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परिस्थितियां एक नजरिये अनेक, यह कैसा रोग?

सार

अदालतों के फैसले सरकारों द्वारा बदलने का पुराना इतिहास है. अपने फैसले सबसे ऊपर रखने की इंसानी प्रवृत्ति सियासत के इकोसिस्टम को बदल रही है. लोकतांत्रिक सरकारें अदालती फैसलों को सियासी नफा नुकसान के लिए कैसे बदलती हैं, इसका सबसे बड़ा उदाहरण शाहबानो केस है.

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विस्तार

शाहबानो केस में सुप्रीम कोर्ट का फैसला संसद ने बदल दिया था. संसद में ताकत के आधार पर न्यायालय के फैसले बदलने की धारा राजनीतिक दलों की धारा बनने लगी है. राहुल गांधी के समर्थन में कांग्रेस के देशभर में हुआ मौन सत्याग्रह किसके खिलाफ हुआ? यह साफ़ नहीं है. कारण जरूर गुजरात हाईकोर्ट द्वारा राहुल गांधी की याचिका निरस्त होने से पैदा हुआ. इसके बाद ही सत्याग्रह की मौन सियासत हुई है.

राहुल गांधी का यह पूरा मामला न्यायालय की पृष्ठभूमि में ही खड़ा हुआ है. मानहानि मामले में सजा और संसद सदस्यता से अयोग्यता का आधार न्यायिक फैसला ही है. इसमें राजनीति की गुंजाइश बहुत अधिक दिखाई नहीं पड़ती लेकिन आम के पेड़ पर बेर उगाने का आश्चर्य सियासत में ही हो सकता है.

अदालती फैसले टीका टिप्पणी से ऊपर विश्वास की बुनियाद पर टिके होते हैं. लोकतंत्र में तो विश्वास कम होता जा रहा है. जनता के बुनियादी विषयों पर पॉलिटिक्स शोर की पॉलिटिक्स में दब सी जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने ईडी के डायरेक्टर की नियुक्ति को अवैध ठहराने का जब फैसला दिया तब कांग्रेस ने यह कहकर फैसले का स्वागत किया कि यह फैसला उनकी राय के मुताबिक है. क्योंकि सरकार को इस फैसले में कटघरे में खड़ा किया गया था इसलिए इस पर नजरिया अलग और राहुल गांधी के फैसले पर नजरिया अलग.

अदालतें सबूत के नजरिए से फैसले करती हैं. सियासत की सुविधा और असुविधा उनके लिए गौण है. पूरे देश में जांच एजेंसियों की भूमिका पर सवाल खड़े किए जाते हैं. बार-बार सभाओं में यह कहा जाता है कि वर्तमान सरकार संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जा कर रही है. ऐसे सियासी वार से संवैधानिक संस्थाओं और काम करने वालों की निष्पक्षता पर सियासत अब आम हो गई है. जो मामला माफी मांग कर निचली अदालत में सम्मानजनक ढंग से समाप्त किया जा सकता था. उस मामले में इतना सियासी तूफान सही रणनीति कैसे कही जा सकती है?

कांग्रेस का मौन धरना राहुल गांधी के समर्थन में बताया गया है लेकिन यह किसके विरोध में था यह छुपा हुआ है. सूचना के युग में जब छुपने वाली चीज भी नहीं छुप रही है तो फिर सियासी टारगेट कैसे छुपाए जा सकते हैं? राजनीति में सच्चाई सियासत के हिसाब से निर्धारित होने लगी है.

मणिपुर में जाति संघर्ष में मारे गए लोगों के प्रति विपक्षी दलों को सहानुभूति दिखाना अगर लाभदायक दिखता है तो बीजेपी की केंद्र सरकार को बंगाल में पंचायत चुनाव में रक्तरंजित हिंसा को लोकतंत्र की हत्या बताना दूरगामी रणनीति लगती है. दोनों घटनाओं में कई लोगों की मौत हुई है लेकिन उस पर सियासी प्रतिक्रियाएं अलग-अलग आ रही हैं. राहुल गांधी मणिपुर पहुंच जाते हैं तो बीजेपी सांसदों का अपना डेलिगेशन बंगाल भेजने में बिल्कुल देर नहीं करती. मणिपुर की घटनाओं पर बीजेपी मौन हैं तो बंगाल की घटनाओं पर कांग्रेस मौन है. मौतें भी दलों के लिए सियासी वार प्रतिवार का जरिया बन गई है.

चुनाव करीब हो तो फिर सियासत के रंग होली के रंगों जैसे खेले जाने लगते हैं. एमपी में पटवारी भर्ती परीक्षा को लेकर सियासी माहौल पैदा किया जा रहा है. भर्ती परीक्षाएं पूरे देश में अपना विश्वास खो चुकी हैं. कोई भी राज्य ऐसा नहीं है जहां भर्ती परीक्षाओं में घोटाले और धांधली के आरोप नहीं लगते हैं. राजस्थान में तो कांग्रेस के ही नेता सचिन पायलट ने भर्ती घोटाले और पेपर लीक के मामलों को लेकर धरना तक दिया. अभी तक तो एमपी में इस बात पर हल्ला मच रहा था कि सरकार भर्ती नहीं कर रही है. अब जब पटवारी की परीक्षा के बाद भर्तियों के आदेश निकल गए तो फिर धांधली के सियासी वार शुरू हो गए.

रोजगार युवाओं के लिए बड़ी समस्या है. हर युवा पढ़ लिखकर सरकारी नौकरी करना चाहता है. नौकरी के अवसर सीमित हैं. सीमित अवसरों में अपना मौका तलाशने के लिए हर कोई सब कुछ करना चाहता है जिससे उसे सफलता मिल सके. जहां कांग्रेस की सरकार है वहां बीजेपी भर्ती घोटाले का मुद्दा उठाती है और जहां बीजेपी की सरकार हैं वहां कांग्रेस भर्ती घोटाले को मुद्दा बनाती है. परिस्थितियां एक लेकिन सियासी नजरिया अनेक. भर्ती घोटालों की सच्चाई क्या होती है वह तो कभी सामने ही नहीं आती लेकिन हर राजनीतिक दल अपने विरोधी के खिलाफ जनहित से जुड़े इस मुद्दे को उपयोग करने से नहीं चूकते हैं. ऐसी राजनीतिक परिस्थितियां एक ऐसा लोकसंकट पैदा कर रही हैं कि सियासत पर ही लोगों का भरोसा उठता जा रहा है.

न्यायालय और संवैधानिक संस्थाओं पर भरोसा करना ही पड़ेगा. उनके फैसले सुविधा के हिसाब से स्वीकार नहीं किए जा सकते. उनकी निष्पक्षता पर सवाल सरकार को असुविधा में डालने के लिए खड़ा करने का सियासी काम कई बार उल्टा पड़ता है. सरकारें बदलने के लिए विचारधारा के आधार पर चुनाव का तो देश में मौका ही उपलब्ध नहीं है. सभी राजनीतिक विचारधाराएं सत्ता के लिए खुद को बदलने में इतनी देर नहीं लगाती. दावों प्रति दावों के बीच भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था की यात्रा में बदलाव तो बहुत सारे हुए हैं लेकिन सिस्टम और स्वार्थ का लोकतंत्र पर बोझ कम नहीं हुआ है.

कंधे बदलने से बोझ कम नहीं होता. जनादेश कई बार बदल कर भी थका हुआ ही महसूस करता है. अब तो कंधे बदलने के लिए झूठ, फरेब, भ्रम और संवैधानिक मर्यादाओं को भी खंडित करने में सियासत पीछे नहीं रहना चाहती.