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‘नए भारत’ को जन्म देती क़वायदें 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 19 Jun

सार

प्रधानमंत्री का दूसरा कार्यकाल समापन की ओर बढ़ रहा है इस काल को सत्ता प्रतिष्ठान पर जीत हासिल करने में नहीं बल्कि उसे विस्थापित करने में गिना जाएगा..!

janmat

विस्तार

दिल्ली कलेवर बदल रही है,आज संसद भी नए भवन में प्रस्थान करेगी। प्रधानमंत्री का दूसरा कार्यकाल समापन की ओर बढ़ रहा है इस काल को सत्ता प्रतिष्ठान पर जीत हासिल करने में नहीं बल्कि उसे विस्थापित करने में गिना जाएगा,जो पूरे देश को नया रूप देने की उनकी व्यापक योजना का हिस्सा है।

इस व्यापक प्रयास का एक हिस्सा पुराने कुलीनों की रिहाइश पर कब्जा या उन्हें ध्वस्त करना भी है। थिंक टैंक और नागरिक समाज के विभिन्न संगठन जो अपने ढंग से काम करना चाहते थे उनकी फंडिंग रोक दी गई है या वहां ऐसे लोगों को तैनात कर दिया गया है जो सरकारी सोच विचार रखते हैं। अन्य संस्थानों से कहा गया है कि वे अपने बोर्ड और अपने चर्चा वाले पैनलों में सरकार के लोगों को स्थान दें।

बात दिल्ली से ही  जैसे जिमखाना क्लब का प्रशासन अब सरकार के पास है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को लगातार ऐसे कुलपतियों के अधीन रखा गया है जो संभव होने पर इसके चरित्र को बदल देंगे। जबकि उदारवादी शैक्षणिक संस्थान अशोक यूनिवर्सिटी को उदारवाद की सीमा समझा दी गई है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा जा रहा है । 

यह  ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ यानी भारत के विचार को फिर से बताना शामिल है। दिल्ली के वास्तु मानचित्र में परिवर्तन करके, नए कानूनों को हिंदी नाम देकर, नाम बदलने की होड़ और धर्मनिरपेक्ष स्थानों पर हिंदू छवियों और प्रतीकों को अधिक स्थान देकर सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि वह उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहचान को पीछे छोड़कर एक ‘नए भारत’ को जन्म दे रही है जिसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी सांस्कृतिक हैं। नाम बदलने के असर को लेकर चिंता देखने को मिल सकती है।

मुद्दा नाम परिवर्तन, सत्ता परिवर्तन और पहचान की राजनीति से परे जाता है। अब इस धारणा को चुनौती पेश की जा रही है कि यूरोपीय जागरण ने ऐसे विचार पेश किए जिनकी सार्वभौमिक वैधता है। उदाहरण के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समता और व्यक्ति के व्यापक अधिकारों को फ्रांस की क्रांति के समय उल्लिखित किया गया था और वे 150 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा पत्र में भी नजर आए।

भारत के संविधान ने मौलिक अधिकारों के साथ आत्मज्ञान के उन मूल्यों को प्रदर्शित किया। परंतु अलेक्सांद्र दुगिन जैसे रूसी विचारक तथा अन्य ने पश्चिमी सार्वभौमिकता को लोकप्रिय राष्ट्रवाद के विरुद्ध खड़ा किया तथा व्यक्तिगत अधिकारों को सामूहिक बेहतरी के समक्ष। तर्क यह है कि सार्वभौमिकता सांस्कृतिक अंतरों को समाप्त करती है, इसका प्रतिवाद यह होगा कि उदारवाद इन अंतरों से निपटने का मार्ग देता है।

सांस्कृतिक सापेक्षता परंपरा से जुड़े कई कुलीनों को स्वाभाविक रूप से आकर्षक लगती है हालांकि अब कोई भी ‘एशियाई मूल्यों’ की हिमायत नहीं करता। दिक्कत यह है कि सांस्कृतिक जड़ों वाली राजनीतिक व्यवस्था की खूबसूरती अक्सर उसे धारण करने वाले की आंखों में होती है। तमिलनाडु के राजनेताओं ने हाल ही में सनातन धर्म की परंपरा पर हमला किया।

चीन चाहेगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कन्फ्यूशियस के विचारों के अनुरूप सौहार्द का प्रवाह हो, लेकिन क्षेत्र के छोटे देश इस पर आपत्ति प्रकट कर सकते हैं। इस बीच व्लादीमिर पुतिन के मन में रूस और यूक्रेन के इतिहास, संस्कृति और पहचान का लेकर जो समझ है वह सब देख ही रहे हैं। जब कोई व्यक्ति संस्कृति में निहित हल की ओर देखता है तो उसे सावधान रहना चाहिए कि यह कहां जा सकता है।

अगर कोई इंगलहार्ट-वेल्जेल के विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र का रुख करे जो दो अक्षों पर चित्रित है तो भारत ने पारंपरिक से धार्मिक-तार्किक मूल्यों की ओर नैसर्गिक बदलाव को पलट दिया है। उसने अस्तित्व मूल्यों पर ध्यान केंद्रित किया है जो स्व अभिव्यक्ति के मूल्यों से अलग हैं। यह विश्लेषणात्मक ढांचा हमें समझा सकता है कि आखिर क्यों मोदी सरकार द्वारा दिया जा रहा सांस्कृतिक जोर उन लोगों को प्रभावित कर सकता है जो आत्म साक्षात्कारी कुलीनों का हिस्सा नहीं हैं।

भारत कभी विरोधाभासों से मुक्त नहीं रहा है। प्यू रिसर्च के 2017 के एक सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत बड़ी तादाद में भारतीय जहां लोकतंत्र की कीमत समझते हैं वहीं बड़ी तादाद में वे अधिनायकवादी और एक मजबूत नेता के शासन या सैन्य शासन को भी सही मानते हैं।