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सोच बदलिए,तभी महिलाओं की दशा बदलेगी  

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Fri , 05 Mar

सार

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट बताती है कि विश्वभर में किसी कार्य हेतु पुरुषों को यदि 100 रुपये मिलते हैं तो महिलाओं को प्रदत्त श्रमदेय 73 रुपये (भारत में 71 रुपये) रहता है..!

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विस्तार

आज़ादी के 75 साल बाद भारत में महिलाओं की दशा दोयम दर्जे पर है। जहां भारत सरकार के केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ‘भारत में महिला एवं पुरुष 2022 रिपोर्ट’ बताती है, विगत एक दशक में महिला-पुरुषों के मध्य वेतन असमानता बढ़ी है। वहीं इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन रिपोर्ट बताती है कि विश्वभर में किसी कार्य हेतु पुरुषों को यदि 100 रुपये मिलते हैं तो महिलाओं को प्रदत्त श्रमदेय 73 रुपये (भारत में 71 रुपये) रहता है।


नैसकॉम की रिपोर्ट के अनुसार, भारत की तकनीकी उद्यमिता में लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं सम्मिलित हैं लेकिन उनका औसत वेतन पुरुषों से 29 प्रतिशत कम है। रिटेलर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया के मुताबिक़, रिटेल वर्कफोर्स में महिला सहभागिता 70 प्रतिशत होने के बावजूद उनका वेतन पुरुषों की अपेक्षा 33 प्रतिशत कम है। मासिक आय का यह अंतर कृषि क्षेत्र में 3,812 रुपये, मैन्युफैक्चरिंग में 5,904 रुपये, सर्विस सेक्टर में 4,435 रुपये तथा ट्रेडिंग में 6,020रुपये है।


वर्ल्ड इनइक्वलिटी रिपोर्ट के मुताबिक़, देश की कुल श्रमिक आय में महिलाओं की हिस्सेदारी मात्र 18 प्रतिशत है, क्योंकि अधिकांश महिलाएं कम आय वाले व्यवसाय से ताल्लुक रखती हैं। इस संदर्भ में भारतीय ग्राम्य भूभागों का संज्ञान लें तो औसत पुरुष दिहाड़ी 393 रुपये है तथा महिला श्रमदेय 265 रुपये है। शहरी क्षेत्रों में यह क्रमशः 483 तथा 333 रुपये है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, सर्वाधिक अंतर केरल राज्य में दृष्टिगोचर हुआ। यहां गांवों में पुरुषों का औसत पारिश्रमिक 842 रुपये (प्रतिदिन) है तो महिलाओं का 434 रुपये है।


पंजाब, हरियाणा, हिमाचल तथा राजस्थान में महिला दिहाड़ी पुरुषों की अपेक्षा लगभग 85 प्रतिशत होने के कारण स्थिति बेहतर आंक सकते हैं। गुजरात, मध्यप्रदेश, झारखंड में यह 80 प्रतिशत तथा उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, बंगाल में पुरुषों के मुक़ाबले 70 प्रतिशत है। उत्तराखंड देश का एकमात्र राज्य है, जहां महिला श्रमदेय पुरुषों के मुक़ाबले अधिक पाया गया। 19 में से 11 बड़े राज्यों के मध्य स्थित अंतर वर्ष 2011-12 की अपेक्षा और बढ़ा है। पं. बंगाल, गुजरात, छत्तीसगढ़ में यह 10 प्रतिशत से अधिक रहा।


मैकेंजी की ताज़ा रिपोर्टानुसार, विश्वभर में महिलाओं की वरिष्ठ पदों पर भागीदारिता मात्र 14 प्रतिशत है, जिसके चलते मानदेय निर्धारित करने में 86 प्रतिशत पुरुषों की भूमिका प्रभावी हो जाती है। करिअर की अपेक्षा परिवार महिलाओं की प्राथमिकता है; वैतनिक भेद के पीछे यह मानसिकता भी प्रबल रहती है।राष्ट्रीय स्तर पर कारण खोजें तो मुख्य कारण हैं समाज में व्याप्त पितृसत्तात्मक सोच। इसके चलते महिलाओं को नियुक्ति, पदोन्नति, भुगतान आदि में पूर्वाग्रहों का सामना करना पड़ता है, भले ही उनकी योग्यता-अनुभव पुरुष सहयोगियों के समकक्ष हो। पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के दृष्टिगत दीर्घकालीन अवकाश, नौकरी के स्वरूप-समय संबंधी पाबंदी, प्रशिक्षण तथा शैक्षणिक कार्यक्रमों के लिए अपेक्षित समय न निकाल पाना, परिवहन उपलब्धता-सुरक्षा के दृष्टिगत समस्याएं पेश आना, मौक़े अपेक्षाकृत कम होने के कारण ऊंचे वेतनमान के लिए अधिक मोलभाव न कर पाना आदि अनेकानेक कारण इस अंतर को बढ़ावा देते हैं।


वही कानूनी स्थिति देखें तो 1976 में पारित ‘समान पारिश्रमिक अधिनियम’ सार्वजनिक अथवा निजी सभी संगठनों के नियमित-अनियमित कर्मचारियों को दायरे में लेते हुए, बिना किसी लिंग भेदभाव समान कार्यों के लिए समान वेतन प्राप्त करना सुनिश्चित करता है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 39(डी) तथा अनुच्छेद 42 इस विषय में समानता की पूर्ण गारंटी देते हैं। वर्ष 2013 में पारित ‘यौन उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध तथा प्रतिशोध) अधिनियम’ कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा आवश्यक बनाने सहित वेतनमान समानता भी सुनिश्चित करता है।


सामयिक आवश्यकता के मद्देनज़र वर्ष 2017 को संशोधित ‘मातृत्व लाभ अधिनियम’ के तहत मातृत्व अवकाश की अवधि 12 सप्ताह से बढ़ाकर 26 सप्ताह कर दी गई। इसी प्रकार, वर्ष 2022 में ‘भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड’ (बीसीसीआई) ने ‘भुगतान समता नीति’ के अंतर्गत, केंद्रीय रूप से अनुबंधित महिला-पुरुष खिलाड़ियों को समान फीस देने संबंधी घोषणा की,किंतु महज़ कानून बनाने भर से इस अंतर को पाटना संभव नहीं है। केंद्रीय सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय द्वारा जारी ‘भारत में महिला एवं पुरुष 2022 रिपोर्ट’ बताती है, विगत एक दशक में महिला-पुरुषों के मध्य वेतन असमानता बढ़ी है। उच्च वेतन स्तर पर अंतराल और अधिक बढ़ गया।


भेदभाव की गहरी खाई पाटने हेतु समग्र मानसिकता में बदलाव लाना आवश्यक है। समावेशी तथा सुसंचालित राजनीतिक-सामाजिक नीतियां सर्वपक्षीय असमानता दूर करने में निर्णायक योगदान दे सकती हैं। मौजूदा कानूनों में अपेक्षित संशोधन करने के साथ समयानुकूल नव विधान लाना एवं संबद्ध कानूनों को कड़ाईपूर्वक लागू करना समय की मांग है। आवश्यक है कि महिला कर्मचारियों को कौशल एवं ज्ञानवृद्धि हेतु प्रशिक्षण तथा विकास के पर्याप्त अवसर मुहैया करवाएं जाएं, जो कि करिअर में आगे बढ़ने तथा बेहतर अवसर पाने में सहायक सिद्ध हो सकें।