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राजनीति से सगाई फिर भ्रष्टाचार से कैसी बेवफाई?

सार

कभी भ्रष्टाचार के मामले में कांग्रेस सड़कों पर थी, आज आम आदमी पार्टी सड़कों पर है. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया शराब घोटाले में गिरफ्तार क्या हुए आप के नेताओं को लोकतंत्र में तानाशाही का आत्मबोध हो गया. जांच एजेंसी और अदालत केवल कहने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं बल्कि जन विश्वास तो यही है कि उन पर भरोसा किया जा सकता है. इन पर सवाल आम जनता तो उठाती नहीं है जब कभी नेता फंसता है तभी एजेंसियों पर राजनीतिक हस्तक्षेप और सरकार की तानाशाही के सवाल उठते हैं.

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विस्तार

तानाशाही की बात वैसे तो विपक्ष उठाता है लेकिन दिल्ली में दिल्ली की सरकार केंद्र की बीजेपी सरकार के खिलाफ तानाशाही का हल्ला बोल रही है. कोई भी नष्ट नहीं होना चाहता. हर आदमी प्रभावशाली पद पर सुखद और वैभव पूर्ण जीवन जीना चाहता है और राजनीति में शामिल लोगों का भी यही उद्देश्य होता है. मनीष सिसोदिया निर्दोष या गुनाहगार हैं, यह फैसला तो अदालत करेगी. जब तक अदालत का फैसला नहीं आता तब तक जांच एजेंसी की कार्यवाही पर ही भरोसा करना लोकतंत्र में आस्था का प्रतीक होगा.

भाजपा और आप के बीच छिड़ा राजनीतिक संघर्ष अपने चरम पर पहुंच चुका है. इस राजनीतिक लड़ाई में जांच एजेंसियों के अस्तित्व को उधेड़ा जा रहा है. उनकी मर्यादा को तार-तार किया जा रहा है. यह करने वाले कोई अनपढ़ गवार नहीं बल्कि देश की राजधानी में सरकार चलाने वाले लोग हैं. भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक आंदोलन तो लोकतंत्र की आत्मा नहीं कही जाएगी?

अब दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के साथ स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन के एक साथ इस्तीफे होने के भी अपने निहितार्थ हैं। सत्येंद्र जैन तो बीते नौ माह से जेल में रहकर भी मंत्री बने हुए थे लेकिन अब शायद यह लग रहा है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ बनी अरविंद केजरीवाल की पार्टी को सियासी शुचिता पर सद्बुद्धि आई है और देश में भ्रष्टाचार पर बन रहे परसेप्शन से वह सावधान हो गई है

भारत में लोकतंत्र के जन्म के साथ जिस पार्टी ने सरकारें संभाली थी उस कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में पारित किए गए संकल्पों में एक बात यह भी कही गई है कि देश में फैल रही पॉलिटिकल डिक्टेटरशिप का मजबूती से मुकाबला किया जाएगा. कांग्रेस और आप वैसे तो राजनीतिक दुश्मन हैं लेकिन बीजेपी की तथाकथित डिक्टेटरशिप से दोनों दल पीड़ित हैं. 

सोनिया गांधी और राहुल गांधी से ईडी द्वारा जब पूछताछ की जा रही थी तब आम आदमी पार्टी ने कांग्रेस का साथ नहीं दिया था. स्वाभाविक है कि आज जब आम आदमी पार्टी के डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया गिरफ्तार हुए हैं तो कांग्रेस भी राजनीतिक रूप से चुप ही रहना पसंद करेगी लेकिन दोनों सरकार की तानाशाही के मामले में जरूर एकमत हैं.

लोकतंत्र में तानाशाही के बीज अगर आज वृक्ष बन गए हैं तो क्या इसके लिए कांग्रेस अपने को जिम्मेदार नहीं मानती? देश में जब लोकतंत्र पैदा हुआ था तब से लेकर 50 साल तक कांग्रेस ने ही लोकतंत्र को पाला पोसा और बड़ा किया. आज ऐसी परिस्थितियों निर्मित हुई हैं कि कांग्रेस को और दूसरे राजनीतिक दलों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तानाशाह के रूप में देखना और कहना पड़ रहा है. लोकतंत्र के 75 साल की इस यात्रा में कहां गलतियां हो गईं और इन गलतियों के लिए कौन जिम्मेदार है कि आज लोकतांत्रिक ढंग से चुनी गई सरकार और नेता तानाशाही के आरोपी बताए जा रहे हैं?

पहले देश में राजनेता लोकतांत्रिक आंदोलनों से उभरते थे अब परिवारवाद और वंशवाद लोकतंत्र में सफल नेता बनने के उदाहरण बन गए हैं. इंदिरा गांधी को तो विपक्षी नेताओं द्वारा लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधी और तानाशाह कहा जाता रहा है. भारत में आपातकाल का जो बुरा दौर था उसे तो कोई भी लोकतंत्र का उजला चेहरा नहीं कह सकता? क्या सियासत में व्यक्तिवाद के वर्चस्व के लिए कांग्रेस जिम्मेदार नहीं है? अगर अब एक चुने हुए जनप्रतिनिधि पर व्यक्तिवाद के वर्चस्व का आरोप लग रहा है तो उसके लिए जिम्मेदार कौन है?

सरकार के माई-बाप होने की धारणा लोकतंत्र में कैसे विकसित हुई? जातिवाद के जहर को लोकतांत्रिक सिस्टम में सत्ता के लिए कैसे उपयोग किया जाने लगा? सरकारों ने डिवाइड एंड रूल की अंग्रेजों की नीति को भारतीय शासन व्यवस्था के संचालन में किस तरह से उपयोग किया? लोकतांत्रिक प्रक्रिया में आपराधिक तत्वों का बोलबाला कैसे हो गया? चुनाव की प्रक्रिया में 30-32 % समर्थन के साथ सरकारें कैसे बनने लगीं? चुनावी लोकतंत्र को गवर्नेंस की राजनीतिक पद्धति से ज्यादा धंधा क्यों माने जाने लगा है?

चाहे कांग्रेस हो या केजरीवाल हों, आज नरेंद्र मोदी को तानाशाह बताने की कोशिश कर रहे हैं. इन दोनों पार्टियों के संगठन में क्या संचालन की तानाशाही प्रवृत्ति दिखाई नहीं पड़ती है? दोनों पार्टियों में क्या उन नेताओं को किनारे नहीं लगा दिया गया जो अपने नेताओं के खिलाफ विचार और आवाज उठाने की ताकत रखते थे? राजनीतिक दलों से जब नेताओं को दूर जाना पड़ता है तो क्या वह लोकतांत्रिक तानाशाही का परिणाम नहीं होता है? कांग्रेस से तो न मालूम कितने वरिष्ठ नेता पार्टी छोड़ कर चले गए हैं. उन सभी नेताओं ने राहुल गांधी पर डिक्टेटरशिप का ही आरोप लगाया हुआ है. चुनावी प्रक्रिया में प्रत्याशियों के चयन में परिवारवाद और भाई भतीजावाद क्या राजनीतिक दलों की तानाशाही के कारण ही नहीं बढ़ता है?

भारत में कृषि कानूनों के विरोध में पहली बार बहुत लंबे समय के बाद जन आंदोलन हुआ था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब आंदोलनकारियों को समझाने में सफलता नहीं हासिल की तो बिना किसी दबाव के स्वयं झुकना मंजूर किया. तीनों कृषि कानूनों को वापस लिया गया. क्या यह राजनीतिक आचरण लोकतांत्रिक नहीं कहा जाएगा? क्या इस तरीके की प्रक्रिया को तानाशाही पूर्ण कहा जाएगा? भ्रष्टाचार के खिलाफ जांच के मामलों में आरोपियों के राजनीतिक वक्तव्यों का तो वैसे ही बहुत मतलब नहीं होता.

किसी की भी चरण वंदना करना है तो सामने जाकर झुक कर ही की जा सकती है. पीछे से कभी भी चरण वंदना नहीं होती. राजनीतिक दल और राजनेता लोकतंत्र की पीछे से चरण वंदना करने का भ्रम पाले हुए हैं. इसे चरण वंदना नहीं बल्कि लोकतंत्र पर लात मारना कहा जाएगा. अदालत और जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर बिना किसी तथ्य के सवाल उठाना क्या तानाशाही राजनीतिक प्रवृति नहीं है? किसी भी व्यक्ति को चाहे वह किसी भी तरह का आरोपी हो, जब तक न्यायिक फैसले नहीं आ जाएं किसी भी नेता को किसी को भी आरोपित करने की प्रवृत्ति को क्या तानाशाही नहीं कहा जाएगा? अडानी और मोदी को जोड़कर राजनीतिक आरोप क्या राजनीतिक नादानी और डिक्टेटरशिप की निशानी नहीं है?

सुख और दुख साथ-साथ चलते हैं. सुख का भोग किया है तो दुख भोगने से भी डरना नहीं चाहिए. सुख और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं. विचलित होकर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप, घृणा और क्रोध, विरोधी को नहीं बल्कि स्वयं को नुकसान पहुंचाते हैं. आज राजनीति में जो लोग असफल हो रहे हैं उन्हें अपने आकलन की जरूरत है.ऐसा तो नहीं कि उनके चिंतन की दिशा गलत हो? लोकतंत्र में पश्चाताप सबसे बड़ा अस्त्र होना चाहिए. दशकों तक सरकार चलाने वाले भी किसी गलती के लिए पश्चाताप करना पाप समझते हैं जबकि राजनेताओं के लिए यही पश्चाताप पुण्य बन सकता है.
 
राजनीति और भ्रष्टाचार आज पर्याय बन गए हैं. हो सकता है राजनीतिक दलों की मजबूरी होती हो लेकिन भ्रष्टाचार के मामलों में राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप जांच एजेंसियों को हतोत्साहित करते हैं. आज जो व्यक्ति राजनीति से सगाई कर रहा है, वह भ्रष्टाचार से बेवफाई करेगा ऐसा कोई भी मानने को तैयार नहीं है. राजनीति का धंधा आज सबसे तेजी से बढ़ता हुआ उद्योग बन गया है. राजनीतिक उगाही समाज के लिए चिंता का विषय बन गई है. भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए तानाशाही की जरूरत है और भारत ऐसे तानाशाह का दिल खोल कर स्वागत करने के लिए तैयार है जो लोकतंत्र से भ्रष्टाचार की बुराई को मिटाने में योगदान दे सके.