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‘दवा’ के नाम पर कदाचार और भ्रष्टाचार

राकेश दुबे राकेश दुबे
Updated Mon , 25 Jul

सार

भारत में लोग डॉक्टर से परामर्श किये बिना एंटीबायोटिक्स दवाओं का बेतहाशा सेवन कर रहे हैं, ये दवाइयां स्वास्थ्य पर खराब असर कर सकती हैं तथा बीमारी को ठीक करने के बजाय बढ़ा सकती हैं..!

janmat

विस्तार

प्रतिदिन-राकेश दुबे

12/09/2022

विज्ञान अध्ययन पत्रिका ‘लांसेट’ द्वारा कराये गये पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया और अमेरिका के बोस्टन यूनिवर्सिटी के संयुक्त अध्ययन में पाया गया है कि भारत में लोग डॉक्टर से परामर्श किये बिना एंटीबायोटिक्स दवाओं का बेतहाशा सेवन कर रहे हैं| ये दवाइयां स्वास्थ्य पर खराब असर कर सकती हैं तथा बीमारी को ठीक करने के बजाय बढ़ा सकती हैं| दूसरी ओर फार्मा क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार किस तरह स्वास्थ्य के बेहतर नतीजों को खतरे में डाल रहा है। फार्मा कंपनी द्वारा  अतार्किक रूप से डॉक्टरों को रिश्वत देकर अपनी दवाएं लिखवाने की बात हो या फिर हेल्थ केयर से जुड़े लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से अनुचित फायदा पहुंचाकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने की, आखिरकार जोखिम में तो रोगी का स्वास्थ्य ही होता है| दुर्भाग्य से देश में ऐसे मामले दिन-ब-दिन सामने आ रहे हैं, और सरकार का रवैया समझ से बाहर है |

अक्सर चिकित्सक अक्सर सलाह देते रहते हैं कि अपने मन से दवाएं नहीं लेनी चाहिए, फिर भी हमारे देश में खुद ही अपना इलाज करने का चलन थम नहीं रहा है| ऐसे अनुचित इस्तेमाल का एक गंभीर दुष्परिणाम यह हो रहा है कि हमारे देश में एंटीबायोटिक्स दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ता जा रहा है| इसका अर्थ यह है कि मनमाने ढंग से अगर हम इन दवाओं को लेते हैं या अनावश्यक रूप से दी जाती हैं , तो धीरे-धीरे मानव  शरीर उनका आदी हो जाता है और कुछ समय के बाद जब हमें सही में इन्हें लेना पड़ता है, तब उनका असर ही नहीं होता| अन्य अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि कई बार डॉक्टर भी एंटीबायोटिक्स की अधिक खुराक देते हैं|

यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि भारत में सबसे अधिक इन दवाओं की खपत होती है, फिर भी इनके इस्तेमाल पर निगरानी की कोई व्यवस्था नहीं है| यूरोप और अमेरिका में ऐसी प्रणाली है, जो दवाओं के उपयोग पर निगाह रखती है| ऐसी निगरानी इसलिए भी आवश्यक है कि भारत उन कुछ देशों में शामिल है, जहां बीते सालों में एंटीबायोटिक्स के उपभोग में बहुत अधिक बढ़ोतरी हुई है|

विश्व स्वास्थ्य संगठन और भारत में सक्रिय विभिन्न संगठनों की लंबे समय से मांग रही है कि आवश्यक दवाओं की ठोस सूची बने तथा उनकी खुदरा बिक्री पर ठीक से नियमन हो| हालांकि नियम तो यह है कि कोई भी दवा दुकानदार बिना डॉक्टर की पर्ची के ऐसी दवाएं नहीं बेच सकता है, जिनको लेना बीमार को मुश्किल में डाल सकता है या उस दवा का कोई गलत इस्तेमाल किया जा सकता है, पर ऐसे नियमों की परवाह न तो विक्रेता करते हैं और न ही ग्राहक|

दवा बाजार में निर्धारित खुराक वाली कॉम्बिनेशन दवाओं के वर्चस्व को लेकर संसदीय समिति समेत अनेक शोध समूह चिंता जता चुके हैं| दवा कारोबार में कदाचार और भ्रष्टाचार पर अक्सर चर्चा भी होती रहती है| दवाओं पर निगरानी रखने के लिए केंद्रीय संगठन भी है और राज्यों के स्तर पर भी विभाग बने हुए हैं| इसके बावजूद ऐसी एंटीबायोटिक्स दवाएं भी बाजार में बेची जा रही हैं, जिन्हें मंजूरी भी नहीं मिली है| इस तरह की अन्य दवाएं भी बाजार में हैं|

 फेडरेशन ऑफ मेडिकल एंड सेल्स रिप्रेजेंटेटिव एसोसिएशन ऑफ इंडिया और अन्य द्वारा सर्वोच्च नायालय ,में  एक दायर की गई है। याचिका के पहले ही पैरा में कहा गया है: “ऐसे तमाम उदाहरण हैं जो दिखाते हैं कि फार्मा क्षेत्र में भ्रष्टाचार किस तरह स्वास्थ्य के बेहतर नतीजों को खतरे में डाल रहा है। चाहे वह एक फार्मा कंपनी का अतार्किक रूप से डॉक्टरों को रिश्वत देकर अपनी दवाएं लिखवाने की बात हो या फिर हेल्थ केयर से जुड़े लोगों को अप्रत्यक्ष रूप से अनुचित फायदा पहुंचाकर अपने उत्पादों की बिक्री बढ़ाने की, आखिरकार जोखिम में तो रोगी का स्वास्थ्य ही होता है|

वैसे यह मामला तब उजागर हुआ, जब जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और ए एस बोपन्ना की खंडपीठ ने याचिका में किए गए इस अनुरोध पर सरकार को अपना पक्ष रखने को कहा कि कंपनी के अपनी दवाओं या उत्पादों के प्रमोशन और इसके लिए दिए जाने वाले उपहारों के बारे में जो स्वैच्छिक आचार संहिता है, उसे कानूनी जामा पहनाया जाए। पिछले दिनों एक दवा उत्पाद ‘डोलो-६५० ’ की बिक्री में हुई उल्लेखनीय वृद्धि की भी चर्चा हुई। सबको जानना - जरूरी है कियह एक पैरासिटामोल ब्रांड है जो ६५० मिलीग्राम डोज में आता है। आम तौर पर पैरासिटामोल की ५०० मिलीग्राम की गोलियां आती हैं। कोविड दुष्काल के दौरान डोलो -६५०की बिक्री में काफी तेजी आई। हालांकि कंपनी ने इस बात से इनकार किया है कि उसने मूल्य नियंत्रण से बचने के लिए अपने नुस्खे में बदलाव किया।

देश में एक बड़ी बहस चल रही है कि क्या फार्मा उद्योग ने फार्मास्युटिकल मार्केटिंग प्रैक्टिस के लिए समान आचार संहिता (यूसीपीएमपी) के अंतर्गत स्व-विनियमन के पर्याप्त प्रयास किए हैं? यह प्रयास अभी तक तो सिर्फ कागजों में है । यह आचार संहिता मेडिकल रिप्रेजेन्टेटिव के आचार से लेकर विज्ञापन प्रचार, सैंपल, उपहार, आतिथ्य, यात्रा वाउचर या फार्मा कंपनियों द्वारा स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों या उनके परिवारों को दी जाने वाली नकदी के चलन से जुड़ी गतिविधियों को नियंत्रित करता है। हालांकि इनमें से किसी को भी कानूनी तरीके से व्यवहार में नहीं लाया जा सका है |