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 देश : क्या कोई रास्ता है आपके पास ?

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 19 May

सार

कुछ न हो तो कमसे कम सरकार निष्पक्ष जाँच जैसा तो कुछ कर ही सकती है, लेकिन सरकार अपने गुणों के बखान में व्यस्त है और जिन नागरिकों के हित में काम करना उसका कर्तव्य है,उन नागरिको की दशा में कोई सुधार परिलक्षित नहीं हुआ है..!

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विस्तार

प्रतिदिन विचार-राकेश  दुबे

18/10/2022

सोशल मीडिया पर सत्तारूढ़ दल का एक और प्रवक्ता  अब निशाने पर है | यह पिछले प्रवक्ता की तरह किसी टिप्पणी करने के लिए नहीं बल्कि सत्ता के दुरूपयोग और अवैध रूप से धनोपार्जन के आरोप से आरोपित हैं | यह सब तब हो रहा है जब वर्तमान केन्द्र सरकार हो अथवा राज्य सरकारें, हर सरकार भ्रष्टाचार के प्रति अपनी ‘ज़ीरो टालरेंस नीति’ की घोषणा करते थकती नहीं है । कुछ न हो तो कमसे कम सरकार निष्पक्ष जाँच जैसा तो कुछ कर ही सकती है, लेकिन सरकार अपने गुणों के बखान में व्यस्त है और जिन नागरिकों के हित में काम करना उसका कर्तव्य है,उन नागरिको की दशा में कोई सुधार परिलक्षित नहीं हुआ है |

प्रशन यह उठता है विभिन्न देशों के सूचकांक में भारत के दर्जे में कोई सुधार क्यों नहीं आता? सत्ता बदलती है, तो कुछ सत्ताच्युत खेवनहार स्वयं भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नज़र आते हैं। उन पर कार्रवाई होती है तो इसे राजनीतिक बदलाखोरी का नाम दे दिया जाता है। भ्रष्ट नेता सबूतों या कालेधन की बरामदगी के बावजूद अपना गुनाह कभी स्वीकार नहीं करते। जमानत पर रिहा हो जायें, तो फिर तप-त्याग का मुखौटा धारण कर ‘जन सेवा’ के लिए अपने आप को प्रस्तुत कर देते हैं। सामाजिक परिवेश कुछ ऐसा है तो इनके भाषणों का सिक्का फिर चलने लगता है और भीड़ फिर जुटने लगती है।

इन दिनों सरकार इज़ ऑफ डुइंग बिजनेस, और प्रशासन में आदेश- प्रतिआदेश की फालतू पेपरबाजी के हुड़दंग को रोक देने की घोषणाएं करते थकती नहीं, इसके विपरीत  दुनिया में हुए अंतर्राष्ट्रीय सर्वेक्षणों ने भी स्वीकार कर लिया है कि भारत के आम जन ने सम्पर्क संस्कृति और वाकफियत के असर को एक सामान्य स्थिति जैसा स्वीकार कर लिया है।  सवाल यह भी है क्यों नियम-कायदे फाइलों की शोभा बने रह जाते हैं और बिचौलिये  दलाली, कमीशनखोरी, नौकरशाही का चक्रव्यूह तोड़ने की जगह उस्की एक एक कुंजी बन जाते हैं? एक बार इस एजेंटवाद को कानूनी स्वीकृति दे देने की बात भी उठी थी। यह सब सवाल हमारे देश कि संस्कृति से जुड़े हैं, कोई इसका हल नहीं बताना चाहता |

देशभर में शार्टकर्ट संस्कृति ने अपने पैर जमा लिये हैं । मेहनत, अध्यवसाय और श्रम साध‌ना वर्तमान परिस्थितियों में असंबद्ध होते चले गये और सिफारिश और कदाचार ने उसकी जगह ले ली है । देखते ही देखते चोर दरवाजों से रंकों को राजा होते देखा जाने लगा। यह चोर दरवाजे राजनीति में खुले तो आयाराम गया राम का चलन नेताओं का सहज स्वभाव बन गया। विश्वास मत प्राप्त करना जहां विधायकों को  बाज़ार दे गया, वहां सत्ताधारियों को अपनी कुर्सी पुष्ट करने का एक  न्य और नायब तरीका। जनता के मुद्दे जहां के तहां खड़े हैं।  उनके समाधान नाम पर चिन्तन और समाधान के लिए संसद और विधानसभाओं के सत्र अवश्य होते हैं, लेकिन इन  जनप्रतिनिधि संस्थाओं में सत्तापक्ष और प्रतिपक्ष की नूराकुश्ती के अखाडानुमा  दृश्य साफ दिखतेहैं।इसी  हड़बोंग सत्रावसान हो जाते हैं, और  देश की आम जनता के समक्ष खड़ी समस्याएं उसी तरह विकट रूप धारण किये रहती हैं।

दुर्भाग्य देश का चुनाव तंत्र भी कुछ ऐसा है कि जो इस बात का पुरजोर समर्थक है, कि “आरोपी अभियुक्त नहीं होता, इसलिए जनता के दरबार में ये लोग पुन: प्रतिनिधि चुने जाने के काबिल हैं।“ जाहिर है ऐसे चुनाव जो धनबल, जनबल और बिना काम अधिकाधिक अनुकम्पा की घोषणाओं के बल पर लड़े जाते हैं, में ऐसे सबल व्यक्ति साधारण योग्यजनों को पीछे धकेल फिर चुने जाते हैं। बार-बार चुने जाने के बाद बढ़ती उम्र उन्हें भले ही निस्तेज कर दे तो उनके नाती-पोते हैं ही, उनकी विरासत संभालने के लिए। यह विरासत चाहे बरसों से आरोपों से दागदार रही हो, लेकिन अगर ये लोग अपने वोटरों के गलत-सही काम करवाने से सफल रहते हैं, तो उनकी या उनके वंश की लोकप्रियता में कोई अन्तर नहीं आता। चाहे मंचों से ये लोग परिवारवाद के विरुद्ध नारे लगाते ही क्यों दिखाई न दे जायें।

जनमानस ने तो मजबूरी में और भी बहुत कुछ स्वीकार कर लिया है। आर्थिक असमानता, वर्गभेद की विसंगति को नियति स्वीकार कर लिया है। बढ़ती महंगाई और गिरते जीवन आदर्शों को एक विडंबना के रूप में निम्न वर्ग ने भी स्वीकार कर लिया है। जरूरत है इस माहौल में सहज स्वीकार की जगह अस्वीकार के आक्रोश को एक नये सत्य की तरह उभरने की। कैसे उभरेगा यह सत्य? आपके पास कोई उत्तर हो तो देश हित में जरुर बताइए |