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एकात्मता का जीवंत संकल्प, आदि शंकर का प्रकल्प

सार

दिल ही दिल से जुड़ता है. भारत के दिल एमपी ने सनातन धर्म के दिल आदि शंकर को सदियों बाद जीवंत स्वरूप में स्थापित कर सनातन धर्म की बड़ी सेवा की है. हजारों साल पहले सुदूर दक्षिण के केरल राज्य से चलकर मध्यप्रदेश की धरती ओमकारेश्वर में गुरु ज्ञान पाकर भारत के सनातन धर्म को देश के चारों कोनों से जोड़ने का जो कालजयी काम आदि शंकराचार्य ने किया था उन्हीं काम और अनुभूतियों को शाश्वत जीवंत स्वरूप देने के लिए एकात्म धाम की स्थापना का कालजयी प्रयास मध्यप्रदेश की सरकार ने पूरा किया है..!

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विस्तार

ओंकारेश्वर की मांधाता पहाड़ी पर 108 फीट की अष्टधातु की आदिशंकर की मूर्ति का 18 सितंबर को अनावरण होगा. एकात्मकता की इस मूर्ति को ‘स्टेच्यू ऑफ़ वननेस’  के रूप में राष्ट्र को समर्पित किया जाएगा. एकात्म धाम को  अद्वैत वेदांत के विश्व केंद्र के रूप में विकसित कर मानव जीवन के सत्य को आत्मसात करने का महान संयोजन किया जा रहा है.

धर्म का जीवन के सत्य के साथ ज्ञान और भक्ति का महासमन्वय जीवन के परम लक्ष्य तक पहुंचने के लिएओमकारेश्वर साधना स्थली के रूप में स्थापित हो सकेगा. आचार्य शंकर ने भज गोविंदम का जो दर्शन दिया है वह ज्ञान और भक्ति के सहारे जीवन के परम लक्ष्य पर पहुँचने का मार्ग प्रशस्त करता है.

सनातन धर्म को मिटाने की दक्षिण भारत से आज आवाज उठाई जा रही है. दूसरी तरफ उत्तर भारत में दक्षिण से उठी आदि शंकर की अंतर्दृष्टि से चारों ओर फैले सनातन की अविरल धारा को नर्मदा के तट पर नई ऊर्जा के साथ आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है. आदि शंकराचार्य को मध्यप्रदेश में गुरु ज्ञान मिला था. उन्होंने मंडला में मंडन मिश्र के साथ शास्त्रार्थ भी किया था. शंकराचार्य के संकल्प से भारत के चारों कोने सनातन की मजबूत धारा से जुड़ गए हैं.

दक्षिण भारत में श्रृंगेरी मठ, पूर्व में जगन्नाथ पुरी में गोवर्धन पीठ मठ, पश्चिम में द्वारिका पुरी में शारदा पीठ और उत्तर में ज्योतिष पीठ बद्रिकाश्रम में शंकराचार्य द्वारा स्थापित मठ सनातन संस्कृति की पताका को ऊंचाई प्रदान कर रहे हैं. आज भी इन चारों पीठों में शंकराचार्य सनातन संस्कृति के सबसे बड़े ध्वजवाहक बने हुए हैं. ओमकारेश्वर का एकात्म धाम इन चारों मठों के समन्वय के रूप में काम करते हुए आदि शंकराचार्य की अनुभूति और दर्शन को दुनिया में गौरवपूर्ण स्थान पर पहुंचाने में सफल होगा. 

आदि शंकराचार्य ने उत्तर के बद्रिका आश्रम में, दक्षिण के पुजारी रखने की जो परंपरा प्रारंभ की थी वह शताब्दियों बाद भी आज अनवरत चल रही है. इसी प्रकार दक्षिण के रामेश्वरम में उत्तर भारत के पुजारी पूजा के लिए नियुक्त किये जाते हैं. शंकराचार्य द्वारा चारों मठों में सनातन हिन्दुओं के लिए बनाये गए चारों धाम की तीर्थ यात्रा हर हिन्दू के जीवन का परम लक्ष्य होता है. शंकराचार्य द्वारा की गई व्यवस्थाएं सनातन का मानस बन गई हैं.

आदि शंकर ने मानव को जीवन के सत्य से परिचित कराया है. सांसारिक मोह को क्षणभंगुर बताते हुए जगत को मिथ्या बताकर जीवन सत्य के प्रति मानव को जागृत करने का उनका भाष्य आज समाज और राष्ट्र की एकता के लिए सबसे बड़ा सूत्र साबित हो रहा है. 

ओंकार सनातन धर्म का आधार है. इसका सृष्टिकर्ता विधाता के मुखारविंद से सर्वप्रथम उच्चारण हुआ. वेद का पाठ ओम के उच्चारण के बिना नहीं होता है. मांधाता का ओमकार क्षेत्र ओमकार का भौतिक विग्रह है. नर्मदा और कावेरी के संगम पर ओंकारेश्वर ममलेश्वर ज्योतिर्लिंग इस स्थान को सृष्टि की उत्पत्ति के साथ जोड़े हुए है. आदि शंकर को अपने गुरु आचार्य गोविंद भगवतपाद से दीक्षा मिली. ओंकार क्षेत्र का पौराणिक और सांस्कृतिक महत्व सनातन और शाश्वत है. आदि शंकर के सनातन धर्म के दर्शन की आज सबसे अधिक जरूरत है. 

मानव खंड-खंड जीवन का अभ्यस्त हो गया है. अंदर से कुछ और सोचता है और बाहर आचरण में कुछ और प्रदर्शित करता है. यही खंड-खंड जीवन का पाखंड परम सत्य के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा है. जब तक अंदर और बाहर का चिंतन अखंड नहीं होगा तब तक न मनुष्य अखंड होगा ना राष्ट्र अखंड होगा.

आदि शंकर की जीवनधारा सनातन रूप से संन्यास परंपरा में जीवित है. कंकर-कंकर शंकर की धारणा में भी वही चिंतन और सनातन आस्था बसी हुई है कि मनुष्य की चेतन ऊर्जा एक है. एकात्मता का यही भाव भारत को अखंड बनाएगा. आचार्य शंकर जीव को ब्रह्म और जगत को मिथ्या कहते हैं तो वह चेतना की एकात्मकता के प्रति जागृत होने का संदेश देते हैं. जीवन का सत्य वही है जो शास्वत है. जो कल भी था आज भी है और कल भी रहेगा. मनुष्य कल नहीं था, आज है कल नहीं रहेगा. फिर भी इस मिथ्या को आत्मसात किए बिना क्षणभंगुर जीवन में सुख की आशा में दुख भोग रहा है.

आदि शंकराचार्य की मूर्ति स्थापित करने और उनके दर्शन के विस्तार के लिए एकात्म धाम की स्थापना का विचार राज्य सरकार ने जब किया होगा तब सनातन के विरुद्ध राजनीतिक आवाजों की इतनी अधिकता नहीं रही होगी. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने जिस मंशा और कल्पना के साथ आचार्य शंकर के प्रकल्प की अवधारणा और क्रियान्वयन की शुरुआत की होगी उस पर चर्चा जरुरी है. किसी भी अच्छे काम का श्रेय देना निश्चित रूप से ऐसे महत्वपूर्ण दूसरे प्रकल्प को भविष्य में आकार लेने की ऊर्जा बढ़ाएगा. 

जब जगत ही माया है तो पद प्रतिष्ठा माया के ही रूप हैं. माया के इस संसार में किसी भी व्यक्ति के मन में एकात्म धाम की परिकल्पना की प्रेरणा उत्पन्न हो यह परम ऊर्जा की ही इच्छा कही जाएगी.

एकात्म धाम आचार्य शंकर का पुनर्जीवन कहा जा सकता है. इस पुनर्जीवन में शिवराज सरकार की भूमिका को जीवन सत्य के प्रति  समर्पण के रूप में देखना ज्यादा प्रासंगिक होगा. जगत की माया में पद प्रतिष्ठा सब समाप्त हो जाती है लेकिन आदि शंकर की शास्वत सत्ता को जन-जन तक पहुंचाने के प्रयास जीवन को सत्य से जोड़ते हैं. जो काम जीवन के सत्य से जुड़ जाता है वह शास्वत हो जाता है. एकात्म धाम सनातन धर्म के आस्था केंद्र के रूप में जीवंत बना रहेगा. इस सत्य में मध्यप्रदेश सरकार और एकात्म धाम को आकार देने के निर्णय के शिल्पकार शिवराज सिंह चौहान भी सदियों तक जुड़े रहेंगे.