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गांवों को भी दें, उत्तम स्वास्थ्य सेवा

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Wed , 22 Apr

सार

बीमार भारत भी अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य दिवस की 72 वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शामिल होने जा रहा है..!

janmat

विस्तार

बीमार भारत भी अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य दिवस की 72 वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम में शामिल होने जा रहा है| यह अलग बात है आज़ादी के ७५ वर्ष बाद भी देश की गाँव में बसने वाली ७० प्रतिशत आबादी उत्तम तो दूर सामन्य स्वास्थ्य सेवा से महरूम है। कहने को मोहल्ल्ला क्लिनिक की तर्ज पर मध्यप्रदेश में पहले संजीवनी और अब मुख्यमंत्री स्वास्थ्य केंद्र का जालगाँव-गाँव तक फैला है, परन्तु इन केंद्रों पर संपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं का आज भी अभाव है। ये स्वास्थ्य केंद्र नर्सिंग कर्मियों के भरोसे चल रहे हैं। कोरोना दुशाक्ल के दौरान मध्यप्रदेश ही नहीं देश और ग्लोबल स्तर पर यही सीख मिली थी कि स्वास्थ्य ढांचे को सुदृढ़ बनाना चाहिए। इस महामारी काल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सभी देशों की स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली खुलकर सामने आई थी । भारत की दशा किसी से छिपी नहीं है |

भारत अंतर्राष्ट्रीय स्वास्थ्य दिवस की ७३ वीं वर्षगांठ मनाने के कार्यक्रम में शिरकत कर रहा है । हर साल दुनियाभर में इस दिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं में विस्तार व सामाजिक स्तर पर जागरूकता लाने के लिए विभिन्न कार्यक्रम आयोजित करवाए जाते हैं। वर्ष २०२२ विश्व स्वास्थ्य दिवस की थीम ‘हमारा ग्रह हमारा स्वास्थ्य’ है।डब्यूजातेएचओ के अनुसार, किसी व्यक्ति का शारीरिक, सामाजिक व मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना स्वास्थ्य कहलाता है। कोविड दुष्काल के दौरान शारीरिक के साथ मानसिक रोगों में वृद्धि देखने को मिली है ।

अभी देश में त्रि-स्तरीय स्वास्थ्य प्रणाली है, सर्वप्रथम ग्रामीण स्तर पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, शहरी क्षेत्रों में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र व डिस्ट्रिक्ट लेवल पर जिला अस्पताल होता है। इसमें सबसे महत्वपूर्ण कड़ी प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र है क्योंकि देश की ७० प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है। इन केंद्रों पर संपूर्ण स्वास्थ्य सुविधाओं का आज भी अभाव है। सीएचसी पर विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी के चलते आम जनता को परेशानियां होती हैं।

देश के नागरिकों के उत्तम स्वास्थ्य के लिए चिकित्सा सिद्धांतों में बदलाव लाना होगा। हम क्यूरेटिव हेल्थ पर जोर देते हैं, जिसका अर्थ रोग का शमन करना होता है| प्रिवेंटिव हेल्थ और प्रमोटिव हेल्थ की हम उपेक्षा कर देते हैं। प्रिवेंटिव हेल्थ अर्थात्ा रोगों से बचाव के उपाय करना। इसमें सबसे मुख्य प्रमोटिव हेल्थ है यानी स्वस्थ व्यक्ति के स्वास्थ्य की रक्षा करना और आरोग्य को बढ़ावा देना तथा आदर्श जीवनशैली का पालन करना। आयुर्वेद का तो सिद्धांत ही यही है। आज भारत स्वास्थ्य क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहा है। देश में कुल१३ लाख पंजीकृत एलोपैथी डॉक्टर हैं, जिसमें ८० प्रतिशत प्रैक्टिस कर रहे हैं। इसके अलावा करीब साढ़े पांच लाख आयुष डॉक्टर भी हैं। फिर भी जनसंख्या के अनुपात में कमी है |

नीति आयोग द्वारा ‘विजन२०३५ : भारत में जन स्वाकस्य्ैं निगरानी’ नाम से एक श्वेंत पत्र जारी किया गया है जो त्रिस्तोरीय जनस्वानस्य्ी व्य्वस्थास को आयुष्माकन भारत की परिकल्प ना में शामिल करते हुए जन स्वा स्य्ल् निगरानी के लिए भारत के विजन २०३५ को दर्शाता है। यह दस्तावेज विस्तारित रेफरल नेटवर्क और प्रयोगशाला-क्षमता बढ़ाने की जरूरत भी प्रदर्शित करता है।

वैसे देखें तो देश के हेल्थ इंडेक्स में दक्षिण भारतीय राज्यों का दबदबा कायम है । इनमें केरल प्रथम पायदान पर, उसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश सर्वोत्तम स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने में आगे रहे है । सर्वे में उत्तर प्रदेश निचले पायदान पर रहा जहां स्वास्थ्य ढांचे में विस्तार की जरूरत है, तो मध्यप्रदेश का स्थान भी उत्तरप्रदेश के आसपास ही है । भारत में स्वास्थ्य क्षेत्र को सुदृढ़ बनाने के लिए वित्तीय वर्ष २०२२ में ८६ हजार करोड़ का बजट आवंटित किया गया है | इसे लेकर सरकार खुश है कि उसने बीते वर्ष की तुलना में १६ प्रतिशत अधिक राशि आवंटित की है । जनसंख्या अनुपात और बीमार ढांचे के अनुसार यह आवंटन अपर्याप्त है |

यूँ तो मेंटल हेल्थकेयर को बढ़ावा देने के लिए नेशनल टेलीमेडिसिन प्रोग्राम की घोषणा की गई जिसके तहत सभी नागरिकों के लिए यूनीक हेल्थ कार्ड बनाएं जायेंगे, पर कब ?। इसके अलावा स्वास्थ्य मंत्रालय द्वारा नेशनल हेल्थ मिशन (एनएचएम), राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनआरएचएम), आयुष्मान भारत योजना सहित स्वास्थ्य व्यवस्था की प्रगति के लिए कई कार्यक्रम तो बनाये हैं, इम्मंदारी से अमल जरूरी है । यूँ तो आयुष्मान भारत योजना में कमजोर वर्ग के लोगों को हेल्थ इंश्योरेंस की सुविधा मिलती है। इसके तहत देश के 10 करोड़ परिवारों को सालाना 5 लाख रुपये का स्वास्थ्य बीमा का प्रावधान है।इस पर निगहबानी जरुरी है, जिसका अभी अभाव है |  आयुष मंत्रालय द्वारा वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियों के विस्तार पर जोर देकर गाँव में बसने वाली ७० प्रतिशत आबादी को उत्तम स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराने का मिशन चलाना चाहिए