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गाली और गोली से खेली जा रही लोकतंत्र के लहू से होली

सार

प्रियंका गांधी का गाली और गोली से जुड़ा वीडियो सोशल मीडिया पर ट्रेंडिंग में रहा. कर्नाटक में चुनाव प्रचार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कांग्रेस द्वारा दी गई गाली और उसके जवाब में भाजपा द्वारा चुनाव प्रचार में कांग्रेस की गालियों को मुद्दा बनाए जाने पर सिमट गया है..!

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विस्तार

प्रियंका गांधी चुनावी सभा में कह रही हैं कि यह कैसा प्रधानमंत्री है जो खुद को दी गई गालियां गिना रहा है. उनका भाई राहुल गांधी तो गाली क्या देश के लिए गोलियां खाने को तैयार है. चुनाव में भावनात्मक मुद्दे के रूप में तो यह बात कांग्रेस को लाभ पहुंचा सकती है लेकिन इस देश में कोई भी व्यक्ति गोली खाने के लिए तैयार हो जाए इसका मतलब उसके सामने इसके अलावा कोई विकल्प नहीं है.

गाली और गोली की बात शुरू हुई है कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जहरीला सांप कहने से, फिर तो जवाब में सोनिया गांधी को विषकन्या कह दिया गया. कर्नाटक चुनाव की बोली गाली और गोली पर टिक गई है.

लोकतंत्र के मुकुट के रूप में प्रधानमंत्री को हमेशा यह देश मान सम्मान प्यार और दुलार देता रहा है. जो कांग्रेसी गाली को जस्टिफाई करने के लिए गोली खाने की बात कर रहे हैं उनको शायद याद नहीं है कि इंदिरा गांधी और राजीव गांधी को भारत के भोले-भाले लोगों ने जितना प्यार और दुलार दिया है वह तो विरले नेताओं को ही नसीब होता है. कोई सामान्य आदमी जिसमें गोली खाने की जिजीविषा होगी वह भारतीय सेना में सेवा करने का जरूर सोचेगा. राहुल गांधी ने अभी तक ऐसा कोई विचार तो प्रकट नहीं किया है लेकिन देश के लिए गोली खाने की बात न मालूम क्या सोचकर कही है?

राजनेताओं को ऐसा लगता होगा कि भारत के लोग भावनाओं पर ज्यादा भरोसा करते हैं. इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की शहादत से कांग्रेस के युवा गांधी को जोड़ने के लिए शायद देश के लिए गोली खाने का वक्तव्य उपजा होगा. राहुल गांधी युवा हैं, उनमें उर्जा है. उन्हें गोली खाने की आवश्यकता क्यों है? लोकतंत्र में गोली से कोई बदलाव नहीं होता. गोली से ज्यादा बोली का लोकतंत्र में प्रभाव होता है.

राहुल गांधी अपनी बोली की गोली से स्वयं लहूलुहान दिखाई पड़ रहे हैं. बोली के कारण उन्हें मानहानि के मुकदमे का सामना करना पड़ रहा है. एक मुकदमे में तो सजा मिलने के कारण उन्हें संसद सदस्यता भी गंवानी पड़ी है. इतने कटु अनुभवों के बाद उन्हें गोली जैसी अपनी बोली में सुधार लाने का प्रयास करना चाहिए.

सोशल मीडिया के कारण अजीबोगरीब राजनीतिक डायलॉग शायद इसलिए परोसे जाते हैं क्योंकि कभी भी सामान्य अवधारणाएं और परंपराएं ट्रेंडिंग में नहीं आते. ट्रेंडिंग में हमेशा वही बात आती है जो अजीबोगरीब हो. शायद इसीलिए सभी राजनेता ऐसे डायलॉग पटकते हैं जो चर्चा में रहें. कर्नाटक चुनाव में तो राजनीतिक डायलॉग अपनी सारी सीमाएं तोड़ चुका है.

वहां किसी भी सभा में चाहे वह कांग्रेस की हो या बीजेपी की हो, गाली और गोली पर चर्चा जरूर हो रही है. गाली और गोली की राजनीतिक बात लोकतंत्र के गाल पर अपमानजनक तमाचा ही कही जाएगी. चुनावी राजनीति में गाली गलौज के दुष्प्रभाव लंबे समय तक दिखाई पड़ते हैं. पागल कुत्ते की रेबीज़ जितनी खतरनाक होती है उतनी ही खतरनाक लोकतंत्र के लिए गाली और गोली की राजनीति कही जा सकती है. 

दौलत के पहाड़ और भूख की खाई बढ़ती जा रही है. राजनेताओं से इस खाई को पाटने और जनकल्याण की अपेक्षा की जाती है लेकिन चुनाव के समय इन विषयों पर बात करने से ज्यादा गाली और गोली पर चुनावी बातें केंद्रित हो जाती हैं. चुनावी जीत अगर इंसाफ का मुकुट बेचकर हासिल की जाती है तो कालांतर में उससे नाइंसाफी ही पैदा होगी.

इस समय कर्नाटक में  वादों की रिश्वत और सब्जबाग का सिनेमा चारों तरफ चल रहा है. इसी सिनेमा की एक फिल्म गाली और गोली भी काफी हिट हो रही है.
लूट के डनलप पर सोते-सोते लोकतंत्र के देवता बनने की चाहत आसानी से पूरी नहीं होती. चुनाव के समय रोपी गई घृणा बहुत देर तक फलती है. राजनीति में नैतिकता के बिछोह से देश की आत्मा दिनों-दिन मरती जा रही है.

देश के लिए गोली तो केवल सीमा पर सेना के शहीद ही खाते हैं. बाकी जो गोलियां कभी भी कहीं भी चली हैं वह सब नफरत की बंदूकों से निकली हैं. राजनीति तो ऐसी होना चाहिए कि नफरत की संभावनाएं कम से कम हों. प्रेम और भाईचारा राजनीति का मिशन बने. अगर राजनेता ही गोली खाने की बात को अपनी राजनीतिक डोली सजाने का जरिया बनाने का प्रयास करेंगे तो फिर लोकतंत्र में गाली और गोली का बोलबाला हो जाएगा.

राजनीति में गाली और गोली की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. देश के प्रधानमंत्री को दी गई गाली लोकतंत्र को दी गई गाली मानी जाती है. राहुल गांधी तो गांधी परिवार के वारिस हैं उन्हें देश के लिए भविष्य में काम करना है. गोली खाने की बात करके न उन्हें स्वयं निराशाजनक प्रदर्शन करना चाहिए और ना ही देश के लोकतंत्र को निराशा की ओर ले जाना चाहिए.