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गारंटियों या रेवडिय़ों का महासंग्राम?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 20 Jul

सार

कांग्रेस ने हिमाचल और कर्नाटक के चुनावों में ‘गारंटी’ का राजनीतिक प्रयोग किया था, जो कामयाब रहा..प्रधानमंत्री भी उनसे प्रभावित लगते हैं, लिहाजा भाजपा के घोषणा-पत्र में ऐसी गारंटियों का उल्लेख है..!

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विस्तार

हाल ही में सम्पन्न हुए विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी ने भी खूब ‘गारंटियां’ बांटी हैं तो कांग्रेस भी कम नहीं है । दोनों ने भरोसा भी दिया है कि उनकी गारंटियों के मायने हैं कि काम निश्चित तौर पर होगा। कांग्रेस ने हिमाचल और कर्नाटक के चुनावों में ‘गारंटी’ का राजनीतिक प्रयोग किया था, जो कामयाब रहा। प्रधानमंत्री भी उनसे प्रभावित लगते हैं, लिहाजा भाजपा के घोषणा-पत्र में ऐसी गारंटियों का उल्लेख है। खुद प्रधानमंत्री ने कई चुनावी जनसभाओं में ‘मोदी की गारंटी’ के जरिए मतदाताओं, खासकर महिलाओं, को आश्वस्त करने की कोशिशें की हैं। 

कुछ गारंटियां तो गौरतलब हैं। किसानों को ‘प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना’ के तहत 6000 रुपए सालाना उनके बैंक खातों में जमा कराए जाते हैं। ऐसे 8-10 करोड़ किसानों में 15 किस्तें बांटी जा चुकी हैं। उसके बावजूद भाजपा घोषणा-पत्र में वायदा किया गया है कि किसानों के खातों में 12,000 रुपए सालाना डाले जाएंगे। किसानों के संदर्भ में ही उल्लेखनीय है कि केंद्रीय कृषि मूल्य आयोग ने गेहूं और धान के न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) क्रमश: 2275 रुपए और 2200 रुपए प्रति क्विंटल घोषित किए थे, लेकिन राजस्थान और मध्यप्रदेश के भाजपा घोषणा-पत्रों में 2700 रुपए और 3100 रुपए देने का आश्वासन दिया गया है। 

यहाँ सवाल यह  है कि एमएसपी केंद्र का अथवा राज्य किसका लागू होगा? राज्य सरकारें कितनी खरीद कर सकती हैं? वैसे किसानों के अलावा, कोई और वर्ग या समुदाय नहीं है, जिन्हें ऐसी ‘गारंटियों’ की सख्त जरूरत हो? भाजपा ने छात्रों को ‘स्कूटी’ देने की भी घोषणा की है। बेहद गौरतलब है कि प्रधानमंत्री मोदी ने ‘मुफ्त अनाज योजना’ को 5 और साल, यानी 2028 तक, बढ़ाने की जन-घोषणाएं खुद ही की थीं, लेकिन भारत सरकार के ‘पत्र सूचना ब्यूरो’ ने जो विज्ञप्ति जारी की है उसमें उल्लेख है  कि ‘प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना’ को एक साल के लिए बढ़ाया गया है।इस विरोधाभास का सच क्या है? खुद प्रधानमंत्री ही सार्वजनिक मंच से इसे स्पष्ट करें। 

दूसरी ओर कांग्रेस ने भी ‘गारंटियों’ की भरमार लगा दी है। उसका आश्वासन है कि सरकारें बनीं, तो 100 यूनिट, किसी राज्य में 200 यूनिट, तक बिजली मुफ्त, किसानों के 2 लाख रुपए तक के कर्ज माफ, 3000 रुपए बेरोजगारी मासिक भत्ता, घर की मुखिया महिला को 15,000 रुपए सालाना, एक लाख सरकारी नौकरियां दो साल में छत्तीसगढ़ में और 2.5 लाख सरकारी नौकरियां पांच साल में राजस्थान में, मुफ्त स्वास्थ्य योजना आदि की लंबी फेहरिस्त है। 

यह एक ज्वलंत सवाल है कि किसे ‘गारंटी’ माना जाए अथवा क्या ‘मुफ्तखोरी की रेवड़ी’ है? क्या दोनों ही देशहित में नहीं हैं? फिर ‘कल्याणकारी राज्य’ की परिभाषा क्या है? क्या सामाजिक सुरक्षा देना सरकार का दायित्व नहीं है? कई सवाल हैं। प्रधानमंत्री मोदी कई बार चिंता और सरोकार जताते हुए राज्य सरकारों को चेता चुके हैं कि इन ‘मुफ्तखोरी की रेवडिय़ों’ से देश की अर्थव्यवस्था बिगड़ सकती है। राज्य सरकारों पर कर्ज के बोझ पहले से ही बहुत ज्यादा हैं, लेकिन सवाल प्रधानमंत्री और उनकी पार्टी भाजपा पर भी हैं। क्या उनकी ‘गारंटियां’ विकासपरक हैं? यदि 5 और साल ‘मुफत अनाज’ की योजना जारी रहती है, तो 2 लाख करोड़ रुपए सालाना का अतिरिक्त बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा। जाहिर है कि अर्थव्यवस्था भी प्रभावित होगी, क्योंकि मौजूदा सरकार की सोच गैर-जरूरी सबसिडी-विरोधी है। 

अभी तो विधानसभा चुनाव हुए हैं, लेकिन आम चुनाव, और लोकसभा चुनाव भी, बहुत दूर नहीं है। करीब चार महीनों में वे चुनाव भी ‘चरम’ पर होंगे। दोनों राष्ट्रीय दलों में ‘गारंटियों या रेवडिय़ों’ पर महासंग्राम के हालात होंगे। मोदी सरकार से वित्तीय घाटे और अन्य राजकोषीय विसंगतियों की अपेक्षा नहीं की जाती।