भीलों का अद्भुत लोक…….देवी-देवता, तीज-त्योहारों की आदि परम्परा

-सरयूपुत्र:-

भील भारत की बड़ी जनजातियों में शामिल है.

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यह जनजाति मध्य प्रदेश राजस्थान गुजरात महाराष्ट्र में निवास करती है. मध्यप्रदेश में भीलों की बड़ी आबादी है. महाप्रलय के बाद जीवन मैं भील जनजाति समुदाय मेंउत्पत्ति की कथा एवं विश्वास का इतिहास है. भील जनजाति अपने गोत्र को जात कहते हैं. यह जात ही जाति का पर्याय है. भील, भिलाला, बारेला, पटेलिया अनेक गोत्र इस जनजाति में होते हैं.

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भारत के विभिन्न जाति-समुदायों की तरह भील लोग अपने गोत्र में विवाह नहीं करते. गोत्र को जाति या जात भी कहते हैं. इस समुदाय में अपने मामा के गोत्र में भी विवाह वर्जित होता है. जैसे किसी व्यक्ति का गोत्र रावत है और उसके मामा का गोत्र  मुझाल्दा है, तो उसके लड़के का विवाह रावत और मुझाल्दा की लड़की से नहीं होता. भीलो में मान्यताओं के अनुसार अंतरजातीय विवाह निषेध है. भीलो में मोटली और नानकि2 जातियां होती है. इन जातियों में भी आपस में विवाह नहीं होता, लेकिन यह समुदाय लड़के और लड़की की इच्छा का सम्मान करते हुए विवाह को स्वीकार करने की परंपरा भी बनाए हुए हैं. इस समुदाय में प्रेत विषयक मान्यताएं भी हैं. समुदाय में पाप और दंड तथा मुक्ति के रास्ते की भी बताएं हैं. इससे समाज के बीच अनुशासन को बनाए रखा जाता है.

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भील समुदाय में देवी- देवता की पूजा की जाती है. इस समुदाय में अनेक देवी-देवता माने जाते हैं. भीलट बाबा भीलो के प्रमुख देवताओं में शामिल हैं. मान्यता है कि भीलट देव मनुष्य और पशुओं की सर्प से रक्षा करते हैं. आषाढ़ मास की अमावस्या के दिन प्रत्येक ग्राम में बाबदेव की पूजा की जाती है. दशहरे के पूर्व नवरात्रि में भील जनजाति के लोग माता के जवारे बो कर बाड़ी में प्रतिदिन माता के भजन गाकर बड़वा खेलते हैं. इस खेल की परंपरा समाज में बहुत सारी समस्याओं के समाधान का माध्यम बनती है. सिंगाजी देव की भी पूजा इस समुदाय द्वारा की जाती है. देव बगीला-बाबा डूंगर की स्थापना झाबुआ जिले के ग्राम मनाकुआं की एक बहुत ऊंची पहाड़ी पर  की गई है. झाबुआ और अलीराजपुर जिले के भील-भिलाला अपनी कामना सिद्धि के लिए मन्नत लेते हैं. गल बाबा या हल्दिया देव की स्थापना झाबुआ शहर में तीन स्थान पर तथा ग्राम ढेकल एवं धार जिले के केशवी ग्राम में है. अपने किसी कार्य या बीमारी से छुटकारे के लिए भील लोग इस देव की मान लेते हैं, यानी मन्नत करते है.
प्रत्येक भील ग्राम में बाबदेव, भीलट देव, भैरमदेव , कुहाजा कुँवर,नाहाजो देव और खेदादेव की स्थापना है. बाबदेव भील- भिलाला के मुख्य देवता माने जाते हैं. भील खरीफ की फसल पकने पर सावन माता को सबसे पहले भोग लगाते हैं. उसके बाद ही नए अनाज को खाना प्रारंभ करते हैं. भीलों की मान्यता है कि बच्चा जब पैदा होता है तो स्वर्ग से बेमाता बच्चे का भाग्य लिखने आती हैं.

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शकुन और अपशकुन संबंधी विश्वास भी भील समाज में प्रचलित हैं. मकान बनाने के लिए लोग चीड़ा शकुन देखते हैं. विवाह के लिए भी चीड़ा लिया जाता है. खेत में अनाज आदि बुवाई के लिए भील- भिलाला लोग दाढ़ी हजामत बनाते हैं, कपड़े धोते हैं और स्नान कर धुले कपड़े पहनते हैं. बीज बोने के पहले तिलक लगाने की भी परंपरा है. भील- भिलाला लोग शुभ कार्य के लिए तारों और चंद्रमा की स्थिति आसमान में देखकर मुहूर्त निकालते हैं और उसी के अनुसार शुभ कार्य करते हैं. इस परंपरा को खटक्या  कहा जाता है.

भील तंत्र-मंत्र और जड़ी-बूटी का भी परंपरागत रूप से उपयोग करते हैं. बीमारियों के इलाज में भी जड़ी-बूटियों का उपयोग किया जाता है. सर्दी-जुकाम, बुखार, दस्त आदि सामान्य बीमारियां वे जड़ी बूटी से ही ठीक कर लेते हैं. पशुओं की चिकित्सा के लिए भी उनके अपने मंत्र हैं. बीमार की चिकित्सा की भी उनकी अपनी मान्यता है
पर्व, अनुष्ठान, व्रत और त्योहार की समाज में गौरवशाली परंपरा है. अक्षय तृतीया पर घर के बाहर पलाश लो का पर्व मनाया जाता है. इसमें एक झोपडी बनाई जाती है. झोपड़ी पर छाया के लिए पलाश के पत्ते डालियों सहित तोड़कर डाल देते हैं. बांस की टोंगी में मिट्टी भरकर उसमें गेहूं के जवारे बोते हैं. पांच कुमारी लड़कियां उपवास करती हैं. वही लड़कियां जवारे को पानी से सींचते हैं. दोनों समय धूप- दीप से पूजन करती हैं. पलाश के पत्तों से दूल्हा-दुल्हन बनाए जाते हैं. उन्हें हल्दी मसकर स्नान कराया जाता है. पांचदिन बाद जवारों को जुलूस के साथ नाचते- गाते हुए कुआ- बावड़ी में विसर्जित करते हैं. विसर्जन के दिन खीर और रोटी बनाकर गांव वालों को खिलाते हैं. उसी दिन लड़कियों का उपवास पूरा हो जाता है. इस पर्व पर गीत-संगीत का आयोजन भी उनकी परंपरा का हिस्सा है. देवी- देवताओं को पूजने के लिए इस समाज में नवाई की परंपरा है. भील दशहरे के पूर्व पड़वा से नवमी तक दुर्गा भवानी माता की पूजा करते हैं. पहले पाटली सुतार से बनवाते हैं. इस त्यौहार को नवडी पूजा कहा जाता है. हर पर्व और त्यौहार के लिए उनके अपने गीत हैं.

 

भील -भिलाला लोग कार्तिक माह में शरद पूर्णिमा के बाद चतुर्दशी से शुक्ल पक्ष की पड़वा तक तीन-दिवसीय दीपावली का त्यौहार गाय बैल के त्यौहार के रूप में मनाते हैं. चतुर्दशी के एक दिन पूर्व घर को गोबर और मिट्टी का घोल बनाकर लीपते हैं. दीपावली का त्यौहार बड़े भव्य और रंगारंग ढंग से यह समाज मनाता है. गाय के बच्चा देने के लिए दोहा की परंपरा है. भील लोग दीपावली का त्यौहार दो बार मनाते हैं. पहला कार्तिक मास को धनतेरस से अमावस्या तक और दूसरा कार्तिक मास में शुक्ल पक्ष में 13 से पूर्णिमा तक. इसे पिछली दिवाली कहा जाता है.

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होली इस समुदाय का महत्वपूर्ण त्यौहार है. माघ माह के अंत में पूर्णिमा के बाद से फाल्गुन मास प्रारंभ होता है. इसी पूर्णिमा के दिन होली का डंडा गाड़ते है. होली बड़े धूमधाम से मनाई जाती है. होलिका दहन के दिन के बाद से 5 दिन तक होली खेली जाती है. पानी, रंग, गुलाल एक-दूसरे पर डालते हैं. लोग मिलकर 5 दिन तक गीत गाकर फगुआ मांगते हैं. होली जलने के पहले जिन लोगों की मृत्यु हो गई है उनके घर शोक प्रकट करने की भी परंपरा है. भील- भिलाला अखाती अक्षय तृतीया का त्यौहार अपनी परंपरा के अनुसार मनाते हैं यह समाज देवी-देवताओं पर आस्था रखता है .
भीलो में माना जाता है की गणगौर माता जिन्हें रनु बाई भंवर भाई नाम से पुकारा जाता है, वास्तव में पार्वती के ही नाम हैं.चैत्र माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी के दिन यह लोग भी शीतला माता का पूजन करते हैं. भील समुदाय मैं सभी त्यौहार व्रत अनुष्ठान के लिए देव गीत हैं. इन गीतों में भगवान शंकर पार्वती, शीतला माता, इंद्र भगवान जैसे सभी हिंदू देवी- देवताओं की आराधना की जाती है. यह समाज अपने देव लोक और अपनी संस्कृति के प्रति गहरी आस्था रखता है. मध्यप्रदेश में इस समाज का प्रत्येक क्षेत्र में अहम योगदान है. भील समाज के देवलोक की  प्रकृति पूजा पद्धति व्यापक रूप से रूप से  देश के बड़े भूभाग में  अपनाई गई है.

“SARYUPUTRA”

 

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