कांग्रेस ऐसे भंवर में उलझ गई है कि उससे बाहर निकलने की उसकी हर कोशिश उसे नए बवंडर में उलझा देती है. भगवा आतंकवाद का नेरेटिव उसे सत्ता से विपक्षवाद की ओर ले गई..!!
अब जब देश की राजनीति हिंदुत्व की धारा पर मुड़ गई है, तब कांग्रेस बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता की थ्योरी इजाद कर रही है. बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता मतलब हिंदुत्व की राजनीति का विरोध, हिंदू आइडियोलॉजी का विरोध. राजनीति में हिंदुत्व के महानायकों और प्रतीको का विरोध, सनातन संस्कृति में मतभेद बढ़ाने की कोशिशें कांग्रेस के लिए नई नहीं हैं. आजादी के समय से ही कांग्रेस कहती भले ना हो, लेकिन करती हमेशा अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का तुष्टीकरण रही है.
दिग्विजय सिंह बहुत टैलेंटेड पॉलिटिशियन हैं. उन्हें मध्य प्रदेश में 10 साल मुख्यमंत्री का अनुभव है. वैचारिक रूप से वह स्वयं को साम्प्रदायिकता विरोधी साबित करते हैं. खुद को प्रचंड सनातनी बताते हैं. उन्होंने ही बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का विचार प्रस्तुत किया है. पंडित जवाहरलाल नेहरू की पुण्यतिथि पर अपनी बात रखते हुए दिग्विजय सिंह ने कहा अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता है. साम्प्रदायिकता को समुदायों में बांटना कांग्रेस का पुराना इतिहास रहा है. भारत का निर्माण ही साम्प्रदायिकता के आधार पर विभाजन से हुआ है.
दिग्विजय सिंह के विचार कांग्रेस के लिए नए नहीं हैं. कांग्रेस ने तो विगत लोकसभा चुनाव में अपने घोषणा पत्र में भी इसी धारणा को दोहराया था. इसमें कहा गया है कि देश में बहुसंख्यकवाद नहीं चलेगा. वैसे तो आदर्श स्थिति यह है कि देश की व्यवस्था में कोई भी वाद नहीं चलना चाहिए. ना अल्पसंख्यकवाद, ना बहुसंख्यकवाद. प्रत्येक नागरिक को समान अधिकार हों, प्रत्येक नागरिक के लिए समान कानून हों.
बहुसंख्यक समाज जब अपने अधिकारों के लिए राजनीतिक रूप से लड़ने लगा, तब कांग्रेस को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता का आभास हुआ. जब तक उसने अल्पसंख्यक साम्प्रदायिकता का तुष्टिकरण करते हुए अपनी राजनीतिक विसात को सत्ता पर जमाए रखा तब तक उन्हें साम्प्रदायिकता से कोई एतराज नहीं था
कांग्रेस क्या यह जवाब दे सकती है, कि यूनिफॉर्म सिविल कोड देश के सभी नागरिकों के लिए लागू करने की पहल नहीं करना उसकी कौन सी साम्प्रदायिकता का उदाहरण है. देश में मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारों के प्रबंधन के लिए उन्हीं समुदायों को पूरे अधिकार हैं. लेकिन हिंदू मंदिरों का प्रबंधन सरकारी नियंत्रण में है. हिंदू मंदिरों के चढ़ावे सरकारों में जाते हैं. इसके लिए कानून उन्हीं जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में बने थे जिनको सेकुलरिज्म के मसीहा के रूप में कांग्रेस आज भी पूजने में लगी हुई है.
अब अगर हिंदू मंदिरों का प्रबंधन भी मस्जिदों की तरह ही हिंदू समाज को सौंपने की मांग सुप्रीम कोर्ट से हो रही है. इस पर लंबे समय से याचिकाएं लगी हैं. अब अगर हिंदू एक्टिविस्ट हिंदुओं के अधिकारों पर लड़ने के लिए अपना समय और स्किल लगा रहे हैं. जब तथ्य और प्रमाण के साथ अदालतों से हिंदुओं के पक्ष में निर्णय हो रहे हैं तो फिर कांग्रेस को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता ज्यादा खतरनाक दिखने लगी है.
कांग्रेस को यह भी बताना पड़ेगा कि पंडित जवाहरलाल नेहरु ने हिंदुओं के लिए तो कोड, बिल बना दिए लेकिन मुसलमान के लिए पर्सनल कानूनों को संविधान में मान्यता दे दी. अगर इस समाज के लिए वक़्फ़ बोर्ड बनाया गया, तो हिंदू मठ-मंदिरों के लिए इस तरीके की बोर्ड के बारे में क्यों नहीं विचार किया गया.अब अगर उनकी मांग उठ रही है, अगर सरकारें विचार भी करती हैं, तो इसे साम्प्रदायिकता कहा जा रहा है.
इन्हीं पंडित जवाहरलाल नेहरु और दूसरे आजादी के महानायकों ने विभाजन के समय पाकिस्तान में रह गए हिंदुओं से वायदा किया था, कि अगर उनके साथ अन्याय होता है और वह प्रताड़ित होकर भारत आते हैं तो उन्हें यहां की नागरिकता दी जाएगी. अल्पसंख्यक तुष्टिकरण पर सत्ता चढ़ने वाली कांग्रेस पार्टी ने पाकिस्तान से आने वाले ऐसे हिंदू शरणार्थियों को अपनी सरकारों में नागरिकता देने के बारे में कोई कानून नहीं बनाया, तो यह साम्प्रदायिकता का कौन सा चेहरा है. अब अगर बीजेपी की केंद्र सरकार ने ऐसे हिंदू शरणार्थियों के लिए सीएए का कानून बनाया है, तो उसे कांग्रेस बहुसंख्यकों की साम्प्रदायिकता के रूप में अगर परिभाषित करती है तो यह उनकी प्रॉब्लम हो सकती है.
राम जन्मभूमि आंदोलन में सनातनियों की सक्रियता न्यायिक सफलता और उसके बाद अयोध्या में भव्य राम मंदिर के निर्माण में अगर कांग्रेस को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता दिखती है, तो यह कांग्रेस का चिंतन हो सकता है. इसे देश स्वीकार नहीं करता है.
मध्य प्रदेश के धार में भोजशाला के लंबित कानूनी मामले में लंबी लड़ाई के बाद हाई कोर्ट द्वारा हिंदुओं के पक्ष में फैसला दिया गया है. वाग्देवी के मंदिर भोजशाला में जब एक हिस्से में नमाज अदा की जाने लगी, यह काम भी कांग्रेस की सरकारों के समय हुआ था. अब जब हाईकोर्ट ने भोजशाला हिंदुओं को सौंप दी है. वाग्देवी की मूर्ति लंदन से लाने की पहन चालू हो गई है. मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री वहां सरस्वती लोक बनाने का ऐलान कर रहे हैं. यह अगर दिग्विजय सिंह और कांग्रेस को बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता नजर आती है, तो फिर अलग बात है.
हिंदू अगर यूनाइट हो रहा है तो वह बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता लग रही है. जब कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के नाम पर साम्प्रदायिकता बढ़ाती रही तब उसे आभास नहीं हुआ कि इसकी प्रतिक्रिया भी हो सकती है. हिंदुत्व को सबसे ज्यादा नुकसान धर्मनिरपेक्षता के कारण हुआ है. अगर धर्मनिरपेक्षता शब्द नहीं होता कांग्रेस की सरकारों में भी हिंदू और मुसलमान की नजर से कामकाज हुआ होता तो शायद हिंदुओं के साथ सरकारी स्तर पर इतना भेदभाव नहीं होता. अब तो हिंदुत्व को चाहे बहुसंख्यक साम्प्रदायिकता कहा जाए, चाहे कुछ भी लेकिन वह अपने अधिकारों के लिए एकजुट हो गया है.
बंगाल के परिणाम के बाद हिंदुत्व विरोधी शक्तियां अपना राजनीतिक भविष्य अंधकार में मानकर ना मालूम क्या-क्या कहेंगी और करने की कोशिश करेंगीं. धर्मनिरपेक्षता की साम्प्रदायिकता देश के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है.