकि इनसे हमारा अहंकार जुड़ जाता है| हमे चाहिए ही और जब नहीं मिलता तो इन पर दोष थोप देते हैं| 

हम प्रयास से ध्यान पाना चाहते हैं| ये प्रयास अशांति का कारण बनता है| 

हमारे से निर्मित अनेक तरह के बोझ के बावजूद जिंदगी चलती जाती है| हम न जाने कितने बंधन, कितने प्रपंच रचते हैं फिर भी लाइफ रूकती नहीं| क्यूंकि चलाने वाला वो है, यदि हम होते तो हमने अपने जीवन की गाड़ी कबकी कहीं ठोक दी होती, न जाने कहाँ हम पंचर हो जाते, हमारा हर कदम जीवन के लिए अवरोध है लेकिन उसकी इच्छा है इसलिए अवरोध हट जाते हैं| 

हम विरोधाभासी हैं| हमे शांति चाहिए लेकिन हम मन की सत्ता भी बरकरार रखना चाहते हैं| हमे समाधी चाहिए लेकिन अपनी शर्तो पर| हमे आत्म ज्ञान चाहिए लेकिन अपनी जानकारियों जैसा? हमे साधना चाहिए लेकिन मन के मुताबिक, जीने के नियम चाहिए लेकिन उन्हें तोड़ने मरोड़ने की सुविधा भी चाहिए|

पुराना कुछ भी नहीं छोड़ना है और नया बन जाना चाहते हैं| 

यदि बदलना है तो खुदको खुदकी के जाल से मुक्त करना होगा| अपने अंदर के बंधन और विचारों के भवसागर के पार जाने से ही मिलेगी मुक्ति| और पुराने सेल्स, विचार और संस्कार से मुक्त होने पर ही सहज हो सकेगा जीवन, तभी लगेगी समाधी| 

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