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सद्भाव की परीक्षा: खरगोन फेल भोपाल पास..!

सार

2022 में गुड़ी पड़वा से लेकर रामनवमी और श्रीहनुमान जन्मोत्सव तक हिंसा और शांति की जो कहानियां सुनाई दी, जो घटनाएं घटी वे बताती हैं यदि सुरक्षा एजेंसियां और उनके इनपुट दमदार हैं, पुलिस - प्रशासन सख्त है तो फिर परिंदा भी पर नहीं मार सकता..!

janmat

विस्तार

हिंदुस्तान की जनता बेहद होशियार है। वह हुकूमत की मंशा और हुक्मरानों का रुख देखकर काम करती है। वरना दंगे के मामले संवेदनशील,ज्वलनशील खरगोन में पुलिस- प्रशासन कोई दूध पीता बच्चा तो था नही। वह लापरवाह रहा, शरारती तत्व समझ गए कि हिंसा में हाथ सेंकने है। सो पुलिस सोती रही और दंगाई शहर को जलाते रहे। उसके बाद भड़भड़ा कर जागा प्रशासन और सरकार सख्त हुई तो गिरफ्तारियों के साथ मकानों पर धड़ाधड़ बुलडोजर चलने लगे।

 अब लगे हाथ अतिक्रमण और अवैध निर्माण पर भी बात हो जाए। अवैध निर्माण और अतिक्रमण रोकने के लिए भी नगर पालिका और नगर निगमों में अतिक्रमण विरोधी दस्ता, सिटी प्लानर और उनकी भारी भरकम वेतन भत्ते वाली एक पूरी फ़ौज होती हैं। क्या ये सब भृष्टाचार और हफ्ता वसूली की दुधारी टीम होती है। अवैध निर्माण और अतिक्रमण का अपराध कराने वाली इस टीम और उनके अफसरानों पर भी बर्खास्तगी का बुलडोजर चलने की सबको प्रतीक्षा है। अवैध निर्माण में देश का लोहा,सीमेंट,गिट्टी,रेत और श्रम भी लगा होता है। जब इसे तोड़ा जाता है तो यह भी देश का नुकसान है। इसके लिए जिम्मेदार अफसरों पर देशद्रोह के मुकदमे दर्ज कर उन्हें सलाखों के पीछे करना चाहिए। राजधानी भोपाल तक की भी कुछ ऐसी ही कहानी है। गर हुकुमत जाग रही है तो इस थोड़े को बहुत समझने की जरूरत है। 

 खरगोन की हिंसा और निमाड़-मालवा के तनाव से भोपाल प्रशासन, पुलिस कमिश्नर और उनकी टीम को शांति बनाए रखने के लिए बधाई और आगे यह भाईचारा बना रहे इसके लिए शुभकामनाएं। पांच दिन की मेहनत, पांच सौ से ज्यादा अलग- अलग वर्ग और सम्प्रदायों के नेताओं संग बैठक तालमेल और समन्वय। आपसी आपत्तियों का निराकरण। शोभा यात्रा के बीच नवाज, अजान और रोजा अफ्तारी के समय का टकराव नही होना। डीजे बजाने और एक शोभायात्रा की सशर्त अनुमति। जो गलती खरगोन में हुई उससे सबक। गलियों को बेरिकेट्स से बंद करना। सड़कों से पत्थर साफ कराना शामिल था। शोभायात्रा का सम्पूर्ण मार्ग ड्रोन की निगरानी  में  रखा गया । 

तब कहीं जाकर सब कार्य शांति से सम्पन्न हुए। गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा जिनकी छबि खरगोन ने खराब कर दी थी उसे भोपाल पुलिस व प्रशासन ने पूरी तरह धुलने से बचा लिया। पुलिस महानिदेशक ने भी पुलिस कप्तानों को अहम नसीहत दी है कि वे दिन में एकबार खुफिया पुलिस से सम्पर्क कर उनके इनपुट पर कार्रवाई करें। राजस्थान में आतंकी वाहनों की चेकिंग में पकड़े जाते हैं और उनके तार मप्र के रतलाम से जुड़ते हैं। भोपाल में ऐशबाग थाने के पास बांग्लादेशी आतंकी संगठन के लोग स्लीपर सेल तैयार करते पकड़े जाते हैं। यह मामला बहुत बड़ा है और हैरत की बात यह है कि भोपाल पुलिस को इसकी भनक तक नही थी। ये टोटल इंटेलिजेंस का फेलियर है।

ऐसे में पुलिस को मालवा- निमाड़ और भोपाल में संजीदगी के साथ गहराई से सतत काम करने की जरूरत है। मूलतः भोपाली कल्चर और कैरेक्टर जिंदादिली और बतोलेबाजी का है। लंबी फेंकने के चक्कर मे वह बहलावे में आ जाता है। ऐसे में पुलिसिंग सख्त हो और शहर में आनेजाने वालों की निगरानी, वाहनों की तलाशी, संदिग्ध लोगों और इलाकों में सर्चिंग अभियान चले तो अपराध और आतंक से जुड़े गिरोह बोरिया बिस्तर बांध लेंगे। भोपालियों की फितरत है कि वह बहुत दिन तक लड़ झगड़कर रह ही नही सकते। इसीलिए यहां लंबे समय तक अलगाव और हिंसा फैलाने वालों की दाल नही गल पाती।

बस सरकार का इकबाल बुलंद रहना चाहिए। 

भाईचारा बहुत कुछ सियासी नेता और उनके दल तय करते हैं। फिर चाहे प्रदेश में खरगोन हो या भोपाल हिंसा और शांति सद्भाव यहां केस स्टडी हो सकते हैं। राष्ट्रीय परिवेश में इसे कुछ इस तरह समझा जा सकता है। मसलन कश्मीर में धारा 370 हटाने से लेकर तीन तलाक पर रोक और उत्तर प्रदेश के चुनाव नतीजे के बाद शांति और सौहाद्र बताता है कि सरकार सख़्त है, प्रशासन सजग और पुलिस सक्रिय है तो जनता में एकता है और भाईचारा भी है। 

रास नही आई मसूद - कोठारी की जुगलबंदी...

भोपाल में मौका था 14 अप्रैल अंबेडकर जयंती का। इस दौरान रैली में कांग्रेस विधायक आरिफ मसूद के साथ भाजपा नेता राहुल कोठारी का मोटरसाइकिल पर घूमना भाजपा और राष्ट्रवादी संगठनों को रास नहीं आया बजरंग दल के एक नेता ने यह कहते हुए कि जब मसूद वंदे मातरम का गान नहीं करते और भारत माता की जय नहीं बोलते तो उनके साथ राहुल कोठारी को घूमने की क्या जरूरत थी इसके विरोध में उन्हें कोठारी और मसूद के लगे पोस्टर पर उनके मुंह पर काली स्याही पोती। दोनों नेताओं की इस जुगलबंदी को अगली विधानसभा चुनाव से जोड़कर देखा जा रहा है दरअसल जिस क्षेत्र से मसूद विधायक है राहुल कोठारी वहां से चुनाव लड़ने की इच्छा रखते हैं जबकि मसूद पुराने भोपाल की उत्तर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ने की ख्वाहिश रखते हैं। फिलहाल वहां से कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री आरिफ अकील विधायक हैं। 

चर्चा में है एक बड़े नेता की पत्नी का सद्भावना ट्वीट

देशभर में सांप्रदायिक हिंसा और तनाव को लेकर भाजपा वर्सेस ऑल है । तब प्रदेश भाजपा के बड़े नेता की विदुषी पत्नी का मेडिकल स्टोर के मालिक का सौहार्दपूर्ण व्यवहार का ट्वीट खूब चर्चाओं में है। दरअसल रात के 11:30 बजे उन्हें दवा की जरूरत थी। वह अपने ड्राइवर के साथ बाजार जाती हैं और उन्हें सारी दुकाने बंद मिलती है। ऐसे में जो एक दुकान खुली मिलती है उसके विक्रेता दवा देने में मदद करते हैं। बस यही खूबी नेता पत्नी को रास आती है। जिसका वे अपने ट्विटर हैंडल पर उल्लेख करती हैं । बाद में आलोचना होने पर उसे हटा भी लेती है। लेकिन राजनीति में किसी बड़े नेता के परिवार से टि्वटर, फेसबुक, व्हाट्सएप या इंस्टाग्राम पर कोई बात निकले और वह दूर तक ना जाए ऐसा मुमकिन ही नहीं है। सो एक अल्पसंख्यक मेडिकल स्टोर के मालिक की तारीफ खूब सुर्खियों में है।

हिंसा होने पर एसपी - कलेक्टर की रवानगी होनी चाहिए...

खरगोन और उसके आसपास के इलाकों में हुई सांप्रदायिक  हिंसा ने सबको चौंका दिया। राम नवमी की शोभा यात्रा पर हुए पथराव और गोलीबारी की घटना ने पुलिस के साथ प्रशासन के बुरी तरह असफल होने की दागदार तस्वीर पेश की है । दंगाईयों को काबू में करने के लिए सिर्फ एक निहत्था सिपाही पुलिस प्रशासन की कलई खोलने के लिए पर्याप्त है। बहुत संगीन मामला है। इस पर तबादले के साथ जिम्मेदारों पर मुकदमे तक दर्ज किए जाने चाहिए। हालांकि अब जमाना ऐसा तो नहीं है कि किसी महकमें में लापरवाही हो और इस्तीफा मंत्री का हो जाए। नैतिकता के ऐसे मापदंड मोटी चमड़ी की सियासत करने वालों पर अन्याय होगा।

लोग कहेंगे भला ऐसा अब कहां होता है किस में है इतना साहस ? लेकिन कोई ऐसा माई का लाल हो तो आज की पीढ़ी भी कुछ दशकों तक ऐसे पानीदार नेताओं का स्मरण करने और उदाहरण देने का सौभाग्य पा सकती। जैसे पहले रेल दुर्घटना होने पर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री और हवाई हादसा होने पर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए उस समय के नागरिक उड्डयन मंत्री माधवराव सिंधिया ने इस्तीफा दे दिया था। ऐसी उम्मीद बेमानी है।लेकिन आज के दौर में कम से कम मैदानी अफसरों को दंडित करने की परंपरा डल जाए तो उसे भी संतोषजनक मान लिया जाएगा।भोपाल,मालवा और निमाड़ इलाके पर कठोर नजर रखी जाए तो काफी कुछ मामला कंट्रोल में आ सकता है।