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राजनीति के एवरेस्ट पर बदलाव, नफ़ा या नुकसान?

सार

भारत के मुसलमानों में  पसमांदा की तादाद 85% के करीब है. यह मुस्लिम समाज का पिछड़ा और निचला तबका माना जाता है..!

janmat

विस्तार

मुसलमानों को लेकर भाजपा क्या अपनी रणनीति बदल रही है? क्या भाजपा मुसलमानों की पिछड़ी और गरीब जातियों को अपने साथ जोड़कर मुस्लिम समाज में जातिगत विभाजन को बढ़ाने की कोशिश कर रही है? क्या भाजपा विरोधी दलों के साथ मुसलमानों की राजनीतिक एकजुटता को तोड़ने के लिए बेचैन है? यह सवाल इसलिए कि तीन तलाक का कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं में अपनी पकड़ बनाने वाली बीजेपी की नजर अब पसमांदा मुसलमानों पर है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिए स्नेह यात्रा शुरू करने का ऐलान किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों के मद्देनजर पसमांदा मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने का लक्ष्य बनाया गया है। भारत के मुसलमानों में पसमांदा की तादाद 85% के करीब है। यह मुस्लिम समाज का पिछड़ा और निचला तबका माना जाता है।

अभी तक बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति के सहारे देश के राजनीतिक शिखर पर  पहुंची है। बीजेपी में अभी तक तो ऐसी स्थिति देखी जाती रही है, जहां किसी भी राज्य में विधायक या सांसद एक भी प्रत्याशी मुस्लिम वर्ग से नहीं आते थे। भाजपा शासित केंद्र और राज्य की सरकारों में मुस्लिम मंत्री ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। मोदी मंत्रिमंडल में मुख्तार अब्बास नकवी अकेले मुस्लिम मंत्री थे, जिन्होंने राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में 18 सालों से भाजपा सरकार चला रही है लेकिन मंत्रिमंडल में कभी भी मुस्लिम जनप्रतिनिधि शामिल नहीं रहा।  

बीजेपी मुस्लिम सहित सभी वर्गों के साथ विकास के मामले में समान रूप से काम करती रही है लेकिन राजनीतिक रूप से पार्टी हिंदुत्व पर ही टिकी हुई है।  गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने सद्भावना यात्रा के दौरान जब मुस्लिमों की टोपी नहीं पहनी तो उसकी पूरे देश में व्यापक रूप से चर्चा हुई थी। तो अब क्या यह माना जाए कि पसमांदा मुसलमानों के लिए स्नेह यात्रा का ऐलान मुसलमानों के प्रति बीजेपी की रणनीति में बदलाव है?

मुसलमानों के प्रति भाजपा के झुकाव को देखते हुए क्या हिंदुओं में इसकी प्रतिक्रिया हो सकती है? हिंदुत्व की राजनीति में बीजेपी के अलावा कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल हिंदू हितैषी होने का दावा करते हैं लेकिन हिंदुत्व के नाम पर केवल बीजेपी पर ही जनता भरोसा करती है और उन्हें जन समर्थन हासिल होता है। बीजेपी स्वयं असली हिंदू और नकली हिंदू की बात करती रही है। तो क्या मुस्लिमों के प्रति झुकाव के बाद बीजेपी को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा?  

परंपरागत रूप से देश के मुसलमान बीजेपी विरोधी दलों के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं। बीजेपी को लेकर मुस्लिमों में गहरा अविश्वास बना हुआ है।  यद्यपि बीजेपी केंद्र और राज्य में अपनी सरकारों में विकास योजनाओं के माध्यम से मुस्लिम समाज को भी समान रूप से लाभ और अवसर देती रही है। बीजेपी विरोधी दलों पर मुस्लिमों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। अब बीजेपी नया नारा 'तुष्टीकरण नहीं तृप्तिकरण' के लिए समर्पित है। तृप्तिकरण और तुष्टीकरण में शाब्दिक रूप से तो अंतर दिख रहा है लेकिन अंतिम परिणाम दोनों का एक ही जैसा है। 

बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति के अंतर्गत मुसलमानों के बड़े वर्ग पसमांदा को अपने पाले में लाने का संकल्प लिया है। इस वर्ग की आबादी मुस्लिम समाज में 85 % के करीब है। देश में मुसलमानों के भीतर भी कई वर्ग हैं। मुस्लिम समाज में सामाजिक रूप से तीन समूह हैं-अशराफ, अजलाफ और अरजाल। अशराफ कैटेगरी में सैयद, शेख पठान और अन्य शामिल हैं। यह वर्ग मुसलमानों में सबसे दबदबे वाला माना जाता है। अजलाफ कैटेगरी में मुख्य रूप से मुस्लिम कारीगर आते हैं। दर्जी, धोबी, बढ़ई, लोहार, नाई कुम्हार आदि इसी वर्ग के हैं। अरजाल मुसलमानों में सबसे निचले पायदान पर माने जाते हैं।  इनमें मेहतर और नट आते हैं। इसमें वे दलित है जिन्होंने इस्लाम कबूल किया है। 

अजलाफ और अरजाल मिलकर पसमांदा कैटेगरी बनाते हैं। पसमांदा का मतलब होता है जो लोग पीछे रह गए हैं। मुसलमानों के पसमांदा समूह को पिछड़े वर्गों के अंतर्गत आरक्षण की सुविधा उपलब्ध है। मुस्लिमों की 79 जातियां ऐसी हैं जिन्हें ओबीसी को मिल रहे 27% आरक्षण का लाभ मिलता है। पसमांदा मुस्लिमों का एक वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम भी है लेकिन समाज में उसे भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 

मुस्लिम समाज में जातिगत आधार पर भेदभाव के तथ्यों को पसमांदा मुसलमानों के लिए स्नेह यात्रा के माध्यम से बीजेपी उभारना चाहती है। समाज के किसी भी वर्ग की आर्थिक बेहतरी और मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए। इस दृष्टि से स्नेह यात्रा निश्चित रूप से पसमांदा मुसलमानों को आगे लाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकती है। 

भारत की राजनीति आज जिस दौर में है, उसमें राजनीति का हिंदुत्व काल उभार पर है। हिंदुत्व की राजनीति की सबसे ज्यादा लाभ लेने वाली पार्टी बीजेपी ही रही है। देश के बड़े हिस्से में बीजेपी का समर्थन हिंदुत्व के कारण ही किया जाता है। मुस्लिमों के साथ झुकाव की बीजेपी की रणनीति कितना लाभ पहुंचाएगी, यह कहा नहीं जा सकता। इसके विपरीत हिंदुत्व की राजनीति में निराशा के भाव की संभावना को भी बीजेपी को बड़ी सावधानी से ध्यान और विचार में रखना होगा।  नूपुर शर्मा के खिलाफ बीजेपी द्वारा की गई कार्रवाई का हिंदुत्व के एक बड़े वर्ग में विरोध दिखाई दिया था। सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास नारे के रूप में तो सफल हो सकता है लेकिन जमीन पर तो वास्तविक समीकरण ही राजनीतिक लाभ या नुकसान पहुंचाते हैं। .

मुसलमानों को लेकर भाजपा क्या अपनी रणनीति बदल रही है? क्या भाजपा मुसलमानों की पिछड़ी और गरीब जातियों को अपने साथ जोड़कर मुस्लिम समाज में जातिगत विभाजन को बढ़ाने की कोशिश कर रही है? क्या भाजपा विरोधी दलों के साथ मुसलमानों की राजनीतिक एकजुटता को तोड़ने के लिए बेचैन है? तीन तलाक का कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं में अपनी पकड़ बनाने वाली बीजेपी की नजर अब पसमांदा मुसलमानों पर है। भारत के मुसलमानों में में पसमांदा की तादाद 85% के करीब है। यह मुस्लिम समाज का पिछड़ा और निचला तबका माना जाता है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पसमांदा मुसलमानों को पार्टी से जोड़ने के लिए स्नेह यात्रा शुरू करने का ऐलान किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव की तैयारियों के  मद्देनजर पसमांदा मुसलमानों को बीजेपी से जोड़ने का लक्ष्य बनाया गया है। अभी तक बीजेपी हिंदुत्व की राजनीति के सहारे देश के राजनीतिक शिखर पर  पहुंची है। बीजेपी में अभी तक तो ऐसी स्थिति देखी जाती रही है, जहां किसी भी राज्य में विधायक या सांसद एक भी प्रत्याशी मुस्लिम वर्ग से नहीं आते थे। भाजपा शासित केंद्र और राज्य की सरकारों में मुस्लिम मंत्री ढूंढने से भी नहीं मिलेंगे। मोदी मंत्रिमंडल में मुख्तार अब्बास नकवी अकेले मुस्लिम मंत्री थे, जिन्होंने राज्यसभा का कार्यकाल समाप्त होने के कारण अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। मध्यप्रदेश जैसे राज्य में 18 सालों से भाजपा सरकार चला रही है लेकिन मंत्रिमंडल में कभी भी मुस्लिम जनप्रतिनिधि शामिल नहीं रहा।  

बीजेपी मुस्लिम सहित सभी वर्गों के साथ विकास के मामले में समान रूप से काम करती रही है लेकिन राजनीतिक रूप से पार्टी हिंदुत्व पर ही टिकी हुई है।  गुजरात में मुख्यमंत्री रहते हुए नरेंद्र मोदी ने सद्भावना यात्रा के दौरान जब मुस्लिमों की टोपी नहीं पहनी तो उसकी पूरे देश में व्यापक रूप से चर्चा हुई थी। तो अब क्या यह माना जाए कि पसमांदा मुसलमानों के लिए स्नेह यात्रा का ऐलान मुसलमानों के प्रति बीजेपी की रणनीति में बदलाव है?

मुसलमानों के प्रति भाजपा के झुकाव को देखते हुए क्या हिंदुओं में इसकी प्रतिक्रिया हो सकती है? हिंदुत्व की राजनीति में बीजेपी के अलावा कांग्रेस सहित सभी राजनीतिक दल हिंदू हितैषी होने का दावा करते हैं लेकिन हिंदुत्व के नाम पर केवल बीजेपी पर ही जनता भरोसा करती है और उन्हें जन समर्थन हासिल होता है। बीजेपी स्वयं असली हिंदू और नकली हिंदू की बात करती रही है। क्या मुस्लिमों के प्रति झुकाव के बाद बीजेपी को भी ऐसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा?  

परंपरागत रूप से देश के मुसलमान बीजेपी विरोधी दलों के साथ राजनीतिक रूप से जुड़े हुए हैं। बीजेपी को लेकर मुस्लिमों में गहरा अविश्वास बना हुआ है।  यद्यपि बीजेपी केंद्र और राज्य में अपनी सरकारों में विकास योजनाओं के माध्यम से मुस्लिम समाज को भी समान रूप से लाभ और अवसर देती रही है। बीजेपी विरोधी दलों पर मुस्लिमों के तुष्टीकरण का आरोप लगाती रही है। अब बीजेपी नया नारा 'तुष्टीकरण नहीं तृप्तिकरण' के लिए समर्पित है। तृप्तिकरण और तुष्टीकरण में शाब्दिक रूप से तो अंतर दिख रहा है लेकिन अंतिम परिणाम दोनों का एक ही जैसा है। 

बीजेपी ने 2024 के लोकसभा चुनाव की रणनीति के अंतर्गत मुसलमानों के बड़े वर्ग पसमांदा को अपने पाले में लाने का संकल्प लिया है। इस वर्ग की आबादी मुस्लिम समाज में 85 % के करीब है। देश में मुसलमानों के भीतर भी कई वर्ग हैं। मुस्लिम समाज में सामाजिक रूप से तीन समूह हैं-अशराफ, अजलाफ और अरजाल। अशराफ कैटेगरी में सैयद, शेख पठान और अन्य शामिल हैं। यह वर्ग मुसलमानों में सबसे दबदबे वाला माना जाता है। अजलाफ कैटेगरी में मुख्य रूप से मुस्लिम कारीगर आते हैं। दर्जी, धोबी, बढ़ई, लोहार, नाई कुम्हार आदि इसी वर्ग के हैं। अरजाल मुसलमानों में सबसे निचले पायदान पर माने जाते हैं।  इनमें मेहतर और नट आते हैं। इसमें वे दलित है जिन्होंने इस्लाम कबूल किया है। 

अजलाफ और अरजाल मिलकर पसमांदा कैटेगरी बनाते हैं। पसमांदा का मतलब होता है जो लोग पीछे रह गए हैं। मुसलमानों के पसमांदा समूह को पिछड़े वर्गों के अंतर्गत आरक्षण की सुविधा उपलब्ध है। मुस्लिमों की 79 जातियां ऐसी हैं जिन्हें ओबीसी को मिल रहे 27% आरक्षण का लाभ मिलता है। पसमांदा मुस्लिमों का एक वर्ग आर्थिक रूप से सक्षम भी है लेकिन समाज में उसे भी भेदभाव का सामना करना पड़ता है। 

मुस्लिम समाज में जातिगत आधार पर भेदभाव के तथ्यों को पसमांदा मुसलमानों के लिए स्नेह यात्रा के माध्यम से बीजेपी उभारना चाहती है। समाज के किसी भी वर्ग की आर्थिक बेहतरी और मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार को प्रयास करना चाहिए। इस दृष्टि से स्नेह यात्रा निश्चित रूप से पसमांदा मुसलमानों को आगे लाने में सकारात्मक भूमिका निभा सकती है। 

भारत की राजनीति आज जिस दौर में है, उसमें राजनीति का हिंदुत्व काल उभार पर है। हिंदुत्व की राजनीति की सबसे ज्यादा लाभ लेने वाली पार्टी बीजेपी ही है। देश के बड़े हिस्से में बीजेपी का समर्थन हिंदुत्व के कारण ही किया जाता है। मुस्लिमों के साथ झुकाव की बीजेपी की रणनीति कितना लाभ पहुंचाएगी, यह कहा नहीं जा सकता। इसके विपरीत हिंदुत्व की राजनीति में निराशा के भाव की संभावना को भी बीजेपी को बड़ी सावधानी से ध्यान और विचार में रखना होगा।  नूपुर शर्मा के खिलाफ बीजेपी द्वारा की गई कार्रवाई का हिंदुत्व के एक बड़े वर्ग में विरोध दिखाई दिया था। सबका साथ-सबका विकास और सबका विश्वास नारे के रूप में तो सफल हो सकता है लेकिन जमीन पर तो वास्तविक समीकरण ही राजनीतिक लाभ या नुकसान पहुंचाते हैं। .