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‘पंक्ति  में खड़े अंतिम आदमी’ की भी खबर लीजिये 

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Tue , 20 Apr

सार

देश का हर नागरिक कोरोना प्रतिबंधों से मुक्त होने के बाद देश के आर्थिक विकास की उम्मीद कर रहा था ,लेकिन यह विकास क्या सार्वजनिक क्षेत्र की जगह निजी क्षेत्र के प्रभुत्व से बनेगा, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी..!

janmat

विस्तार

० प्रतिदिन विचार-राकेश दुबे

27/12/2022

मध्यप्रदेश भाजपा के एक बड़े नेता, पूर्व मंत्री  “प्रतिदिन” के कुछ पिछले अंकों से नाराज हैं। अपना रोष व्यक्त करते हुए उन्होंने भारत सरकार के कुछ आंकड़ों तक को पूर्वाग्रही साबित करने तक से गुरेज़ नहीं किया। उनका अध्ययन क्षेत्र और दृष्टिकोण वे जानें। बेचारे, मेरे इस सवाल का जवाब नहीं दे सके कि “देश में विकास की गति को तीव्र करने का अर्थ क्या चुनिंदा लोगों का अरबपति से खरबपति हो जाना है? यह विषय कोरोना दुष्काल की गुजरी लहरें और आगामी संकेत पर उनसे हुई बातचीत से उद्घृत हुआ था। मैं क्या देश का हर नागरिक  कोरोना प्रतिबंधों से मुक्त होने के बाद देश के आर्थिक विकास की उम्मीद कर रहा था ,लेकिन यह विकास क्या सार्वजनिक क्षेत्र की जगह निजी क्षेत्र के प्रभुत्व से बनेगा, इसकी किसी को उम्मीद नहीं थी।

वास्तव में आज देश में एक ओर धनकुबेरों की एक जमात है, जो निरंतर बढ़ रही है। उनका अनुसरण और भी बहुत से लोग करने में लगे हैं जो अपनी झोंपड़पट्टी को प्रासादों में तब्दील कर देना चाहते हैं। इसका परिणाम क्या? भारत पूरी दुनिया में नैतिकता का अलम्बरदार रहा है । हाल में जी 20 में अपनी अध्यक्षता शुरू करते हुए नरेंद्र मोदी ने भी ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ कहा। सवाल यह है यह है देश में कहां है यह आदर्श? निश्चय ही रोज बनती खबरों की निर्ममता इस भौतिकवादी समाज को आदर्शविहीन कर रही है। धन के लोभ में अच्छे-बुरे का ख्याल किए बगैर भारत के लोग जिस माहौल का सृजन कर रहे हैं, उस वातावरण की खबरें दिल दहला देती हैं। आज केवल एक ही सवाल उभरता है कि भौतिकवादी होते-होते, तरक्की को तलाश करते-करते हमारा यह देश क्या पूरी तरह से अपनी पहचान खो देगा? जो पहचान नैतिक मूल्यों की रही है, सादा जीवन और उच्च विचार की रही है। 

नरेंद्र मोदी से लेकर संघ प्रमुख मोहन भागवत के भाषणों से तो यही प्रतिध्वनित होता है कि देश अपनी इस पहचान को खोना नहीं चाहता। अपनी जड़ों की ओर लौटकर आदर्शों को बचाना चाहता है। लेकिन ये रोज उभरती खबरें क्या हैं? आफताब द्वारा श्रद्धा का निर्मम कत्ल, झारखंड के साहिबगंज में एक व्यक्ति को अपनी पत्नी के शव के कई टुकड़े करके फेंकने का आरोप । एक इंसान के शरीर को टुकड़े-टुकड़े कर बिखेर देना एक ऐसी निर्ममता है जिसे सुनकर लोगों ने सोचा था कि अब ऐसा फिर न हो तो अच्छा। लेकिन यह तो लगातार हो रहा है। जब ऐसे कातिलों के चेहरे मीडिया के जरिये प्रसारित होते हैं तो उन पर कहीं भी पछतावे की छाया नहीं होती। हत्यारोपी कई बार मुस्कुराते नजर आते हैं।

दु:खद बात यह है कि आज निर्ममता और  मूल्य हीनता आदमी के जीवन का अभिन्न अंग बनती जा रही है। कई राज्यों में बंदूक और पिस्तौल का युग रच दिया गया है। रोज गैंगस्टरों के साथी गिरफ्तार हो रहे हैं और उनसे हथियार बरामद किए जाते हैं। इसे बढ़ावा देने को पड़ोसी शत्रु देश द्वारा हथियार, नशा और अन्य अव्यवस्था फैलाने वाली सामग्री फेंकने के लिए ड्रोन का इस्तेमाल किया जाता है। सरहद पर नशा माफिया, आतंकी गिरोह और चंद भ्रष्ट अधिकारी मिलीभगत में नजर आ रहे हैं। जेल अपराधियों के पर्यटन स्थल बन गए लगते हैं। सरकार की ओर से जेलों पर जैमर लगाने या उन्हें कम्युनिकेशन रहित करने के दावों के बावजूद गुंडा तत्वों द्वारा जेलों के प्रांगण से ही हत्याओं और फिरौती मांगने के षड्यंत्र रचे जाने के समाचार आते रहते हैं। यह सब क्या है ? धनकुबेरों के पोषण के अतिरिक्त सरकार के कुछ और भी दायित्व है। जिसे सरकार, सत्तारूढ़ दल और उसके कार्यकर्ताओं को समझना जरूरी है।

सवाल अह है अभी तक सकारात्मक बदलाव क्यों नहीं लाया जा सका? दोषी कई हैं। लेकिन सबसे बड़ा दोष तो धनलोभ है। इसी धनलोभ के कारण अनहोनी बातें हो रही हैं। इसके विरोध में जनता की सबल आवाज नहीं उठती। वह जीवन के लिए जरूरी मूलभूत चीजों की जुगत में ही लगी है । आज जनता के लिए प्राथमिकता है नौकरी ,महंगाई नियंत्रण की, भ्रष्टाचार उन्मूलन की। वह तो होता नहीं और यह नासूर समाज के अंग-प्रत्यंग में फूटता नजर आने लगा। अगर समाज को नैतिक मूल्यों और गुजरे जमाने के आदर्शों को फिर से स्थापित करना है तो उसके लिए पहले आम आदमी की जरूरतों को पूरा किया जाए।अरबपति को खरबपति बनाने की जगह “पंक्ति  में खड़े अंतिम आदमी” के कल्याण की भावना बलवती हो, जिसे सत्तारूढ़ दल के पूर्वज इंगित कर चुके हैं।