• India
  • Sat , Apr , 20 , 2024
  • Last Update 08:57:AM
  • 29℃ Bhopal, India

नगालैंड की घटना पूर्वोत्तर में अलगाववाद को फिर हवा न दे दे

अजय बोकिल अजय बोकिल
Updated Thu , 20 Apr

सार

नगालैंड की दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गहरा अफसोस जताया और कहा कि आइंदा इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। लेकिन नगालैंड और मेघालय राज्यों में लागू सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार देने वाला  अफ्स्पा कानून हटाने की मांग‍ फिर तेज हो गई है।

janmat

विस्तार

नगालैंड में असम राइफल्स के जवानों के हाथों गलतफहमी में मारे गए कोयला खदान मजदूरों के बाद राज्य में उपजे रोष ने जहां राज्य में जहां शांति बहाली की कोशिशों को तगड़ा झटका दिया है, वहीं इस बात की आशंका बढ़ गई है कि सुदूर पूर्वोत्तर के इन राज्यों में आतंक और अलगाववाद नए सिरे से सिर उठा सकता है। हाल की कुछ घटनाएं इसके साफ संकेत दे रही हैं। इन्हें हमारे पड़ोसी देश चीन और म्यानमार की सैनिक सरकार का पूरा समर्थन है। चीन मीडिया ने तो नगालैंड में सुरक्षा बलों के हाथों मारे गए लोगों को ‘मानव हत्या’ कहा जबकि म्यानमार की सैनिक सरकार, भारत सरकार द्वारा उसके खिलाफ खुलकर न बोलने के बाद भी हमारे यहां आंतकी ग‍तिविधियों को समर्थन दे रही है। 

नगालैंड की दुर्भाग्यपूर्ण घटना पर केन्द्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने गहरा अफसोस जताया और कहा कि आइंदा इसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। लेकिन नगालैंड और मेघालय राज्यों में लागू सुरक्षा बलों को विशेष अधिकार देने वाला  अफ्स्पा कानून हटाने की मांग‍ फिर तेज हो गई है। सरकार इसे मानेगी, इसकी संभावना नहीं के बराबर है, लेकिन इस घटना की आड़ में नगा आतंकी अपनी गति‍विधियां तेज कर सकते हैं। सुरक्षा बलों पर हमले बढ़ सकते हैं और सेना तथा स्थानीय लोगो में टकराव बढ़ सकता है। अहम बात यह है कि सात बहनों वाले इस पूर्वोत्तर क्षेत्र में राज्यों के बीच आपसी विवाद भी हिंसक रूप लेते जा रहे हैं। पांच माह पहले क्षेत्राधिकार को लेकर असम और मिजोरम की पुलिस में दो दुश्मन देशों की तरह गोलीबारी हुई, जिसमें 7 लोग मारे गए थे तो मणिपुर में सेना की टुकड़ी पर घात लगाकर हमला किया गया, जिसमें कर्नल स्तर के एक अधिकारी और कई जवानों की मौत हुई। हालांकि इन राज्यों की जनजातियों के बीच भी आपसी खून खराबा होता रहता है, लेकिन सुरक्षा बलों द्वारा इस तरह गलतफहमी में की गई कार्रवाई  अथवा खुद सुरक्षा बलो पर हमले वाकई चिंता पैदा करते हैं। इनका असर दूरगामी होता है। 

ताजा घटनाक्रम में  नगालैंड के मोन जिले के ओटिंग गांव में 4 व 5 दिसंबर के दर्म्यान असम राइफल्स की गश्ती टुकड़ी ने आतंकी होने के शक में एक पिकअप में बैठकर जा रहे कोयला खदान मजदूरों पर फा‍यरिंग कर दी। जिसमें 14 लोग मारे गए। उसके बाद भड़की हिंसा में एक सुरक्षाकर्मी भी मारा गया। इस घटना से पूरे नगालैंड में भारी रोष फैल गया। जो लोग मारे गए हैं, वो नगालैंड की कोन्याक जनजाति के हैं। यह जनजाति राज्य की सबसे बड़ी आबादी है। वैसे भी कोन्याक खूंखार जनजाति मानी जाती है।

दुश्मन का सिर काटकर घर में रखने की इनकी परंपरा रही है, अब इस पर काफी हद तक रोक लग गई है। लेकिन ओटिंग में हुई हिंसक घटना के बाद कोन्याक यूनियन ने सैन्य बलों द्वारा ‘हत्या’ के विरोध में जिले में एक दिन का बंद रखा और अगले सात दिन तक शोक मनाने की घोषणा की है। इस घटना के लिए दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते हुए उसने उसने सुरक्षा बलों से कहा है कि वो इस इलाके में गश्त न करें। घटना के बाद नगालैंड पुलिस ने असम राइफल्स के जवानों के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज किया है। राज्य सरकार ने एसआईटी जांच का भी ऐलान किया है। उधर सेना भी मामले की उच्चस्तरीय जांच कर रही है। इस घटना के विरोध में नगालैंड सरकार ने राज्य के प्रतिष्ठित हाॅर्नबिल महोत्सव को बीच में ही समाप्त कर ‍दिया। स्थानीय पुलिस की आरंभिक जांच में यह बात सामने आई है कि सुरक्षा बलों ने यह पुष्टि किए बगैर लोगों कर गोली चला दी कि वो वाकई में आंतकी हैं या नहीं। यही नहीं, गोलीबारी में लोगों के मारे जाने  के बाद मामलों को छिपाने की कोशिश भी की गई। 

यहां विवाद का मुख्य मुद्दा वह कानून है, जिसके तहत सुरक्षा बलों ने आनन फानन में यह कार्रवाई की। नगालैंड, असम तथा मणिपुर व मेघालय के कुछ हिस्सों में अफ्स्पा ( सशस्त्र बल विशेषाधिकार) कानून लागू है। आरोप है कि इस कानून से मानवाधिकारों का हनन हो रहा है। यह कानून 1958 में अशांत पूर्वोत्तर राज्यों में हिंसा से निपटने के लिए लाया गया था। अंग्रेजी में इसे आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पॉवर एक्ट, 1958 के नाम से जाना जाता है।

यह कानून कुछ साल पंजाब में लागू रहा और वर्तमान में कुछ पूर्वोत्तर राज्यों के ‍अलावा जम्मू-कश्मीर में लागू है। इस कानून के मुताबिक कोई भी सैन्य टुकड़ी जल, थल और वायु मार्ग से अपने ऑपरेशन को अंजाम दे सकती है। कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश जहां राज्यपाल का प्रशासन हो और ऐसे क्षेत्रों में हिंसा व खतरनाक हालात हों, सेना नागरिकों के हितों की रक्षा के लिए अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर सकती है। अफ्स्पा में सेना के अ‍फसरों को यह अधिकार है कि वे उचित कारणों से संदेह के आधार पर किसी भी व्यक्ति को बिना किसी वारंट के गिरफ्तार कर सकते हैं,कार्रवाई कर सकते हैं। कानून में यह भी प्रावधान है कि बगैर केन्द्र सरकार की मंजूरी के सेना के खिलाफ कोई मुकदमा या कानूनी कार्यवाही नहीं की जा सकेगी।

यकीनन सुरक्षा बलों को मिले इस विशेषाधिकार का अर्थ यह नहीं कि इसके तहत किसी को भी मार दिया जाए। क्योंकि कई बार ऐसी कार्रवाइयां औचित्यपूर्ण होने की बजाए दमनात्मक होने लगती हैं। इससे शांति स्थापना की जगह जनअसंतोष और भड़कने का खतरा रहता है। ओटिंग में भी यही हुआ। गलतफहमी या लापरवाही के कारण ही सही, जो घट गया है, उसने नगालैंड और पूर्वोत्तर के दूसरे राज्यों में अलगाववाद को फिर हवा दे दी है। उसे वापस पटरी पर लाना आसान नहीं है। वैसे भी नगालैंड में स्वतंत्र नगालैंड की मांग को लेकर कई विद्रोही गुट सक्रिय हैं। ओटिंग गांव में जिस कोन्याक जनजाति  के लोग मारे गए वो एमएनपीजी (नगा नेशनल पाॅलिटिकल ग्रुप्स) 7 नगा विद्रोही गुटों की रीढ़ है। ऐसे में डर इस बात का है कि यदि कोन्याक भड़क गए तो राज्य में भारी अशांति फैलेगी। ये विद्रोही गुट स्वतंत्र और वृहद नगालैंड (नगालिम) की मांग करते रहे हैं।  

राज्य में नेफियू रियू के नेतृत्व में एनडीपीपी ( नगालैंड डेमोक्रेटिक पीपुल्स पार्टी) तथा भाजपा गठबंधन की सरकार है। 2018 के चुनाव में भाजपा के चुनाव चिन्ह पर इस ईसाई बहुल राज्य में 12 विधायक जीते थे। इसके पीछे आरएसएस की बड़ी भूमिका रही है। नगालैंड में शांति स्थापना के लिए मोदी सरकार ने 3 अगस्त 2015 को विद्रोही संगठन नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल आॅफ नगालैंड (एनएससीएन) के दो प्रमुख गुटों इसाक और मुइवा के साथ एक फ्रेमवर्क समझौता किया था। लेकिन इससे दूसरे सशस्त्र विद्रोही गुट इससे नाराज हो गए थे। यह समझौता क्या था, इससे कभी स्पष्ट नहीं किया, लेकिन वो समझौता भी लागू नहीं हो पाया क्योंकि एक तो इसकी दिशा और उद्देश्य स्पष्ट नहीं था।  

दूसरे, ज्यादातर विद्रोही गुट नगालैंड के लिए अलग संविधान और अलग झंडे की मांग पर अड़े हुए हैं। इसी साल सितंबर में केंद्र सरकार ने निकी सूमी के नेतृत्व वाले नगा विद्रोही समूह एनएससीएन के एक गुट के साथ संघर्ष विराम समझौते पर हस्ताक्षर किए थे। यह समझौता 1 साल के लिए किया गया है। समझौते के तहत 2 सौ विद्रोहियों ने सरेंडर किया। लेकिन नगालैंड का राजनीतिक, सामाजिक तानबाना ऐसा है कि कोई समझौता ज्यादा नहीं‍ टिक पाता, क्योंकि किसी भी मुद्दे पर सभी नगा विद्रोही संगठन एकमत नहीं हैं। लेकिन ऐसे समझौतों से हिंसा पर लगाम जरूर लगती है। डर इसी बात का है कि मोन जिले की यह घटना उस लगाम को भी बेअसर न कर दे। लिहाजा सरकार को बहुत समझदारी और संवेदनशीलता के साथ फूंक फूंक कदम रखना होगा। वरना अलगाववाद का जिन्न फिर पूरी ताकत से सिर उठाने लगेगा। नई ‍परिस्थिति में समझौता वार्ता को झटका लग सकता है और विद्रोही गुट हिंसा को बढ़ावा दे सकते हैं।