• India
  • Thu , Jun , 20 , 2024
  • Last Update 10:48:AM
  • 29℃ Bhopal, India

बंगलादेश में हिंसा के शिकार हिंदू अल्पसंख्यकों को मिला संघ का साथ

सार

संघ के कार्यकारी मंडल की हाल में ही धारवाड में संपन्न वार्षिक बैठक में बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया

janmat

विस्तार

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से आप अनेक मुद्दों पर असहमत हो सकते हैं परंतु उसकी इस बात के लिए भूरि भूरि प्रशंसा की जानी चाहिए कि भारत के पड़ोसी देश बंगला देश में कट्टरपंथियों द्वारा वहां के अल्पसंख्यक हिंदू समुदाय को अपनी हिंसात्मक गतिविधियों का निशाना बनाए जाने की सिलसिलेवार  घटनाओं की कठोरतम शब्दों में निन्दा करने में वह सबसे आगे रहा है। संघ के कार्यकारी मंडल की हाल में ही धारवाड में संपन्न वार्षिक बैठक में बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों पर गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए एक प्रस्ताव पारित किया गया जिसमें बंगला देश और केंद्र सरकार से ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए सक्रिय पहल करने की अपील की गई है। इसमें कोई संदेह नहीं कि बंगला देश में इन घटनाओं पर संघ की चिंता बिल्कुल जायज है क्योंकि वहां  कट्टर पंथियों द्वारा हिन्दू अल्पसंख्यकों और उनके पूजा स्थलों को निशाना बनाए जाने का सिलसिला नया नहीं है।यही कारण है कि विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में मौजूद अल्पसंख्यक हिंदुओं की 28 प्रतिशत आबादी बाद के वर्षों में  चिंता जनक रूप से घटती  चली गई। और आज स्थिति यह है कि बंगला देश की कुल आबादी में अल्पसंख्यक हिंदू मात्र 8 प्रतिशत हिंदू हैं। इसमें दो दो राय नहीं हो सकती कि अल्पसंख्यक हिंदुओं की आबादी में  आई यह चिंता जनक कमी उन  कट्टर पंथी संगठनों की  हिंसात्मक गतिविधियों का नतीजा है जिनका असली एजेंडा बंगला देश में हिंदू आबादी का पूरी तरह निर्मूलन करना है । संघ का यह मानना है कि बंगला देश में पिछले दिनों नवरात्रि के दौरान जो हिंसक घटनाएं हुईं  वे वहां के इस्लामिक जिहादी  संगठनों की किसी  गहरी साजिश का हिस्सा थीं। इस  मामले में संघ का दृष्टिकोण पूरी तरह सही प्रतीत होता है जिससे हर भारतीय को सहमत होना चाहिए। संघ के कार्य कारी मंडल की धारवाड़ में संपन्न तीन दिवसीय बैठक में इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाया गया और इस मामले में एक संयुक्त राष्ट्र और उससे जुड़े संगठनों और मानवाधिकार की  पैरोकार संस्थाओं के मौन पर आश्चर्य व्यक्त किया गया। कार्यकारी मंडल की बैठक में पारित प्रस्ताव में कहा गया है कि बंगला देश अथवा विश्व के किसी अन्य भाग में कट्टर पंथी इस्लामिक ताकतों का उभार शांति प्रिय देशों की लोकतांत्रिक व्यवस्था और मानवाधिकार के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकारी  मंडल ने अंतरराष्ट्रीय जगत से अपील की है कि बंगला देश में पनप रहे कट्टरपंथी संगठनों की हिंसात्मक गतिविधियों की निंदा करने के लिए आगे आएं। संघ ने भारत सेवाश्रम संघ, इस्कान, विश्व हिन्दू परिषद और रामकृष्ण मिशन आदि संस्थाओं की इस बात बात के लिए सराहना की है कि बंगला देश के हिंसा पीड़ित अल्पसंख्यक हिंदू परिवारों की  मदद के लिए इन संस्थाओं ने तत्परता दिखाई। गौरतलब है कि बंगला देश में कट्टरपंथियों के हिंसात्मक उपद्रवों में  इस्कान मंदिरों और रामकृष्ण मिशन के आश्रमों को भी  बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाया गया था । इन घटनाओं में दो इस्कॉन संतों और चौमोहनी मंदिर के तीनों  पुजारियों की मौत हो गई थी। नवरात्रि के मौके पर बंगला देश में 10 हिंदू अल्पसंख्यकों के मारे जाने की खबर है। उल्लेखनीय है कि विश्व हिन्दू परिषद भी  बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों को चुन चुन कर निशाना  बनाए जाने की घटनाओं की रोकथाम हेतु संयुक्त राष्ट्र से वहां अपनी शांति सेना भेजने की मांग कर चुकी है।


          बंगला देश में यूं तो हिन्दू अल्पसंख्यकों  और अन्य अल्प संख्यक समुदायों के विरुद्ध कट्टरपंथियों की हिंदी का सिलसिला काफी समय से चला आ रहा है परंतु इस बार नवरात्रि के अवसर पर दुर्गा पूजा मंडपों को जिस तरह बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई गई उसके पीछे कट्टरपंथियों की किसी सुनियोजित साजिश की आशंका व्यक्त की जा रही है। अचानक हुई हिंसात्मक घटनाओं ने  बंगला देश सरकार भी परेशान और हैरान कर दिया है यद्यपि प्रधानमंत्री शेख हसीना ने इन हिंसा पर काबू पाने में तत्परता दिखाई इसीलिए भारत सरकार ने इस पूरे मामले पर नपे तुले शब्दों में प्रतिक्रिया दी है ।भारत  सरकार का मानना है कि इस पूरे  मामले से शेख हसीना ही निपट सकती हैं इसलिए प्रतिक्रिया का उद्देश्य बंगला देश सरकार की निंदा करना नहीं है । राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी धारवाड़ में संपन्न अपने कार्य कारी मंडल की बैठक में इन घटनाओं की कड़ी निन्दा करते हुए केंद्र सरकार से यह अपील की है कि वह सभी राजनयिक माध्यमों का उपयोग करते हुए बंगला देश में अल्पसंख्यक हिंदु और  बौद्ध समुदायों के ऊपर जारी हमलों की  घटनाओं  की रोकथाम हेतु अंतरराष्ट्रीय जगत के हिंदू संथाओं की चिंताओं से बंगला देश सरकार को अवगत कराएं ताकि वहां पीड़ित अल्पसंख्यक परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके। इस पूरे मामले में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के मौन पर भी सवाल उठ रहे हैं। संघ ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया है कि ममता बनर्जी ने बंगला देश की हिंसात्मक घटनाओं के लिए जिम्मेदार कट्टरपंथियों की निंदा करने के बजाय पूरे मामले पर मौन साध रखा है।उधर निर्वासित बंगला लेखिका ‌तसलीमा  नसरीन ने बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों के प्रति अपना समर्थन व्यक्त करते हुए यह सवाल भी पूछा है कि भारत में अल्पसंख्यकों के हितों की चिंता करने वाले लोग बंगला देश में हिन्दू अल्पसंख्यकों पर हमले की घटनाओं पर चुप क्यों हैं। तसलीमा नसरीन कहती हैं कि उनका उपन्यास लज्जा भी प्रासंगिक है।

         बंगला देश में नवरात्रि के दौरान हुई  पूजा स्थलों में हुई तोड़फोड़ को भले ही एक फेक न्यूज से जोड़ कर देखा जा रहा है परंतु बंगला देश में अल्पसंख्यक पहृली बार कट्टरपंथियों की हिंसा का शिकार नहीं बने हैं । पिछले आठ सालों में अल्पसंख्यकों पर 3600 से अधिक हमले हो चुके हैं और डेढ़ हजार से अधिक पूजा स्थलों को क्षतिग्रस्त किया गया। बंगला देश के गृहमंत्री जोर देकर कहते हैं कि हमारे यहां सभी त्यौहार मिलजुल कर मनाते जाते हैं । इस बार जो हिंसात्मक घटनाएं हुईं वे किसी साजिश का हिस्सा थीं जिसका असली मकसद आम चुनाव के पहले देश में  तनाव पैदा करना है।  सरकार इन घटनाओं के लिए किसी भी व्यक्ति अथवा संगठन को नहीं बख्शेगी।  बताया जाता है कि बंगला देश के कट्टरपंथी संगठन प्रधानमंत्री शेख हसीना को भारत के निकट बताकर वहां सांप्रदायिक विद्वेष और नफ़रत का माहौल पैदा करना चाहते हैं। गौरतलब है कि प्रधानमंत्री शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी का अल्पसंख्यक आबादी पर अच्छा प्रभाव है  और अब तक संपन्न चुनावों में अल्पसंख्यकों के अधिकांश मत भी अवामी लीग को मिलते रहे हैं। विपक्षी बंगला देश नेशनलिस्ट पार्टी को जमात ए इस्लामी जैसे कट्टरपंथी संगठनों का समर्थन प्राप्त है। 2014के चुनावों में भारी धांधली के बाद  जब बंगला देश नेशनलिस्ट पार्टी की जीत हुई थी तब भी देश में बड़े पैमाने पर हिंसा भड़की थी। इसीलिए इस बार हुई हिंसात्मक उपद्रवों को आगामी आम चुनावों से जोड़ कर देखा जा रहा है।