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देश में अचानक हिन्दू धर्म के ग्रंथों के प्रति “जिज्ञासा” बढ़ी

सार

हिंदुत्व और हिन्दू धर्म एक ही नहीं, लेकिन अलग भी नहीं, दूसरे धर्मों के ग्रंथ भी पढ़कर उन पर भी कुछ कहा जाये

janmat

विस्तार

भारत में पिछले कुछ समय से हिन्दू धर्म के ग्रंथों के प्रति अचानक “जिज्ञासा” बढ़ गयी है. जिसे देखो वह हिन्दू धर्म को लेकर हर जगह ज्ञान पेलता फिर रहा है. हर कोई अपने को हिन्दू और पंडित बताना चाह रहा है. राहुल गांधी ने कहा, कि उन्होंने उपनिषद पढ़े हैं, जिनका ज्ञान “हिंदुत्व” की अवधारणा से अलग है. वह सही कह रहे हैं. लेकिन “हिंदुत्व” कैसे विकसित हुआ, उसके लिए उन्हें इतिहास और दूसरे धर्मों के ग्रंथ भी पढ़ना चाहिए. उनके ही कुछ साथी कह रहे हैं, कि हिन्दू धर्म के मूल ग्रंथों में कहीं भी “हिन्दू” या “हिंदुत्व” शब्द नहीं मिलता. यह भी सही है, लेकिन यह बहुत गहरा विषय है, जिसे सही संदर्भ और परिप्रेक्ष्य में समझना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत.

धर्म के दो पक्ष होते हैं. एक पक्ष निखालिस आध्यात्मिक होता है और दूसरा व्यावहारिक.  आध्यात्मिक पक्ष की बात तो सब लोग कर रहे हैं, लेकिन व्यावहारिक पक्ष को समझने की कोशिश नहीं की जा रही. कांग्रेस नेता और लेखक शशि थरूर ने अपनी पुस्तक “Why I Am A Hindu में भारत के ग्रंथों के आध्यात्मिक पक्ष पर बहुत लिखा है. और भी लोगों ने इस सम्बंध में ख़ूब कलम चलाई है. उनके लेखन में वे बार-बार एक ही बात को बहुत ज़ोर देकर कहते हैं, कि भारत का दर्शन बहुत सहिष्णु है, इसमें पूरे संसार को एक परिवार माना गया है, भारत के ऋषियों ने कहा है, कि जिस तरह सभी नदियाँ जाकर सागर में मिल जाती हैं, उसी तरह धर्म के सभी मार्ग ईश्वर कि ओर ले जाते हैं, भारत बहुत उदार है,आदि आदि.

“हिंदुत्व” क्यों

वास्तव में यही हिन्दू धर्म है. लेकिन कालांतर में “हिंदुत्व” की अवधारणा क्यों विकसित हुयी, इसके पीछे के कारणों को पक्षपात रहित होकर समझने की ज़रुरत है. भारत की सहिष्णुता, उदारता, मानवीय सोच आदि उच्च बातों का मज़ाक बनाते हुए दूसरे धर्मों ने मध्यकाल में जिस तरह दमन किया और आधुनिक काल में इसके लिए जो षडयंत्र चल रहे थे, उन्हीं के जवाब में “हिंदुत्व” की अवधारणा का जन्म हुआ. बेशक इसमें राजनीती है, लेकिन राजनीति का जवाब भी तो राजनितिक ही होगा.

भारतीय लोगों ने कभी किसी धर्म से परहेज़ नहीं  किया. जब ईसाई यहाँ ईसाई आये, तो भारत के लोगों ने उनका दिल खोल कर स्वागत किया. यहाँ तक कि उन्हें अपने धर्म के प्रचार की अनुमति दी. मुस्लिमों के साथ भी ऐसा ही हुआ.  भारत की पहली मस्जिद केरल में ही बनी. भारत ने पारसियों को अपनाकर उन्हें अपने तरह से जीने की सुविधा दी.

गुजरात के सूरत में जब मुस्लिम सौदागर आये, तो वहाँ स्थानीय लोगों ने उनका पूरा आदर-सत्कार ही नहीं किया, बल्कि उन्हें अपने मजहब के अनुसार इबादत करने के लिए सुविधाएँ भी उपलब्ध करवायीं. अनेक जगहों पर हिन्दू राजाओं ने उन्हें मस्जिद बनाने के लिए मुफ्त ज़मीनें और अन्य सुविधाएं प्रदान कीं. सूफी संतों का भारत  में पूरा कितना सम्मान मिला.

समस्या की जड़

इसके बाद जो भी समस्याएँ खड़ी हुईं, उनकी जड़ हमलावर मुसलमानों की गतिविधियों थीं. वे लूटमार के मकसद से भारत आये, लेकिन यहाँ की आंतरिक कमजोरियों का फायदा उठाकर वे यहाँ के शासक बन बैठे. उन्होंने अरब में बैठे अपने आकाओं को यह जताने की कोशिश की, कि वे इस्लाम का प्रसार कर रहे हैं. इसके लिए उन्होंने यहाँ के मंदिरों और अन्य धार्मिक स्थलों को तोड़ना शुरू किया. अनेक तोड़े गए स्थलों पर मंदिरों के मलवे से ही मस्जिदों का निर्माण कर दिया. उनकी नीति थी कि, हमारी बात मानों नहीं तो मरो या कष्ट उठाओ. यहाँ इस्लामिक शासन लागू कर दिया गया और हिन्दू अपनी ही भूमि पर “जिम्मी” हो गये.

मुस्लिम शासकों में भारत में लोगों को इस्लाम में लाने के लिए कई तरीके अपनाए. लोगों को जबरदस्ती इस्लाम अपनाने के लिए मजबूर करने के साथ ही अनेक मुस्लिम बनने को प्रेरित किया गया. सल्तनत काल में और उसके बाद मुग़ल काल में मजहब के नाम पर जो ज्यादतियाँ की गयीं, वे इतिहास के पन्नों  में दर्ज हैं.

इन्हीं कारणों से हिन्दुओं को धीरे-धीरे मुस्लिमों से परहेज़ होने लगा. राजनीतिक सत्ता मुस्लिमों के हाथ में थीं और उनके पास बहुत मजबूत फ़ौजी ताक़त थी, लिहाजा उनसे परहेज़ करने के बाद भी हिन्दू बहुत प्रतिरोध नहीं कर सके. सल्तनत काल में राजपूतों ने यथाशक्ति उनका सामना किया, लेकिन दुर्भाग्य से वे सफल नहीं हो सके. इसके बाद मुग़ल काल में मराठों और सिखों ने अत्याचारी मुस्लिम शासकों से लोहा लिया. ओरंगजेब तक आते-आते स्थिति इतनी बिगड़ गयी कि, हिन्दू और मुस्लिमों के बीच गहरी खाई हो गयी.

हिन्दू अपने धर्म की रक्षा के लिए कुछ कट्टर होते चले गये. मध्यकाल में गुरुनानक देवजी ने समाज के दबे-कुचले और गरीब लोगों को सम्मानजनक जीवन जीने में सुविधा देने के लिए “सिख” धर्म की स्थापना की. यह बिलकुल शांतिपूर्ण धर्म था. इसमें सभी धर्मों की समानता और सभी धर्मों के सम्मान की बात कही गयी. फिर ऐसा क्या हुआ कि, पांचवें गुरु अर्जुनदेव को धर्म की रक्षा के लिए शहीद होना पड़ा. गुरु तेग बहादुर का बलिदान हुआ. शहीदी का सिलसिला इतना बढ़ता गया कि, गुरु गोविन्दसिंहजी को तलवार उठानी पड़ी. खालसा पंथ की स्थापना करनी पड़ी? उन्होंने धर्म की रक्षा के लिए अपने चार शहजादों की बलिदानी दी और ख़ुद भी शहीद हो गये. ऐसा इसलिए हुआ कि, धर्म के नाम पर हिन्दुओं  पर लगातार अत्याचार हो रहे थे. इन तथ्यों को कोई  नहीं झुठला सकता.

आधुनिक युग

आधुनिक युग में भी यही किया जा रहा था. आजादी के पहले से ही अनेक तरह की हन्दू-विरोधी सियासी गतिविधियाँ चलने लगी थीं. हिन्दू धर्म और हिन्दुओं के साथ कोई अन्याय नहीं हो, इसलिए वीर सावरकर ने “हिंदुत्व” की अवधारणा दी. इसे सिर्फ राजनैतिक अवधारणा नहीं माना जाना चाहिए. यह धर्म का व्यावहारिक पक्ष हैं, जिसमें अपने धर्म, संस्कृति और समाज की रक्षा का प्रयास किया गया. भारत का विभाजन हुआ और धर्म के नाम पर पाकिस्तान बन गया. इसके बाबजूद अनेक मुस्लिम भारत में ही रह गये. उन्हें अल्पसंख्यक का दर्जा देकर अपनी प्रगति के लिए अनेक सुविधाएं दी गयीं. आज उनके बच्चे पढ़-लिख रहे हैं, वे नौकरी-व्यवसाय कर रहे हैं. उनके साथ धर्म के नाम पर कोई भेदभाव नहीं होता. उन्हें अपना मजहब अपने हिसाब से मानने की पूरी आज़ादी है.

कट्टरवाद तो हिन्दुओं के डीएनए में ही नहीं है. अगर ऐसा होता, तो देश में हिन्दू महासभा और जनसंघ का राज होता. सरकार और बुद्धिजीवियों द्वारा हिन्दुओं के प्रति जो भेदभावपूर्ण रवैया अपनाया गया, उससे हिन्दू बुरी तरह आहत होते गये. उनकी सहिष्णुता कम हो रही है. आखिर यह एकतरफा तो नहीं हो सकती.

जो नेतागण हिन्दू धर्म ग्रंथों का अध्ययन करने का दावा कर रहे हैं, उन्हें दूसरे धर्मों का भी अध्ययन करना चाहिए. हर धर्म में आध्यात्मिक और व्यावहारिक पक्ष होते हैं. लेकिन दूसरे धर्मों के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता और न बोलेगा.

इस बात को लेकर हिन्दुओं में और अधिक चिढ़ है. अब तो वे कहने लगे हैं, कि क्या सारी सहिष्णुता और उदारता का ठेका हिन्दुओं ने ले रखा है? हम सहिष्णु हैं, तो हमें कोई भी मारे, पीटे, हमारे अधिकारों का हनन करे, हमारे पूर्वजों का अपमान करे, समाज में विभाजन करे, लेकिन हम सहिष्णु बनें रहें, यह संभव नहीं है.