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आम चुनाव, आरक्षण और राजनीतिक दल 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 05 Mar

सार

क्रीमी लेयर के कारण आरक्षण का फायदा एक निश्चित दायरे तक सिमट कर रह गया। यह वर्ग लगातार इसका फायदा उठाते हुए वंचितों को मौका नहीं दे रहा है..!!

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विस्तार

इसे क्या कहें भारत के किसी भी राजनीतिक दल ने कभी भी आरक्षण की हकीकत से पर्दा उठाने का प्रयास नहीं किया। इसके बावजूद आरक्षण के कारण देश की एकता-अखंडता में न सिर्फ दरारें चौड़ी हुई हैं, बल्कि देश को आर्थिक तौर पर इसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी है। यहां तक कि क्रीमी लेयर को लेकर भी राजनीतिक दल चुप्पी साधे रहे। 

इसके कारण संविधान प्रदत्त व्यवस्था होने के बावजूद आरक्षण का फायदा आरक्षित वर्ग में समान रूप से नहीं मिल पाया। क्रीमी लेयर के कारण आरक्षण का फायदा एक निश्चित दायरे तक सिमट कर रह गया। यह वर्ग लगातार इसका फायदा उठाते हुए वंचितों को मौका नहीं दे रहा है। आरक्षण का ही परिणाम है कि मणिपुर हिंसा की आग में रह-रह कर सुलग रहा है। विपक्षी दलों ने इस हिंसा के लिए केंद्र और मणिपुर सरकार को कटघरे में खड़ा करने में कसर बाकी नहीं रखी, किन्तु आरक्षण सही या गलत, इस पर विपक्ष के किसी भी दल में बोलने का साहस नहीं हुआ। 

इस बार सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के फायदे के औचित्य पर सवाल उठा कर इससे बचने वाले राजनीतिक दलों के गले में घंटी बांध दी है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह अपने 2004 के एससी-एसटी आरक्षण को लेकर दिए गए फैसले की फिर से समीक्षा करेगा। इस फैसले में कहा गया था कि राज्यों के पास आरक्षण देने के लिए अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए सब-कैटेगरी बनाने का अधिकार नहीं है। मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली सात जजों की संविधान पीठ ने स्पष्ट किया कि वह आंकड़ों से संबंधित तर्कों में नहीं जाएगी, जिसके कारण पंजाब सरकार ने आरक्षण के अंदर 50 प्रतिशत कोटा प्रदान किया था।

इस मामले की सुनवाई के दौरान ही जस्टिस बीआर गवई ने नौकरशाहों के बच्चों को आरक्षण मिलने को लेकर सवाल किया। साल 2006 में पंजाब की कांग्रेस सरकार ने वाल्मीकि और मजहबी (सिख) समुदाय को महादलित का दर्जा दिया था। इसके तहत अनुसूचित जनजाति के 15 फीसदी आरक्षण में से आधा हिस्सा उनके लिए रिजर्व रखने का फैसला किया गया। इस तरह पंजाब में दो समुदायों को अनुसूचित जाति में प्राथमिकता मिली, लेकिन साल 2010 में पंजाब हाई कोर्ट ने इसे खारिज कर दिया। वर्ष 2011 में पंजाब सरकार ने हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि पिछड़े वर्गों में सबसे पिछड़ों की पहचान की जानी चाहिए और उन्हें रोजगार के अवसरों का लाभ उठाने के लिए साधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ दाखिल 23 याचिकाओं पर सुनवाई चल रही है। इनमें पंजाब सरकार की याचिका भी शामिल है। 

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डीवाई चंद्रचूड़, जस्टिस बीआर गवई, जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस बेला एम. त्रिवेदी, जस्टिस पंकज मिथल, जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस सतीश चंद्र मिश्रा की बेंच ने सुनवाई की। इस दौरान जस्टिस गवई ने सवाल किया, ‘अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति समुदाय का शख्स आईएएस, आईपीएस जैसी केंद्रीय सेवाओं में शामिल होता है तो उसको सर्वोत्तम सुविधाओं का लाभ मिलता है। फिर भी उसके बच्चे और उनके बच्चों को आरक्षण मिलता रहता है। क्या यह जारी रहना चाहिए?’ जस्टिस बीआर गवई भी दलित हैं और अगले साल मई में चीफ जस्टिस बनने जा रहे हैं। पंजाब सरकार ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का 2004 का फैसला उस पर लागू नहीं होता है। जस्टिस गवई ने आगे कहा, ‘गांव में रहने वाला कोई व्यक्ति अगर आईएएस-आईपीएस बन जाता है तो उसके बच्चों को गांव में रहने वाले अन्य बच्चों की तरह की कठिनाइयां नहीं झेलनी पड़ती।इसके बावजूद वो परिवार पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ पाता रहता है।’ उन्होंने यह भी कहा कि ये संसद को तय करने दें कि ‘मजबूत और प्रभावी’ समूहों को आरक्षण की सीमा से बाहर निकालना है या नहीं। 

पंजाब हाईकोर्ट ने पंजाब के कानून की धारा 4 (5) को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया था जो वाल्मीकियों और मजहबी सिखों को अनुसूचित जाति के 15 फीसदी आरक्षण का 50 फीसदी हिस्सा देती थी। कोर्ट ने कहा था कि यह प्रावधान ईवी चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में सुप्रीम कोर्ट के 2004 के पांच सदस्यीय संविधान पीठ के फैसले का उल्लंघन करता है। चिन्नैया संबंधी फैसले में कहा गया था कि अनुसूचित जातियों का उप-वर्गीकरण संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का उल्लंघन करेगा। पंजाब सरकार ने हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए 2011 में उच्चतम न्यायालय का रुख कर कहा था कि शीर्ष न्यायालय का 2004 का फैसला उस पर लागू नहीं होता है। 

पंजाब सरकार की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस (अब सेवानिवृत्त) अरुण मिश्रा की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय पीठ ने 27 अगस्त 2020 को चिन्नैया फैसले से असहमति जताई थी और इस मामले को सात सदस्यीय वृहद पीठ के पास भेज दिया था। केंद्र सरकार द्वारा वित्त पोषित उच्च शिक्षण संस्थानों में 22.5 प्रतिशत उपलब्ध सीट अनुसूचित जाति और 7.5 प्रतिशत सीट अनुसूचित जनजाति (एसटी) के छात्रों के लिए आरक्षित हैं। यही और हरियाणा जैसे राज्यों में अनुसूचित जनजाति की मानदंड सरकारी नौकरियों के मामले में भी लागू होता है। 

देश में आरक्षण का इतिहास रक्तरंजित रहा है। राजनीतिक दलों ने इसकी आग में राजनीतिक रोटियां सेंकने का काम किया है। ओबीसी आरक्षण के खिलाफ आरक्षण की आग में देश कई बार झुलस चुका है। बहरहाल सुप्रीम कोर्ट का फैसला राजनीतिक दलों की कलई खोलेगा कि किस तरह से निहित स्वार्थों के लिए क्रीमी लेयर को बाहर नहीं किया गया।