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विकसित देशों में भी जलवायु बदलाव ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Sat , 29 Feb

सार

विकसित देशों में भी जलवायु बदलाव के कारण अप्रत्याशित बेमौसमी, बाढ़ें, लू के थपेड़े, तूफान आपदाएं आई हैं..!

janmat

विस्तार

वर्तमान काल जलवायु आपातकाल कहा जा रहा हैं। दिल्ली सम्मेलन में भी गुटेरेस गत नौ सितम्बर, 2023 को संयुक्त राष्ट्रसंघ क्लाइमेट व एनवायरन्मेंट सेशन में चेता गये थे कि इस जलवायु आपदाकाल पर तुरंत काम किया जाना चाहिए। वे लगातार कह रहे हैं कि अब और तेल निकालना बंद किया जाना चाहिए। नये तेल उत्पादन के लिये न तो लाइसेंस दिए जाएं और न ही फंडिंग की जानी चाहिए।

राष्ट्रसंघ की यूनाइटेड एमिशन गैप रिपोर्ट के अनुसार पेरिस जलवायु समझौता प्रभावी रहे, इसके लिए 23 अरब टन कार्बन डाइआक्साइड की कटौती जरूरी है। अभी विभिन्न देशों के राष्ट्रीय स्तर पर तय सारे उत्सर्जन कटौतियों के शपथों को जोड़ा जाये तो कुल उत्सर्जन कटौती दो से तीन अरब टन की ही आती है। देशों ने अपने-अपने उत्सर्जन कटौती लक्ष्य आखिरी बार 2020 में घोषित किये थे। अब उन्हें यह 2025 में करना है।

विकसित देशों में भी जलवायु बदलाव के कारण अप्रत्याशित बेमौसमी, बाढ़ें, लू के थपेड़े, तूफान आपदाएं आई हैं। किन्तु विकसित देश आज भी जीवाश्म ईंधनों के फेजआउट का समर्थन नहीं करते हैं। फेजडाउन की बात भी आधी-अधूरी ही होती है। अनुमानतः उत्तर के पांच मुख्य विकसित देश- अमेरिका, कनाडा इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया व नार्वे वो देश हैं जहां 2050 तक आधे से ज्यादा नये तेल व गैस के कुएं खोदे जायेंगे। भारत व चीन में भी तेल व कोयला दोहन बढ़ोतरी पर है। विश्व बैंक ने भी हाल में ही इंडोनेशिया की एक बड़ी कोयला परियोजना को धन मंजूर किया है।

पृथ्वी का तापमान लगातार वृद्धि पर है इसलिये फॉसिल फ्यूल्स रोकने को लेकर वैश्विक जन दबाव भी बढ़ रहा है। आज पूरे विश्व में लाखों क्लाइमेट एक्टिविस्ट सक्रिय हैं। विश्व के राजनेताओं पर दबाव बनाने के लिए अमेरिका, यूरोप, अफ्रीका, दक्षिण पूर्वी एशिया में जीवाश्म ईंधन के उपयोग पर पूर्ण पाबंदी की मांग को लेकर प्रदर्शन व रैलियां निकाल, नये तेल व गैस के कुओं के खोदने का विरोध किया गया।सबसे ज्यादा चर्चित प्रतिरोध न्यूयार्क के रहे। संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस द्वारा 20 सितम्बर, 2023 को यूएन मुख्यालय न्यूयार्क में आयोजित विशेष नई क्लाइमेट एम्बिशन समिट पर दबाव बनाने के लिए वहां 10 सितम्बर से ही मार्च टू एण्ड फॉसिल फ्यूल्स प्रदर्शन आरंभ हो गये थे। मिडटाउन व मैनहैटन में रैलियां हुईं। जो बाइडेन नये जीवाश्म ईंधन प्रोजेक्टों को अनुमति देने हेतु निशाने पर रहे।

17 सितम्बर को संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय के नगर न्यूयार्क में भी मार्च टू एण्ड फॉसिल फ्यूल्स आयोजित हुआ। इसको चार सौ वैज्ञानिकों व पांच सौ से ज्यादा संगठनों का समर्थन था। फिलहाल लग यही रहा है कि राजनेताओं पर इन दबावों का असर नहीं पड़ा। उलटे प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई हुई।

25 नवम्बर, 2022 को भी स्वीडन में युवकों ने अपनी संस्था अरोरा के माध्यम से प्रदर्शन करते हुए स्वीडन सरकार पर यह आरोप लगाया कि जलवायु विषयों पर कुछ नहीं कर रही है, एक मुकदमा भी दर्ज किया था। ऐसा उस देश की न्यायिक प्रणाली में पहली बार हुआ, इसमें ग्रेटा थुनबर्ग भी थीं।

न्यूयार्क में क्लाइमेट एक्टिविस्ट ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र महासचिव भी अपनी नैतिक शक्ति का उपयोग कर राजनेताओं पर लगातार दबाव बढ़ा रहे थे। उन्होंने कहा कि नई क्लाइमेट एम्बिशन समिट में केवल वे ही नेता बोलेंगे जो पृथ्वी को बचाने के लिए गंभीर हैं। बड़े देशों को इस जलवायु विमर्श में आमंत्रित नहीं किया गया। इसमें चीन, अमेरिका व भारत सूचीबद्ध नहीं थे।

विकसित देश टेक्नोलॉजी और आर्थिक स्थितियों के कारण फॉसिल ऊर्जा को त्यागने की बेहतर स्थिति में हैं। किन्तु वे ऐसा करने को तैयार नहीं हैं। विकसित देशों की संवेदनहीनता देख महासचिव गुटेरेस ने इन देशों को पृथ्वी को तोड़ने वाला कहा था।

पोप फ्रांसिस भी कई सालों से पृथ्वी के हित में नैतिक ताकत बने हुए हैं। पोप 2015 के पेरिस समझौते के पहले ही तेल कम्पनियों व एक्टिविस्टों को जलवायु आपातकाल के प्रति चेता चुके थे। गत 4 अक्तूबर, 2023 को पोप फ्रांसिस ने कहा कि दुनिया को जलवायु संकट से निपटने के लिए बहुत बड़े बदलावों को करना होगा। नि:संदेह, 30 नवम्बर से 12 दिसम्बर, 2023 तक बड़े तेल उत्पादक यूएई की मेजबानी में दुबई होने वाली कॉप-28 को लेकर एक्टिविस्टों की चिंता बढ़ी है।