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समरसता विकास का पर्व - दशहरा

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 22 Jul

सार

नवरात्रि में हुई रामलीला में सुखद अहसास हुआ जब हर बरस की तरह इस बरस भी यह जानकारी उजागर हुई कि भारत के विभिन्न भागों में होने वाली रामलीलाओं में भारतीय समाज के विभिन्न  वगों के लोग गरिमा के साथ विभिन्न पात्रों का निर्वाह कर रहे हैं..!

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विस्तार

आज दशहरा है। ज्ञात इतिहास इसे दशरथ नंदन  श्री राम की लंका विजय से जोड़ता है। वैसे भारत में सदियों से भारत में राम-राम पुण्य स्मरण से लेकर आम आदमी के अभिवादन का अंग है। भारत की संस्कृति की पहचान है। रसखान परंपरा में ऐसे तमाम बड़ी सोच वाले लोग भी रहे हैं जिन्होंने सामाजिक एकता की दिशा में अनवरत सार्थक प्रयास किये। देश के तमाम गांवों में आज भी मिलने पर सभी संप्रदायों में राम-राम कहने का दस्तूर-सा है। 

निश्चित रूप से जब तक देश में सद्भाव व सकारात्मक सोच के लोग विद्यमान हैं तब तक विभाजनकारी ताकतें हमरी इस सांस्कृतिक विरासत को नुकसान नहीं पहुंचा सकती। नवरात्रि में हुई रामलीला में सुखद अहसास हुआ जब हर बरस की तरह इस बरस भी यह जानकारी उजागर हुई कि भारत के विभिन्न भागों में होने वाली रामलीलाओं में भारतीय समाज के विभिन्न  वगों के लोग गरिमा के साथ विभिन्न पात्रों का निर्वाह कर रहे हैं। अलगाव के राजनीतिक विमर्श के बावजूद कई प्रांतों से खबरें आती हैं कि राम लीलाओं में अनेक धर्म और उपासना पद्धति के उपासक पीढ़ी-दर-पीढ़ी विभिन्न किरदारों को मंच पर निभा रहे हैं। बताया जाता है कि उ.प्र. की राजधानी लखनऊ में ऐसा एक परिवार उदाहरण है, जो उपासना पद्धति में भेद के बावजूद  तीन पीढ़ियों से रामलीला मंचन में योगदान दे रहा है। जिनकी बड़ी सोच रही है कि भगवान किसी को तबके में नहीं बाँटता है। हम ऊपर वाले की रची एक जैसी रचनाएं हैं।

इसी तरह राजस्थान में सीकर, उदयपुर आदि में कई पद्धति के उपासक परिवार रामलीला में अभिनय से लेकर रावण बनाने के काम में दशकों से जुटे हैं। ऐसे ही कई उदाहरण उत्तर प्रदेश के बनारस, अमरोहा, बरेली, बागपत व हरियाणा के फरीदाबाद में भी देखने में आए हैं। कहीं वे लक्ष्मण का किरदार निभा रहे हैं तो कहीं हनुमान का। कहीं मिश्रित भाषा में रामलीला के संवाद लिखे जा रहे हैं तो कहीं वे मंच पर नहीं तो मेकअप आर्टिस्ट का किरदार निभा रहे हैं।

निश्चित तौर पर जिस देश में सब मिलकर अपनी सांस्कृतिक जड़ों को सींच रहे हैं, वहां वैमनस्यता व कटुता के लिये कोई जगह नहीं हो सकती है। कई संघ के नेता जब कहते हैं कि हम सब के वंशज विशुद्ध भारतीय थे तो उसकी तार्किक वजह है। निस्संदेह, हमारे आराध्य व पूजा पद्धति भिन्न होने का मतलब सामाजिक कटुता कदापि नहीं हो सकती। हर धर्म सही मायनों में धार्मिक सहिष्णुता का ही प्रतीक रहा है। दुनिया में विशाल हिंदू धर्म अपनी इस खासियत के लिये जाना जाता है कि उसने विश्व की तमाम संस्कृतियों व धर्मों को खुद में समाहित करके अपना विस्तार किया है। इतना ही नहीं अन्य धर्मों के आराध्यों को भगवान का दर्जा देकर भिन्न-भिन्न आस्थाओं का सम्मान किया है। पारसी व अन्य कई धर्म जो दुनिया में लुप्तप्राय हो चले हैं, उनका भारत में फलना-फूलना हमारी धार्मिक साहिष्णुता का पर्याय ही है। निस्संदेह, किसी भी उपासना पद्धति के अच्छे लोग भी होते हैं और बुरे लोग भी। ऐसा में किसी उपासना पद्धति के प्रति दुराग्रह बना लेना कतई न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता। कितना अच्छा हो कि लोग हर त्योहार पर गले मिलें । हम इस देश के नागरिक हैं और सबको यहीं रहना है। तो क्यों न सद्भाव व समरसता की सोच के साथ ही रहा जाए। ये वक्त की जरूरत भी है और समरसता के विकास की अनिवार्य शर्त भी।

सबको दशहरे की राम -राम !