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उपचुनाव परिणाम ख़ुशी या गम,सबक अहम - सरयूसुत मिश्रा

सार

खंडवा लोकसभा की अपनी परंपरागत सीट जीतने में जहां भाजपा सफल रही है, वहीं अनुसूचित जाति की रैगांव की अपनी परंपरागत सीट को पार्टी ने गँवाया है, सीट लगभग तीन दशक बाद भाजपा से छीनने में कांग्रेस सफल हुई,  चुनाव परिणाम को  2023 के आम चुनाव के लिए बिल्कुल भी कोई संकेत नहीं माना जाना राजनीतिक समझदारी होगी..

janmat

विस्तार

मध्य प्रदेश में हुए उपचुनाव के परिणाम तकनीकी रूप से भाजपा के पक्ष में हैं। खंडवा लोकसभा की अपनी परंपरागत सीट जीतने में जहां भाजपा सफल रही है, वहीं अनुसूचित जाति की रैगांव की अपनी परंपरागत सीट को पार्टी ने गँवाया है। यह सीट लगभग तीन दशक बाद भाजपा से छीनने में कांग्रेस सफल हुई है। कांग्रेसी कब्जे वाली जोबट आदिवासी विधानसभा सीट और सामान्य सीट पृथ्वीपुर जीतने में भाजपा की रणनीति सफल रही है। चुनाव परिणाम को  2023 के आम चुनाव के लिए बिल्कुल भी कोई संकेत नहीं माना जाना राजनीतिक समझदारी होगी।

जोबट की जीत भाजपा से ज्यादा “कांग्रेसी” भाजपाई प्रत्याशी की जीत मानी जाएगी। जोबट से विजयी सुलोचना रावत चुनाव की घोषणा के पहले कांग्रेसी थीं। सुलोचना का परिवार जोबट का प्रतिष्ठित परिवार माना जाता है। सुलोचना रावत कांग्रेस से पूर्व में भी कई बार विधायक और मंत्री रह चुकी हैं। उनके परिवार के और भी लोग इस सीट से विधायक रहे हैं। वर्ष 2018 में जब कांग्रेस ने  कलावती भूरिया को जोबट से टिकट दिया, तब रावत परिवार की ओर से सुलोचना रावत के बेटे विशाल रावत निर्दलीय चुनाव लड़े थे और करीब 30,000 मत हासिल करने में सफल रहे थे। इसका मतलब है कि रावत परिवार जोबट विधानसभा में अपनी राजनीतिक हैसियत रखता है। भाजपा ने सुलोचना रावत को पार्टी में शामिल कर विधानसभा का टिकट दिया  यह भाजपा की रणनीतिक  सफलता मानी जाएगी, विजय के लिए पूरा क्रेडिट भाजपा को नहीं जाएगा, भाजपा के साथ कांग्रेसी सुलोचना रावत और उनकी जाति एवं परिवार के समर्थक मतदाताओं को श्रेय जाना चाहिए।

 

इसी तरह की स्थिति पृथ्वीपुर विधानसभा सीट की भी है। इस सीट से सपाई से भाजपाई बने शिशुपाल यादव को जीत मिली है। यादव 2018 के आम चुनाव में इस सीट से चुनाव लड़े थे और दूसरे नंबर पर रहे थे। वे लगभग 4000 मतों से पूर्व मंत्री बृजेंद्र सिंह राठौर से चुनाव हारे थे। उस समय भाजपा तीसरे स्थान पर आई थी।  2018 के चुनाव में शिशुपाल यादव को जो मत मिले थे, वे जातिगत समीकरण से हासिल हुए थे, क्योंकि सपा का राज्य में कोई खास वजूद नहीं था। इस सीट पर जीत भाजपा के रणनीतिक कौशल की है, क्योंकि सीट जीतने  की क्षमता का आकलन करते हुए सपाई यादव को भाजपाई बनाया गया। इस जीत में भाजपा की रणनीति एवं प्रबंधन कारगर रहा, लेकिन यादव की खुदकी हैसियत भी चुनावी जीत में महत्वपूर्ण रही।

 

रैगांव सीट पर भाजपा प्रत्याशी की हार पार्टी के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। यह सीट लगभग 3 दशकों से भाजपा के कब्जे में रही, पूर्व विधायक जुगल किशोर बागरी, जो मंत्री भी रह चुके हैं, उनके निधन के कारण ही यह चुनाव हुए हैं।इस सीट पर मुख्यमंत्री ने प्रचार में पूरी ताकत झोंक दी  थी, फिर भी यह सीट भाजपा जीत नहीं सकी।  कांग्रेस के खिलाफ राज्य में नकारात्मक माहौल होने के बावजूद रैगांव सीट जीतना कांग्रेस के लिए मायने रखता है। कांग्रेस की जीत का एक बड़ा कारण यह रहा कि बहुजन समाज पार्टी ने इस क्षेत्र से उपचुनाव में प्रत्याशी नहीं उतारा। भाजपा की एक परंपरागत सीट कांग्रेस ने इतने लंबे समय बाद छीनी और अपनी 2 सीटें गंवाई, लेकिन कांग्रेस की दोनों सीटें भाजपा के साथ भाजपाई बने कांग्रेसी और  सपाई की व्यक्तिगत जीत ज्यादा मानी जाएगी।

 

 

खंडवा लोकसभा चुनाव भाजपा के पक्ष में गए हैं। इस सीट पर पिछले चुनाव की तुलना में 13% कम मतदान हुआ था। जीत के मतों का अंतर भी काफी घटा है। खंडवा में कांग्रेस प्रत्याशी राजनारायण पुरनी को जब टिकट दिया गया था, तब ऐसा माना जा रहा था कि कांग्रेस ने राजनीतिक भूल कर दी है। इस क्षेत्र से सबसे प्रबल प्रत्याशी अरुण यादव थे लेकिन उन्होंने ना जाने किन कारणों से चुनाव मैदान में उतरने से मना कर दिया था। फिर भी कांग्रेस ने कड़ी टक्कर दी और मतों का अंतर इतना अधिक घट गया। पिछले चुनाव में बीजेपी ने ये सीट 2 लाख 60 हज़ार से अधिक मतों से जीती थी। उपचुनाव बमुश्किल 81000 से जीत सकी लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत 2 विधानसभा सीटें(मान्धाता और पंधाना) जो बीजेपी के कब्जे में हैं, वहां कांग्रेस ने लीड ली है।  

 

भाजपा और मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की यह खासियत रही है कि चुनाव किसी भी स्तर का हो वह बड़ी गंभीरता से चुनाव लड़ते हैं। भाजपा का मध्यप्रदेश में काफी मजबूत है और बूथ स्तर तक उसकी जमावट है। प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के नेतृत्व में सरकार और संगठन का तालमेल भी उपचुनाव के प्रबंधन में सफल रहा।  कांग्रेस में तो संगठन नाम की कोई चीज ही नहीं है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान आम जनता से इस तरह से कनेक्ट हैं कि जैसे कोई परिवार के सदस्य हों। आम लोगों से उनका संवाद आत्मीयता भरा होता है। शिवराज सिंह की यह ताकत भाजपा को चुनाव जिताने में हमेशा मदद करती रही है। इस बार भी उपचुनाव परिणाम में विजय शिवराज सिंह चौहान के खाते में दर्ज होगी।

 


सामान्यत: उपचुनाव में सरकारों को ही वरीयता होती है। देश में जिन जिन राज्यों में भी विधानसभा के उपचुनाव हुए हैं,जिनके परिणाम आज आये हैं,उनमें भी ऐसा ही परिलक्षित हो रहा है कि अधिकांश राज्यों में सत्ताधारी दल ने ही  विधानसभा सीटें जीती हैं। केवल हिमाचल प्रदेश में उलटफेर हुआ है और भाजपा सारी सीटें हार गई है। दमोह उपचुनाव में हार के बाद राज्य में  राजनीतिक माहौल भाजपा के खिलाफ बनाया गया था, ऐसा माना जाने लगा था कि इन उपचुनावों में परिणाम भाजपा के खिलाफ गए तो भाजपा और नेतृत्व के लिए नुकसानदेह होंगे। लेकिन यह चुनाव परिणाम ऐसे आए हैं कि अब सारी अटकलें ख़तम हो जाएँगी और राजनितिक माहौल बीजेपी को मजबूती प्रदान करेगा।  कांग्रेस का जहां तक सवाल है, यह पहले से ही माना जा रहा था कि कांग्रेसी नेता गुटों में बटे हुए हैं। कांग्रेस के राज्य नेतृत्व के अधिकांश लीडर 75 की उम्र के आसपास हैं। युवाओं के साथ उनका कोई कनेक्ट नहीं है। इसके बावजूद रैगाँव सीट जीतना राज्य की राजनीति के लिए अलार्मिंग है। राज्य की सरकार के प्रति सकारात्मकता से ज्यादा कांग्रेस के प्रति नकारात्मकता इस उपचुनाव के छिपे संदेश के रूप में दिखाई पड़ रहा है।  इसे समझने की जरूरत है, वैसे सरकारें उपचुनाव जीतने के लिए साम-दाम-दंड-भेद सभी तरह के हथकंडे अपनाती हैं यह चुनाव भी कोई अलग नहीं है।ख़ास बात ये रही कि उपचुनाव में जनता ने महगाई जैसे गम्भीर मुद्दों को भी दरकिनार कर दिया।